अखंडवर्स

Akhandverse – Sanatan Dharma & Hindi Literature | NFTRaja

अखंडवर्स

📖 चार वेद

  • 🔸 ऋग्वेद - ज्ञान का प्रथम स्रोत
  • 🔸 यजुर्वेद - यज्ञ और कर्मकांड
  • 🔸 सामवेद - संगीत और मंत्र
  • 🔸 अथर्ववेद - जीवन विज्ञान

🌿 चार उपवेद

  • 🔸 आयुर्वेद (अथर्ववेद से) - चिकित्सा विज्ञान
  • 🔸 धनुर्वेद (यजुर्वेद से) - युद्ध कला
  • 🔸 गंधर्ववेद (सामवेद से) - संगीत कला
  • 🔸 स्थापत्यवेद (ऋग्वेद से) - वास्तु शास्त्र

🌊 पंच तत्व

  • 🔸 पृथ्वी (भूमि) - ठोस तत्व
  • 🔸 जल (अप) - तरल तत्व
  • 🔸 अग्नि (तेज) - ऊर्जा तत्व
  • 🔸 वायु (पवन) - गैस तत्व
  • 🔸 आकाश (व्योम) - शून्य तत्व

🌟 पंच भूत

  • 🔸 क्षिति (पृथ्वी) - गंध का स्थान
  • 🔸 अप (जल) - रस का स्थान
  • 🔸 तेजस (अग्नि) - रूप का स्थान
  • 🔸 मरुत (वायु) - स्पर्श का स्थान
  • 🔸 व्योम (आकाश) - शब्द का स्थान

🔮 अष्ट मंडल

  • 🔸 सूर्य मंडल - सूर्य का क्षेत्र
  • 🔸 चंद्र मंडल - चंद्रमा का क्षेत्र
  • 🔸 मंगल मंडल - मंगल का क्षेत्र
  • 🔸 बुध मंडल - बुध का क्षेत्र
  • 🔸 गुरु मंडल - बृहस्पति का क्षेत्र
  • 🔸 शुक्र मंडल - शुक्र का क्षेत्र
  • 🔸 शनि मंडल - शनि का क्षेत्र
  • 🔸 राहु-केतु मंडल - छाया ग्रहों का क्षेत्र

🔱 नौ दुर्गा (नवदुर्गा)

  • 🔸 शैलपुत्री - पर्वतराज की पुत्री
  • 🔸 ब्रह्मचारिणी - तपस्विनी रूप
  • 🔸 चंद्रघंटा - चंद्र धारिणी
  • 🔸 कूष्मांडा - ब्रह्मांड निर्मात्री
  • 🔸 स्कंदमाता - कार्तिकेय की माता
  • 🔸 कात्यायनी - महर्षि कात्यायन की पुत्री
  • 🔸 कालरात्रि - काल का नाश करने वाली
  • 🔸 महागौरी - अत्यंत गौर वर्ण वाली
  • 🔸 सिद्धिदात्री - सिद्धियां प्रदान करने वाली

🕉️ शिव के अवतार

  • 🔸 वीरभद्र - क्रोध से उत्पन्न
  • 🔸 पिप्पलाद - ऋषि रूप
  • 🔸 नंदी - शिव के वाहन
  • 🔸 भैरव - रक्षक रूप
  • 🔸 अश्वत्थामा - अमर योद्धा
  • 🔸 शरभ - नरसिंह को शांत करने वाला
  • 🔸 गृहपति - गृहस्थ रूप
  • 🔸 दुर्वासा - क्रोधी ऋषि
  • 🔸 हनुमान - रुद्रावतार
  • 🔸 वृषभ - वृषभ रूप
  • 🔸 यतिनाथ - संन्यासी रूप

📜 18 पुराण

  • 🔸 ब्रह्म पुराण
  • 🔸 पद्म पुराण
  • 🔸 विष्णु पुराण
  • 🔸 शिव पुराण
  • 🔸 भागवत पुराण
  • 🔸 नारद पुराण
  • 🔸 मार्कण्डेय पुराण
  • 🔸 अग्नि पुराण
  • 🔸 भविष्य पुराण
  • 🔸 ब्रह्मवैवर्त पुराण
  • 🔸 लिंग पुराण
  • 🔸 वराह पुराण
  • 🔸 स्कंद पुराण
  • 🔸 वामन पुराण
  • 🔸 कूर्म पुराण
  • 🔸 मत्स्य पुराण
  • 🔸 गरुड़ पुराण
  • 🔸 ब्रह्माण्ड पुराण

🦚 10 अवतार (दशावतार)

  • 🔸 मत्स्य - मछली अवतार
  • 🔸 कूर्म - कछुआ अवतार
  • 🔸 वराह - सूअर अवतार
  • 🔸 नरसिंह - आधा नर आधा सिंह
  • 🔸 वामन - बौना ब्राह्मण
  • 🔸 परशुराम - फरसा धारी योद्धा
  • 🔸 राम - मर्यादा पुरुषोत्तम
  • 🔸 कृष्ण - योगेश्वर
  • 🔸 बुद्ध - ज्ञान के दाता
  • 🔸 कल्कि - भविष्य अवतार

🕉️ 12 ज्योतिर्लिंग

  • 🔸 सोमनाथ (गुजरात)
  • 🔸 मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
  • 🔸 महाकालेश्वर (मध्य प्रदेश)
  • 🔸 ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
  • 🔸 केदारनाथ (उत्तराखंड)
  • 🔸 भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
  • 🔸 विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश)
  • 🔸 त्र्यंबकेश्वर (महाराष्ट्र)
  • 🔸 वैद्यनाथ (झारखंड)
  • 🔸 नागेश्वर (गुजरात)
  • 🔸 रामेश्वरम (तमिलनाडु)
  • 🔸 घुश्मेश्वर (महाराष्ट्र)

🔱 51 शक्तिपीठ

  • 🔸 हिंगलाज (पाकिस्तान) - ब्रह्मरंध्र
  • 🔸 शाकम्भरी (उत्तराखंड) - शिखा
  • 🔸 ज्वालामुखी (हिमाचल) - जिह्वा
  • 🔸 चिंतपूर्णी (हिमाचल) - चरण
  • 🔸 वैष्णो देवी (जम्मू) - कपाल
  • 🔸 कामाख्या (असम) - योनि
  • 🔸 कालीघाट (पश्चिम बंगाल) - दक्षिण पाद अंगुली
  • 🔸 तारा तारिणी (ओडिशा) - स्तन
  • 🔸 विमला (ओडिशा) - चरण
  • 🔸 बिरजा (ओडिशा) - नाभि
  • 🔸 त्रिपुर सुंदरी (त्रिपुरा) - दक्षिण पाद
  • 🔸 नैना देवी (हिमाचल) - नेत्र
  • 🔸 मानसा देवी (हरियाणा) - मस्तक
  • 🔸 ज्वाला देवी (हिमाचल) - जिह्वा
  • 🔸 चामुंडा (हिमाचल) - केश
  • ...और 36 अन्य शक्तिपीठ

🏔️ चार धाम

  • 🔸 बद्रीनाथ (उत्तराखंड) - उत्तर दिशा, विष्णु धाम
  • 🔸 द्वारका (गुजरात) - पश्चिम दिशा, कृष्ण धाम
  • 🔸 पुरी (ओडिशा) - पूर्व दिशा, जगन्नाथ धाम
  • 🔸 रामेश्वरम (तमिलनाडु) - दक्षिण दिशा, शिव धाम

🕉️ चार मठ

  • 🔸 ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) - उत्तर भारत
  • 🔸 शारदा मठ (द्वारका) - पश्चिम भारत
  • 🔸 गोवर्धन मठ (पुरी) - पूर्व भारत
  • 🔸 शृंगेरी मठ (कर्नाटक) - दक्षिण भारत

📿 चार शंकराचार्य

  • 🔸 ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य - अथर्ववेद
  • 🔸 शारदा मठ के शंकराचार्य - सामवेद
  • 🔸 गोवर्धन मठ के शंकराचार्य - ऋग्वेद
  • 🔸 शृंगेरी मठ के शंकराचार्य - यजुर्वेद

⭐ सप्त ऋषि

  • 🔸 वशिष्ठ - राजगुरु, ब्रह्मर्षि
  • 🔸 विश्वामित्र - गायत्री मंत्र के रचयिता
  • 🔸 कश्यप - प्रजापति, सृष्टि रचयिता
  • 🔸 अत्रि - चंद्रमा के पिता
  • 🔸 भरद्वाज - आयुर्वेद के ज्ञाता
  • 🔸 जमदग्नि - परशुराम के पिता
  • 🔸 गौतम - न्याय दर्शन के प्रवर्तक

👑 देवताओं की उपाधियां

  • 🔸 ब्रह्मा - सृष्टि के रचयिता, जनक
  • 🔸 विष्णु - पालनहार, जगत के रक्षक
  • 🔸 शिव - संहारक, महादेव
  • 🔸 गणेश - विघ्नहर्ता, प्रथम पूज्य
  • 🔸 कार्तिकेय - देवसेनापति, स्कंद
  • 🔸 इंद्र - देवराज, स्वर्ग के राजा
  • 🔸 अग्नि - देवताओं के दूत
  • 🔸 वरुण - जल के देवता
  • 🔸 वायु - प्राण के देवता
  • 🔸 कुबेर - धन के देवता, यक्षराज
  • 🔸 यम - मृत्यु के देवता, धर्मराज
  • 🔸 शनि - न्याय के देवता, दंडाधिकारी
  • 🔸 सूर्य - प्रकाश के देवता, दिनकर
  • 🔸 चंद्र - औषधि के देवता, सोम
  • 🔸 हनुमान - संकटमोचन, बजरंगबली

👸 देवियों की उपाधियां

  • 🔸 लक्ष्मी - धन की देवी, श्री
  • 🔸 सरस्वती - विद्या की देवी, वाग्देवी
  • 🔸 दुर्गा - शक्ति की देवी, महिषासुरमर्दिनी
  • 🔸 काली - समय की देवी, महाकाली
  • 🔸 पार्वती - शिव की अर्धांगिनी, गिरिजा
  • 🔸 राधा - प्रेम की देवी, कृष्ण की प्रिया
  • 🔸 सीता - पतिव्रता का आदर्श
  • 🔸 गंगा - पवित्रता की देवी, भागीरथी
  • 🔸 यमुना - प्रेम की नदी
  • 🔸 अन्नपूर्णा - अन्न की देवी

⭐ 27 नक्षत्र

  • 🔸 अश्विनी, भरणी, कृत्तिका
  • 🔸 रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा
  • 🔸 पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा
  • 🔸 मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी
  • 🔸 हस्त, चित्रा, स्वाति
  • 🔸 विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा
  • 🔸 मूल, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा
  • 🔸 श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा
  • 🔸 पूर्वा भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद, रेवती
💬

प्रेरक उद्धरण

सनातन धर्म के महान ग्रंथों से प्रेरणादायक उद्धरण और विचार

भगवद गीता

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में कभी नहीं। कर्मफल का हेतु मत बनो और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो।

उपनिषद

"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः।"

अर्थ: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवयान मार्ग प्रशस्त होता है।

वेद

"वसुधैव कुटुम्बकम्"

अर्थ: सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है। यह सनातन धर्म का सार्वभौमिक संदेश है।

चाणक्य नीति

"विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥"

अर्थ: विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।

रामायण

"धर्मो रक्षति रक्षितः"

अर्थ: धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है।

महाभारत

"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।"

अर्थ: अहिंसा परम धर्म है, और धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी धर्म है।

योग वशिष्ठ

"मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।"

अर्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।

विवेक चूड़ामणि

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।"

अर्थ: ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है।

कठोपनिषद

"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।"

अर्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करो।

मनुस्मृति

"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।"

अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो।

श्रीमद् भागवत

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।"

अर्थ: जब-जब धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान अवतार लेते हैं।

पतंजलि योग सूत्र

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।"

अर्थ: चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।

ईशावास्य उपनिषद

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।"

अर्थ: इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।

अष्टावक्र गीता

"न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्ता निराश्रया।"

अर्थ: मेरा न बंधन है न मोक्ष, यह भ्रांति शांत हो गई है।

शिव संहिता

"आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।"

अर्थ: आत्मा को रथी और शरीर को रथ समझो।

गरुड़ पुराण

"यथा काष्ठं च काष्ठं च समेयातां महार्णवे।"

अर्थ: जैसे महासागर में दो लकड़ियां मिलती हैं, वैसे ही जीवन में मिलन होता है।

विष्णु पुराण

"यतो धर्मस्ततो जयः।"

अर्थ: जहां धर्म है, वहां विजय है।

शिव पुराण

"शिवं शान्तं अद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा।"

अर्थ: शिव, शांत, अद्वैत चतुर्थ अवस्था को आत्मा मानते हैं।

ब्रह्म सूत्र

"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा।"

अर्थ: अब ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए।

मुण्डक उपनिषद

"सत्यमेव जयते नानृतम्।"

अर्थ: सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं।

तैत्तिरीय उपनिषद

"मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव।"

अर्थ: माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो, गुरु को देवता मानो।

छान्दोग्य उपनिषद

"तत्त्वमसि श्वेतकेतो।"

अर्थ: हे श्वेतकेतु, तू वही है (तू ब्रह्म है)।

केन उपनिषद

"यस्य अमतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।"

अर्थ: जो नहीं जानता वह जानता है, जो जानता है वह नहीं जानता।

प्रश्न उपनिषद

"प्राणस्य प्राणम् उत चक्षुषश्चक्षुः।"

अर्थ: प्राण का प्राण, नेत्र का नेत्र (परमात्मा)।

मांडूक्य उपनिषद

"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म।"

अर्थ: ओम यह एक अक्षर ब्रह्म है।

श्वेताश्वतर उपनिषद

"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।"

अर्थ: एक ही देव सभी प्राणियों में छिपा हुआ है।

ऐतरेय उपनिषद

"प्रज्ञानं ब्रह्म।"

अर्थ: प्रज्ञान (चेतना) ही ब्रह्म है।

बृहदारण्यक उपनिषद

"असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।"

अर्थ: असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

नारद भक्ति सूत्र

"सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।"

अर्थ: भक्ति परम प्रेम का स्वरूप है।

संदीपनी सूत्र

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।"

अर्थ: गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वर हैं।

कुलार्णव तंत्र

"शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुम्।"

अर्थ: शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृजन करने में समर्थ होते हैं।

सौन्दर्य लहरी

"शिवः शक्तिः कामः क्षितिरथ रविः शीतकिरणः।"

अर्थ: शिव, शक्ति, काम, पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा सब एक हैं।

देवी माहात्म्य

"सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।"

अर्थ: हे सर्वमंगला, शिवा, सर्वार्थ साधिके देवी।

ललिता सहस्रनाम

"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दर्यै नमः।"

अर्थ: श्री ललिता त्रिपुरसुंदरी को नमस्कार।

विष्णु सहस्रनाम

"विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः।"

अर्थ: विष्णु विश्व हैं, भूत-भविष्य-वर्तमान के स्वामी हैं।

शिव सहस्रनाम

"ॐ नमः शिवाय शान्ताय कारणत्रयहेतवे।"

अर्थ: शांत शिव को नमस्कार, जो तीनों कारणों के हेतु हैं।

हनुमान चालीसा

"संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥"

अर्थ: जो हनुमान का स्मरण करता है, उसके सब संकट दूर हो जाते हैं।

राम रक्षा स्तोत्र

"रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे।"

अर्थ: राम राजाओं में मणि हैं, सदा विजयी हैं, मैं राम की भक्ति करता हूं।

दुर्गा सप्तशती

"या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।"

अर्थ: जो देवी सभी प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं।

गणेश अथर्वशीर्ष

"त्वमेव केवलं कर्ताऽसि त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।"

अर्थ: आप ही केवल कर्ता हैं, आप ही केवल धारण करने वाले हैं।

📝

काव्य संग्रह

संस्कृत और हिंदी की अमर काव्य रचनाएं

कालिदास - मेघदूत

"कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारप्रमत्तः शापेनास्तंगमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।"

प्रिया के वियोग से व्याकुल यक्ष की मार्मिक कथा। कालिदास की अद्भुत काव्य रचना।

तुलसीदास - रामचरितमानस

"मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सो दशरथ अजिर बिहारी॥"

श्री राम की महिमा का गुणगान। तुलसीदास जी की अमर रचना।

सूरदास - सूरसागर

"मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। भोर भयो गैयन के पाछे मधुबन मोहि पठायो॥"

बाल कृष्ण की लीलाओं का मधुर वर्णन।

कबीर - दोहावली

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"

आत्म-चिंतन और सत्य की खोज।

कालिदास - अभिज्ञानशाकुंतलम्

"यस्यान्ते विषमोऽपि सन्धिरमृतं तत्काव्यमित्युच्यते।"

शकुंतला और दुष्यंत की प्रेम कथा। संस्कृत साहित्य का रत्न।

कालिदास - रघुवंशम्

"वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"

रघुवंश के राजाओं का महाकाव्य।

कालिदास - कुमारसंभवम्

"अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।"

कार्तिकेय के जन्म की कथा। पार्वती-शिव विवाह का वर्णन।

भवभूति - उत्तररामचरितम्

"एको रसः करुण एव निमित्तभेदात्।"

राम और सीता के वियोग की मार्मिक कथा।

भारवि - किरातार्जुनीयम्

"श्रूयतामयमर्जुनः किरातवेषधारिणा शंकरेण सह युद्धम्।"

अर्जुन और शिव के युद्ध का वर्णन।

माघ - शिशुपालवधम्

"महाकाव्यं माघस्य त्रयी माघे।"

शिशुपाल वध की कथा। अलंकार और छंद का उत्कृष्ट प्रयोग।

जयदेव - गीतगोविन्दम्

"मेघैर्मेदुरमम्बरं वनभुवः श्यामास्तमालद्रुमैः।"

राधा-कृष्ण की दिव्य प्रेम लीला। संगीतमय काव्य।

बिहारी - बिहारी सतसई

"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय। जा तन की झाईं परे, स्याम हरित दुति होय॥"

श्रृंगार रस का सर्वोत्तम उदाहरण।

रहीम - रहीम दोहावली

"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय॥"

नीति और प्रेम का संगम।

मीराबाई - मीरा पदावली

"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥"

कृष्ण भक्ति का अद्भुत उदाहरण।

रसखान - रसखान काव्य

"मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।"

कृष्ण प्रेम में डूबा मुस्लिम कवि।

घनानंद - घनानंद काव्य

"अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं।"

प्रेम की सच्चाई का वर्णन।

केशवदास - रामचंद्रिका

"भूषण बिनु न बिराजई कविता बनिता मित्त।"

अलंकार शास्त्र के आचार्य।

देव - देव काव्य

"कहत नटत रीझत खीझत मिलत खिलत लजियात।"

श्रृंगार रस के महाकवि।

भूषण - शिवा बावनी

"इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है।"

वीर रस के अद्वितीय कवि।

पद्माकर - पद्माकर ग्रंथावली

"फूले कास सकल महि छाई। जनु बरसा रितु प्रगट बुढ़ाई॥"

प्रकृति वर्णन के सिद्धहस्त।

मतिराम - मतिराम काव्य

"मति न नीति गति न प्रीति गति, नहिं रीति गति नहिं नीति गति।"

रीतिकाल के प्रमुख कवि।

सेनापति - सेनापति काव्य

"कबहूँ ससि माँगत कबहूँ तारा। कबहूँ खेलावत मोतिन की लरि॥"

बाल-क्रीड़ा के सुंदर चित्रण।

भारतेंदु हरिश्चंद्र

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल॥"

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक।

मैथिलीशरण गुप्त - साकेत

"नर हो, न निराश करो मन को। कुछ काम करो, कुछ काम करो॥"

राष्ट्रकवि की अमर रचना।

जयशंकर प्रसाद - कामायनी

"हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छाँह।"

छायावाद का महाकाव्य।

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

"वह तोड़ती पत्थर। देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर॥"

क्रांतिकारी कवि की रचना।

सुमित्रानंदन पंत

"वीणा वादिनी वर दे! वीणा वादिनी वर दे!"

प्रकृति के सुकुमार कवि।

महादेवी वर्मा

"मैं नीर भरी दुःख की बदली। विस्तृत नभ का कोना-कोना मेरा न कभी अपना होगा॥"

आधुनिक मीरा की पीड़ा।

रामधारी सिंह दिनकर

"सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनता की रोके राह, समय नहीं किसी के बाप का॥"

राष्ट्रीय चेतना के कवि।

हरिवंश राय बच्चन

"मधुशाला जाने को घर से चलता है पीनेवाला। किस पथ से जाऊँ? असमंजस में है वह भोलाभाला॥"

हालावाद के प्रवर्तक।

रामनरेश त्रिपाठी

"विप्लव रव से छोटे ही हैं शोभा पाते। विप्लव की भीषणता में सुख पाते॥"

ग्राम्य जीवन के चितेरे।

माखनलाल चतुर्वेदी

"मुझे तोड़ लेना वनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक। मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक॥"

एक फूल की चाह।

सोहनलाल द्विवेदी

"चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ। चाह नहीं प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ॥"

बाल साहित्य के रचयिता।

सुभद्राकुमारी चौहान

"खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।"

वीरता का गान करती कविता।

अज्ञेय

"नदी के द्वीप। हम नदी के द्वीप हैं। हम दो, तट हैं जिसके।"

प्रयोगवाद के प्रवर्तक।

धर्मवीर भारती

"अंधा युग। जब-जब होती सत्य की हार, कायर जन जीते हैं।"

नाट्य काव्य का उत्कृष्ट उदाहरण।

नागार्जुन

"बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुषार कणों को।"

जनवादी कवि।

केदारनाथ सिंह

"बाघ। वह आदमी बाघ की तरह था। उसकी आँखों में जंगल था।"

समकालीन कविता के स्तंभ।

कुंवर नारायण

"आत्मजयी। जीवन एक संघर्ष है, आत्मा से आत्मा का।"

बौद्धिक कविता के प्रतिनिधि।

दुष्यंत कुमार

"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए। इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए॥"

नई गज़ल के जनक।

✍️

शायरी संग्रह

आध्यात्मिक और प्रेरणादायक शायरी

मिर्ज़ा ग़ालिब

"हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले॥"

अल्लामा इक़बाल

"ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले।
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है॥"

फ़िराक़ गोरखपुरी

"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ।
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ॥"

जिगर मुरादाबादी

"येह इश्क़ नहीं आसां इतना तो समझ लीजे।
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है॥"

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग।
मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात॥"

साहिर लुधियानवी

"मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया।
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया॥"

कैफ़ी आज़मी

"कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियों।
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों॥"

जौन एलिया

"मोहब्बत करने वाले कम न होंगे।
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे॥"

अहमद फ़राज़

"रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ।
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ॥"

बशीर बद्र

"कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे।
हम ख़याल में डूबे, नज़ारे देखते रहे॥"

नीदा फ़ाज़ली

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता।
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता॥"

गुलज़ार

"तन्हाई में यूँ तेरी याद आती है।
जैसे सूखे फूलों में ख़ुशबू आती है॥"

जावेद अख़्तर

"तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो।
क्या ग़म है जिसको छुपा रहे हो॥"

राहत इंदौरी

"किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है।
ये सबका है, ये तेरा है, ये मेरा है॥"

वसीम बरेलवी

"इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया।
वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया॥"

मुनव्वर राना

"दिल में तुम्हारी याद बसी है।
आँखों में तुम्हारी तस्वीर सजी है॥"

कुमार विश्वास

"कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है।
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है॥"

हरिवंश राय बच्चन

"मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ।
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ॥"

दुष्यंत कुमार

"हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए।
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए॥"

अदम गोंडवी

"मुल्क की सरहद पे फ़ौजी मर रहे हैं।
और शहरों में महलों में दावतें हैं॥"

मजाज़ लखनवी

"ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ।
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग॥"

जोश मलीहाबादी

"मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर।
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया॥"

हसरत मोहानी

"चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है।
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है॥"

मख़दूम मोहिउद्दीन

"आओ कि कोई ख़्वाब बुनें, कल की बात करें।
हाथ में हाथ डाले चाँद-तारों की सैर करें॥"

कैफ़ भोपाली

"हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफ़िर की तरह।
देख लेंगे तुझको यारब, देख लेंगे अपने महबूब को॥"

शकील बदायूँनी

"ग़म दिये मुस्तक़िल किसने तुझे, ऐ दिल बता।
तूने किस मुजरिम को पनाह दे रखी है॥"

मजरूह सुल्तानपुरी

"फिर छिड़ी रात बात फूलों की, रात है या बारात फूलों की।
कैसे कहूँ मैं तुमसे, ये राज़ दिल का॥"

राजा मेहदी अली ख़ान

"दिल की दुनिया में बसा लूँगा तुझे।
आँखों में सजा लूँगा तुझे॥"

क़तील शिफ़ाई

"चाँद सी महबूबा हो मेरी, कब ऐसा मैंने सोचा था।
दिल की दुनिया में बसा लूँगा तुझे॥"

इंदीवर

"तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है।
मैं हूँ यहाँ, तुम हो वहाँ, ये कैसा प्यार है॥"

आनंद बख़्शी

"मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू।
आई रुत मस्तानी कब आएगी तू॥"

समीर

"तुम्हें अपना बनाने की क़सम खाई है।
मोहब्बत की है तुमसे, ये दुहाई है॥"

प्रसून जोशी

"मन मस्त हुआ, यार मस्त हुआ।
दिल बेक़रार हुआ, प्यार मस्त हुआ॥"

इरशाद कामिल

"तुम हो तो लगता है, ज़िंदगी में कुछ है।
वरना ये दिल तो बस एक खाली घर है॥"

अमिताभ भट्टाचार्य

"कभी कभी अदिति ज़िंदगी में, यूँ ही कोई अपना लगता है।
कभी कभी अदिति वो बिछड़ के, फिर नहीं मिलता है॥"

मनोज मुंतशिर

"तेरे संग यारा, खुशरंग बहारा।
तेरे रंग यारा, रंगा मेरा मन॥"

स्वानंद किरकिरे

"बंदे में था दम, वो काम कर गया।
बंदे ने ठाना, तो आसमान झुका॥"

मीर तक़ी मीर

"दिल की वीरानी का क्या मज़ा है मीर।
ये घर तो अच्छा है पर उजड़ा हुआ अच्छा है॥"

दाग़ देहलवी

"ग़ालिब छुटी शराब पर अब भी कभी कभी।
पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में॥"

ज़फ़र गोरखपुरी

"रहे न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी।
तो किस उम्मीद पे कहिए कि आरज़ू क्या है॥"

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श्लोक संग्रह

पवित्र संस्कृत श्लोक और उनके अर्थ

गायत्री मंत्र - ऋग्वेद

"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥"

अर्थ: हम उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को अपनी अन्तरात्मा में धारण करें।

महामृत्युंजय मंत्र - ऋग्वेद

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥"

अर्थ: हम त्रिनेत्रधारी शिव की आराधना करते हैं। वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें, जैसे खीरा बेल से अलग होता है।

गणेश वंदना

"वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥"

अर्थ: हे वक्रतुण्ड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी गणेश! मेरे सभी कार्यों में सदा विघ्न दूर करें।

सरस्वती वंदना

"या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥"

अर्थ: जो कुन्द के फूल, चन्द्रमा, हिमराशि और मोती के हार के समान धवल हैं, जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा है।

भगवद्गीता - कर्मयोग

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"

अर्थ: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, फल में कभी नहीं। कर्मफल का हेतु मत बनो और अकर्म में भी आसक्ति न हो।

भगवद्गीता - आत्मज्ञान

"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"

अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है न मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।

भगवद्गीता - समत्व

"योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥"

अर्थ: हे अर्जुन! आसक्ति छोड़कर, सिद्धि-असिद्धि में समान भाव रखते हुए योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समत्व योग कहलाता है।

भगवद्गीता - ज्ञानयोग

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"

अर्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

भगवद्गीता - भक्तियोग

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥"

अर्थ: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो, मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही प्राप्त होगे, यह मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ।

ईशावास्योपनिषद्

"ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥"

अर्थ: इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है। त्याग से भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो।

कठोपनिषद्

"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥"

अर्थ: उठो, जागो और श्रेष्ठ गुरुओं से ज्ञान प्राप्त करो। यह मार्ग छुरे की धार जैसा कठिन है, ऐसा ज्ञानी कहते हैं।

मुण्डकोपनिषद्

"सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥"

अर्थ: सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से ही देवयान मार्ग विस्तृत है, जिससे ऋषि परम सत्य को प्राप्त करते हैं।

तैत्तिरीयोपनिषद्

"सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥"

अर्थ: ईश्वर हम दोनों की रक्षा करे, हम दोनों का पालन करे। हम दोनों मिलकर सामर्थ्य अर्जित करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम द्वेष न करें।

श्वेताश्वतरोपनिषद्

"त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥"

अर्थ: हे देव! तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बंधु और सखा हो। तुम ही विद्या और धन हो, तुम ही मेरा सब कुछ हो।

रामायण - मंगलाचरण

"मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥"

अर्थ: जिनकी कृपा से गूंगा वाचाल हो जाता है और लंगड़ा पर्वत लांघ जाता है, उन परमानंद माधव को मैं वंदन करता हूँ।

रामायण - राम स्तुति

"रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे। रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः॥"

अर्थ: राम राजाओं में मणि हैं, सदा विजयी हैं। मैं रमेश राम को भजता हूँ। राम ने राक्षसों का संहार किया, उन राम को नमस्कार।

महाभारत - धर्म

"अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च। अहिंसा परमो धर्मः स च धर्मः सनातनः॥"

अर्थ: अहिंसा परम धर्म है, धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी धर्म है। अहिंसा परम धर्म है और यही सनातन धर्म है।

महाभारत - सत्य

"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥"

अर्थ: सत्य बोलो, प्रिय बोलो, अप्रिय सत्य मत बोलो। प्रिय असत्य भी मत बोलो, यही सनातन धर्म है।

विष्णु सहस्रनाम

"शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥"

अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, जो देवों के स्वामी, विश्व के आधार हैं।

शिव महिम्न स्तोत्र

"महादेवं सुरगणं परमेश्वरं परात्परम्। पूर्णं पुण्यं पवित्रं च पापघ्नं पुण्यवर्धनम्॥"

अर्थ: महादेव देवों में श्रेष्ठ, परमेश्वर, परात्पर, पूर्ण, पुण्यमय, पवित्र, पापनाशक और पुण्यवर्धक हैं।

दुर्गा सप्तशती

"सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: हे सर्वमंगला, कल्याणमयी, शिवा, सब कार्यों को सिद्ध करने वाली, शरणदायिनी, त्रिनेत्रधारिणी गौरी नारायणी! तुम्हें नमस्कार।

हनुमान चालीसा

"मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥"

अर्थ: मन के समान वेगशाली, वायु के समान तीव्र, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानरों के मुख्य, श्रीराम के दूत की शरण लेता हूँ।

लक्ष्मी स्तोत्र

"नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥"

अर्थ: हे महामाया, श्रीपीठ, देवों द्वारा पूजित, शंख-चक्र-गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार।

सूर्य स्तोत्र

"आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। आयुः प्रज्ञा बलं वीर्यं तेजस्तेषां च जायते॥"

अर्थ: जो प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करते हैं, उनमें आयु, बुद्धि, बल, वीर्य और तेज की वृद्धि होती है।

चाणक्य नीति

"विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥"

अर्थ: विद्या से विनय आती है, विनय से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।

चाणक्य नीति - मित्रता

"अति परिचयात् अवज्ञा संततगमनात् अनादरो भवति। मलये भिल्लपुरन्ध्री चन्दनतरुं इन्धनं करोति॥"

अर्थ: अधिक परिचय से अवज्ञा और बार-बार जाने से अनादर होता है। मलय पर्वत की भीलनी चंदन को जलाने के लिए प्रयोग करती है।

भर्तृहरि - नीतिशतक

"क्षमा बलमशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा। क्षमा वशीकृते लोके क्षमया किं न साध्यते॥"

अर्थ: क्षमा असमर्थों का बल है और समर्थों का आभूषण। क्षमा से संसार वश में होता है, क्षमा से क्या सिद्ध नहीं होता?

भर्तृहरि - वैराग्यशतक

"भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥"

अर्थ: हमने भोग नहीं भोगे, भोगों ने हमें भोगा। हमने तप नहीं किया, हम ही तपे। काल नहीं गया, हम ही चले गए। तृष्णा नहीं मरी, हम ही मर गए।

कालिदास - मेघदूत

"कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारप्रमत्तः शापेनास्तंगमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः।"

अर्थ: कोई यक्ष प्रिया के वियोग से व्याकुल होकर अपने कर्तव्य में प्रमाद करने के कारण स्वामी के शाप से एक वर्ष के लिए अपनी महिमा खो बैठा।

कालिदास - रघुवंश

"वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥"

अर्थ: वाणी और अर्थ के ज्ञान के लिए, जो वाक् और अर्थ की तरह अभिन्न हैं, उन जगत के माता-पिता पार्वती-परमेश्वर को वंदन करता हूँ।

सुभाषित - विद्या

"विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय। खलस्य साधोर्विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥"

अर्थ: दुष्ट की विद्या विवाद के लिए, धन मद के लिए, शक्ति दूसरों को पीड़ा देने के लिए होती है। सज्जन में यह विपरीत है - ज्ञान, दान और रक्षा के लिए।

सुभाषित - समय

"काल: पचति भूतानि काल: संहरते प्रजा:। काल: सुप्तेषु जागर्ति कालो हि दुरतिक्रम:॥"

अर्थ: काल सब प्राणियों को पकाता है, काल प्रजा का संहार करता है। सोते हुओं में भी काल जागता रहता है। काल अति दुर्जेय है।

सुभाषित - सत्संग

"सङ्गति: सज्जनैः किं न करोति पुंसाम्। आकर्षति लोहमपि तत्स्वगुणं दधाति॥"

अर्थ: सज्जनों का संग मनुष्य का क्या नहीं कर देता? चुंबक लोहे को अपनी ओर खींचता है और अपना गुण भी दे देता है।

सुभाषित - परोपकार

"परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥"

अर्थ: वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियाँ परोपकार के लिए बहती हैं, गायें परोपकार के लिए दूध देती हैं। यह शरीर भी परोपकार के लिए है।

सुभाषित - धैर्य

"उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥"

अर्थ: कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं। सोते हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते।

सुभाषित - संतोष

"संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तिरेव च। न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥"

अर्थ: संतोष रूपी अमृत से तृप्त लोगों को जो सुख और शांति मिलती है, वह धन के लोभी इधर-उधर भागने वालों को नहीं मिलती।

सुभाषित - मित्रता

"आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि। आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥"

अर्थ: विपत्ति के लिए धन की रक्षा करो, धन से परिवार की रक्षा करो। परंतु अपनी आत्मा की रक्षा परिवार और धन से भी करो।

योग सूत्र - पतंजलि

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥"

अर्थ: योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।

वेदान्त सार

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः। अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः॥"

अर्थ: ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या है, जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है। यही वेदांत का सार है।

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मंत्र विज्ञान

शक्तिशाली वैदिक मंत्र और उनका महत्व

ॐ - प्रणव मंत्र

"ॐ" - यह ब्रह्मांड का प्रथम नाद है। इसे प्रणव मंत्र कहा जाता है। यह सभी मंत्रों का मूल है और परमात्मा का प्रतीक है। इसके उच्चारण से मन शांत होता है।

शांति मंत्र - सार्वभौमिक कल्याण

"ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥"

सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

महालक्ष्मी मंत्र - धन समृद्धि

"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद। श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥"

धन, समृद्धि और सौभाग्य के लिए माता लक्ष्मी का मंत्र। इससे आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।

हनुमान बीज मंत्र - बल साहस

"ॐ हं हनुमते नमः"

बल, साहस और संकट निवारण के लिए हनुमान जी का बीज मंत्र। इसके जाप से भय दूर होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।

गणेश मूल मंत्र - विघ्नहर्ता

"ॐ गं गणपतये नमः"

सभी विघ्नों को दूर करने वाला गणेश जी का बीज मंत्र। नए कार्य की शुरुआत में इसका जाप अत्यंत शुभ है।

सरस्वती मंत्र - विद्या बुद्धि

"ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः"

विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी सरस्वती का बीज मंत्र। विद्यार्थियों के लिए विशेष लाभकारी।

शिव पंचाक्षर मंत्र

"ॐ नमः शिवाय"

भगवान शिव का पंचाक्षर मंत्र। यह मोक्ष प्रदान करने वाला महामंत्र है। इसके जाप से मन की शुद्धि होती है।

विष्णु मंत्र - पालनहार

"ॐ नमो नारायणाय"

भगवान विष्णु का अष्टाक्षर मंत्र। यह रक्षा और पालन करने वाला मंत्र है। शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

दुर्गा मंत्र - शक्ति स्वरूपा

"ॐ दुं दुर्गायै नमः"

माँ दुर्गा का बीज मंत्र। संकट निवारण और शत्रु नाश के लिए अत्यंत प्रभावशाली। नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है।

काली मंत्र - महाशक्ति

"ॐ क्रीं कालिकायै नमः"

माँ काली का बीज मंत्र। अत्यंत शक्तिशाली मंत्र जो भय, रोग और शत्रु से रक्षा करता है।

राम मंत्र - मर्यादा पुरुषोत्तम

"ॐ श्री रामाय नमः"

भगवान राम का मंत्र। धर्म, सत्य और न्याय का प्रतीक। इससे चरित्र में दृढ़ता आती है।

कृष्ण मंत्र - योगेश्वर

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

भगवान कृष्ण का द्वादशाक्षर मंत्र। प्रेम, भक्ति और आनंद प्रदान करने वाला मंत्र।

सूर्य बीज मंत्र - प्रकाश दाता

"ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः"

सूर्य देव का बीज मंत्र। स्वास्थ्य, तेज और सफलता के लिए। रविवार को विशेष फलदायी।

चंद्र मंत्र - मन का स्वामी

"ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः"

चंद्र देव का मंत्र। मानसिक शांति, भावनात्मक संतुलन और शीतलता प्रदान करता है।

मंगल मंत्र - शक्ति साहस

"ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः"

मंगल ग्रह का मंत्र। साहस, शक्ति और संपत्ति में वृद्धि। मंगलवार को जाप करें।

बुध मंत्र - बुद्धि विवेक

"ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः"

बुध ग्रह का मंत्र। बुद्धि, विवेक, वाणी और व्यापार में सफलता के लिए।

गुरु मंत्र - ज्ञान देव

"ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः"

बृहस्पति देव का मंत्र। ज्ञान, धन, संतान और सौभाग्य प्रदान करता है।

शुक्र मंत्र - सौंदर्य समृद्धि

"ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः"

शुक्र ग्रह का मंत्र। सौंदर्य, कला, प्रेम और वैभव की प्राप्ति के लिए।

शनि मंत्र - न्याय देव

"ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः"

शनि देव का मंत्र। कर्म फल, न्याय और अनुशासन। शनि दोष निवारण के लिए।

राहु मंत्र - छाया ग्रह

"ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः"

राहु का मंत्र। भ्रम दूर करने और अप्रत्याशित लाभ के लिए। राहु काल में जाप करें।

केतु मंत्र - मोक्ष कारक

"ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः"

केतु का मंत्र। आध्यात्मिक उन्नति, मोक्ष और गुप्त ज्ञान की प्राप्ति के लिए।

नवग्रह मंत्र - सामूहिक शांति

"ॐ नवग्रहाय नमः"

सभी नौ ग्रहों की शांति के लिए सामूहिक मंत्र। ग्रह दोष निवारण में सहायक।

महाकाली मंत्र - काल विजय

"ॐ क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा"

माँ महाकाली का विशेष मंत्र। अत्यंत शक्तिशाली, गुरु मार्गदर्शन में जाप करें।

त्रिपुर सुंदरी मंत्र

"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुरसुन्दर्यै नमः"

माँ त्रिपुर सुंदरी का मंत्र। सौंदर्य, आकर्षण और सिद्धि प्रदान करता है।

भुवनेश्वरी मंत्र - जगत जननी

"ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः"

माँ भुवनेश्वरी का मंत्र। संसार की स्वामिनी की कृपा से सभी सुख प्राप्त होते हैं।

छिन्नमस्ता मंत्र - आत्म बलिदान

"ॐ ह्रीं ऐं वज्रवैरोचनीयै हूं हूं फट् स्वाहा"

माँ छिन्नमस्ता का मंत्र। आत्म नियंत्रण और शत्रु विनाश के लिए।

धूमावती मंत्र - विधवा देवी

"ॐ धूं धूं धूमावत्यै स्वाहा"

माँ धूमावती का मंत्र। वैराग्य, ज्ञान और शत्रु स्तंभन के लिए।

बगलामुखी मंत्र - स्तंभन शक्ति

"ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिह्वां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा"

माँ बगलामुखी का मंत्र। शत्रु स्तंभन, वाद-विवाद में विजय के लिए अत्यंत प्रभावशाली।

मातंगी मंत्र - वाणी सिद्धि

"ॐ ह्रीं ऐं भगवती मातंगेश्वरी श्रीं स्वाहा"

माँ मातंगी का मंत्र। वाणी सिद्धि, संगीत और कला में निपुणता के लिए।

कमला मंत्र - लक्ष्मी स्वरूपा

"ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कमलात्मिकायै स्वाहा"

माँ कमला (लक्ष्मी) का मंत्र। धन, वैभव और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए।

अन्नपूर्णा मंत्र - अन्न देवी

"ॐ ह्रीं नमो भगवती महामाये अन्नपूर्णे स्वाहा"

माँ अन्नपूर्णा का मंत्र। अन्न, धन और पोषण की कभी कमी न हो।

संतान गोपाल मंत्र

"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥"

संतान प्राप्ति के लिए भगवान कृष्ण का मंत्र। निःसंतान दंपत्ति के लिए।

धन्वंतरि मंत्र - आरोग्य देव

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलश हस्ताय सर्वामय विनाशनाय त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे नमः"

भगवान धन्वंतरि का मंत्र। स्वास्थ्य, रोग निवारण और दीर्घायु के लिए।

नृसिंह मंत्र - रक्षा कवच

"ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥"

भगवान नृसिंह का मंत्र। भय, शत्रु और संकट से सर्वोच्च रक्षा।

हयग्रीव मंत्र - ज्ञान अवतार

"ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्री हयग्रीवाय नमः"

भगवान हयग्रीव का मंत्र। वेद ज्ञान, बुद्धि और स्मरण शक्ति के लिए।

वराह मंत्र - भू उद्धारक

"ॐ नमो भगवते वराहाय पृथ्वीधराय नमः"

भगवान वराह का मंत्र। भूमि, संपत्ति और स्थिरता प्रदान करता है।

कूर्म मंत्र - धैर्य अवतार

"ॐ नमो भगवते कूर्मदेवाय नमः"

भगवान कूर्म का मंत्र। धैर्य, स्थिरता और दीर्घायु के लिए।

मत्स्य मंत्र - प्रलय रक्षक

"ॐ नमो भगवते मत्स्यरूपाय नमः"

भगवान मत्स्य का मंत्र। संकट से रक्षा और ज्ञान संरक्षण के लिए।

परशुराम मंत्र - क्षत्रिय विनाशक

"ॐ नमो भगवते परशुरामाय सहस्रबाहवे सहस्रवदनाय नमः"

भगवान परशुराम का मंत्र। शत्रु विनाश और न्याय के लिए।

वामन मंत्र - त्रिविक्रम

"ॐ नमो भगवते वामनाय त्रिविक्रमाय नमः"

भगवान वामन का मंत्र। विनम्रता में महानता और सफलता के लिए।

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सूत्र ज्ञान

प्राचीन भारतीय सूत्र साहित्य

ब्रह्म सूत्र - प्रथम सूत्र

"अथातो ब्रह्मजिज्ञासा" - अब ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए। यह वेदांत दर्शन का मूल सूत्र है जो परम सत्य की खोज का मार्ग दिखाता है। बादरायण द्वारा रचित।

ब्रह्म सूत्र - द्वितीय सूत्र

"जन्माद्यस्य यतः" - जिससे इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होता है, वही ब्रह्म है। यह ब्रह्म की परिभाषा देता है।

ब्रह्म सूत्र - शास्त्र योनित्वात्

"शास्त्रयोनित्वात्" - शास्त्र ही ब्रह्म ज्ञान का स्रोत है। वेद प्रमाण हैं ब्रह्म को जानने के लिए।

ब्रह्म सूत्र - तत्तु समन्वयात्

"तत्तु समन्वयात्" - सभी उपनिषदों का समन्वय एक ही ब्रह्म की ओर संकेत करता है। सभी वेदांत एक सत्य बताते हैं।

योग सूत्र - योग परिभाषा

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" - योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। महर्षि पतंजलि का यह सूत्र योग का सार बताता है। मन की चंचलता को रोकना ही योग है।

योग सूत्र - द्रष्टा स्वरूप

"तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्" - तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। चित्त वृत्ति निरोध से आत्मसाक्षात्कार होता है।

योग सूत्र - अभ्यास वैराग्य

"अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः" - अभ्यास और वैराग्य से चित्त वृत्तियों का निरोध होता है। योग की दो मुख्य साधनाएं।

योग सूत्र - ईश्वर प्रणिधान

"ईश्वरप्रणिधानाद्वा" - ईश्वर के प्रति समर्पण से भी समाधि प्राप्त होती है। भक्ति मार्ग का सूत्र।

योग सूत्र - अष्टांग योग

"यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि" - योग के आठ अंग: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।

योग सूत्र - अहिंसा प्रतिष्ठा

"अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः" - अहिंसा में प्रतिष्ठित व्यक्ति के सामने सभी शत्रुता त्याग देते हैं। अहिंसा की महिमा।

योग सूत्र - सत्य प्रतिष्ठा

"सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्" - सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति के कथन फलीभूत होते हैं। सत्य की शक्ति।

योग सूत्र - संतोष फल

"संतोषादनुत्तमसुखलाभः" - संतोष से अनुपम सुख की प्राप्ति होती है। संतोष सर्वोत्तम धन है।

न्याय सूत्र - प्रथम सूत्र

"प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः"

तर्क और न्याय के 16 पदार्थों का ज्ञान मोक्ष का साधन है। गौतम ऋषि का न्याय दर्शन।

न्याय सूत्र - प्रमाण लक्षण

"प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि" - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द ये चार प्रमाण हैं। ज्ञान के साधन।

न्याय सूत्र - प्रत्यक्ष परिभाषा

"इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्" - इंद्रिय और विषय के संयोग से उत्पन्न निश्चयात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष है।

मीमांसा सूत्र - प्रथम सूत्र

"अथातो धर्मजिज्ञासा" - अब धर्म की जिज्ञासा करनी चाहिए। यह कर्मकांड और वैदिक यज्ञों का मूल सूत्र है। जैमिनि द्वारा रचित।

मीमांसा सूत्र - धर्म लक्षण

"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" - वेद विधि से जाना गया अर्थ धर्म है। वेद ही धर्म का स्रोत है।

मीमांसा सूत्र - वेद प्रामाण्य

"अतो देवताधिकरणम्" - देवताओं के विषय में वेद ही प्रमाण है। वेद की अपौरुषेयता।

सांख्य सूत्र - दुःख निवृत्ति

"अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः" - तीन प्रकार के दुःखों की पूर्ण निवृत्ति परम पुरुषार्थ है। कपिल मुनि का सांख्य दर्शन।

सांख्य सूत्र - प्रकृति पुरुष

"प्रकृतिः पुरुषश्च" - प्रकृति और पुरुष दो स्वतंत्र तत्व हैं। सांख्य का द्वैतवाद।

सांख्य सूत्र - गुण त्रय

"सत्त्वरजस्तमांसि गुणाः" - सत्व, रजस और तमस तीन गुण हैं। प्रकृति के तीन मूल गुण।

वैशेषिक सूत्र - पदार्थ ज्ञान

"यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः" - जिससे अभ्युदय और निःश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। कणाद मुनि का वैशेषिक दर्शन।

वैशेषिक सूत्र - षट् पदार्थ

"द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम्" - छह पदार्थों का ज्ञान मोक्ष का साधन है।

वैशेषिक सूत्र - परमाणु वाद

"द्रव्याणि द्रव्यान्तरसमवायात् संयोगविभागेष्वनपेक्षाणि" - परमाणु अविभाज्य हैं। भारतीय परमाणु सिद्धांत।

अर्थशास्त्र सूत्र - राज्य धर्म

"प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥" - प्रजा के सुख में राजा का सुख है। चाणक्य का अर्थशास्त्र।

अर्थशास्त्र सूत्र - राजनीति

"सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलमर्थः अर्थस्य मूलं राज्यम्" - सुख का मूल धर्म, धर्म का मूल अर्थ और अर्थ का मूल राज्य है।

अर्थशास्त्र सूत्र - मित्र शत्रु

"षाड्गुण्यं मण्डलम्" - राजमंडल में छह गुण नीति: संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और संश्रय।

कामसूत्र - काम धर्म अर्थ

"धर्मार्थकामेभ्यो नमः" - धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों को नमस्कार। वात्स्यायन का कामसूत्र।

कामसूत्र - त्रिवर्ग साधन

"त्रिवर्गस्य साधनं शास्त्रम्" - धर्म, अर्थ, काम तीनों की साधना का शास्त्र। संतुलित जीवन का मार्ग।

नाट्यशास्त्र सूत्र - रस सिद्धांत

"विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" - विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र।

नाट्यशास्त्र सूत्र - नव रस

"श्रृंगारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकबीभत्साद्भुतशान्ताः रसाः" - नौ रस: शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शांत।

धर्मशास्त्र सूत्र - आश्रम धर्म

"ब्रह्मचर्यं गृहस्थं वानप्रस्थं संन्यासश्चेत्याश्रमाः" - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास चार आश्रम हैं। मनुस्मृति।

धर्मशास्त्र सूत्र - वर्ण धर्म

"अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत्॥" - ब्राह्मण के छह कर्म: अध्यापन, अध्ययन, यजन, याजन, दान और प्रतिग्रह।

धर्मशास्त्र सूत्र - पंच महायज्ञ

"ब्रह्मयज्ञो देवयज्ञः पितृयज्ञो मनुष्ययज्ञो भूतयज्ञश्च" - पांच महायज्ञ: ब्रह्म, देव, पितृ, मनुष्य और भूत यज्ञ। गृहस्थ के पांच दैनिक कर्तव्य।

आयुर्वेद सूत्र - त्रिदोष

"वातपित्तकफा दोषाः" - वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। चरक संहिता का मूल सिद्धांत।

आयुर्वेद सूत्र - स्वस्थ लक्षण

"समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥" - संतुलित दोष, अग्नि, धातु, मल और प्रसन्न मन वाला व्यक्ति स्वस्थ है।

आयुर्वेद सूत्र - आहार विहार

"हितभुक् मितभुक् ऋतुभुक्" - हितकारी, मितव्ययी और ऋतु अनुसार भोजन करना चाहिए। स्वास्थ्य का मूल मंत्र।

ज्योतिष सूत्र - ग्रह फल

"होराशास्त्रं फलज्ञानम्" - होरा शास्त्र से फल का ज्ञान होता है। वराहमिहिर का ज्योतिष।

ज्योतिष सूत्र - राशि चक्र

"मेषवृषमिथुनकर्कटसिंहकन्याः तुलावृश्चिकधनुर्मकरकुम्भमीनाः" - बारह राशियां: मेष से मीन तक। राशि चक्र का क्रम।

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यंत्र विद्या

पवित्र यंत्र और उनकी शक्ति

श्री यंत्र - महायंत्र

श्री यंत्र सबसे शक्तिशाली यंत्र है। इसमें 9 त्रिकोण होते हैं जो ब्रह्मांड की संरचना को दर्शाते हैं। यह धन, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। माता त्रिपुर सुंदरी का प्रतीक।

गणेश यंत्र - विघ्नहर्ता

विघ्नहर्ता गणेश का यंत्र सभी बाधाओं को दूर करता है। नए कार्य की शुरुआत में इसकी पूजा अत्यंत शुभ मानी जाती है। बुधवार को स्थापना करें।

नवग्रह यंत्र - ग्रह शांति

नौ ग्रहों की शांति के लिए नवग्रह यंत्र की स्थापना की जाती है। यह ज्योतिषीय दोषों को दूर करने में सहायक है। सभी ग्रहों का सामूहिक प्रभाव संतुलित करता है।

महामृत्युंजय यंत्र - अमृत यंत्र

भगवान शिव का यह यंत्र दीर्घायु, स्वास्थ्य और मृत्यु भय से मुक्ति प्रदान करता है। गंभीर रोगों में इसकी पूजा लाभकारी है। सोमवार को स्थापित करें।

महालक्ष्मी यंत्र - धन यंत्र

माता लक्ष्मी का यंत्र धन, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है। व्यापार में वृद्धि और आर्थिक स्थिरता के लिए। शुक्रवार को पूजा करें।

सरस्वती यंत्र - विद्या यंत्र

माता सरस्वती का यंत्र विद्या, बुद्धि और ज्ञान प्रदान करता है। विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए विशेष लाभकारी। बसंत पंचमी पर स्थापना शुभ।

दुर्गा यंत्र - शक्ति यंत्र

माँ दुर्गा का यंत्र शत्रु नाश, संकट निवारण और शक्ति प्रदान करता है। नवरात्रि में इसकी स्थापना अत्यंत शुभ। नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है।

काली यंत्र - महाशक्ति यंत्र

माँ काली का यंत्र अत्यंत शक्तिशाली है। भय, रोग और शत्रु से रक्षा करता है। तांत्रिक साधना में प्रयुक्त। गुरु मार्गदर्शन में स्थापित करें।

हनुमान यंत्र - बल यंत्र

हनुमान जी का यंत्र बल, साहस और संकट मोचन प्रदान करता है। मंगलवार और शनिवार को पूजा करें। भूत-प्रेत बाधा से रक्षा करता है।

शिव यंत्र - कल्याण यंत्र

भगवान शिव का यंत्र मोक्ष, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है। सोमवार को दूध से अभिषेक करें। मन की शुद्धि करता है।

विष्णु यंत्र - पालन यंत्र

भगवान विष्णु का यंत्र रक्षा, पालन और समृद्धि प्रदान करता है। एकादशी को स्थापना शुभ। परिवार में शांति और सुख लाता है।

कुबेर यंत्र - धन भंडार

धन के देवता कुबेर का यंत्र अपार धन और समृद्धि प्रदान करता है। तिजोरी या कैश बॉक्स के पास रखें। धनतेरस पर स्थापना शुभ।

बगलामुखी यंत्र - स्तंभन यंत्र

माँ बगलामुखी का यंत्र शत्रु स्तंभन और वाद-विवाद में विजय प्रदान करता है। कानूनी मामलों में अत्यंत प्रभावशाली। पीले रंग से पूजा करें।

त्रिपुर सुंदरी यंत्र - सौंदर्य यंत्र

माँ त्रिपुर सुंदरी का यंत्र सौंदर्य, आकर्षण और सिद्धि प्रदान करता है। श्री विद्या साधना का मूल यंत्र। शुक्रवार को पूजा करें।

भुवनेश्वरी यंत्र - जगत यंत्र

माँ भुवनेश्वरी का यंत्र संसार की सभी सुख-सुविधाएं प्रदान करता है। गृह सुख और पारिवारिक समृद्धि के लिए। घर के मुख्य द्वार पर स्थापित करें।

छिन्नमस्ता यंत्र - आत्म नियंत्रण

माँ छिन्नमस्ता का यंत्र आत्म नियंत्रण और शत्रु विनाश के लिए। अत्यंत शक्तिशाली तांत्रिक यंत्र। केवल गुरु मार्गदर्शन में स्थापित करें।

धूमावती यंत्र - वैराग्य यंत्र

माँ धूमावती का यंत्र वैराग्य, ज्ञान और शत्रु स्तंभन के लिए। विधवाओं की रक्षक देवी। शनिवार को पूजा करें।

मातंगी यंत्र - वाणी यंत्र

माँ मातंगी का यंत्र वाणी सिद्धि, संगीत और कला में निपुणता प्रदान करता है। कलाकारों और वक्ताओं के लिए विशेष। बुधवार को पूजा करें।

कमला यंत्र - लक्ष्मी यंत्र

माँ कमला (लक्ष्मी) का यंत्र धन, वैभव और सौभाग्य प्रदान करता है। दीपावली पर स्थापना अत्यंत शुभ। कमल पुष्प से पूजा करें।

सूर्य यंत्र - तेज यंत्र

सूर्य देव का यंत्र स्वास्थ्य, तेज और सफलता प्रदान करता है। रविवार को प्रातःकाल स्थापित करें। लाल फूल और गुड़ चढ़ाएं।

चंद्र यंत्र - मन यंत्र

चंद्र देव का यंत्र मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन प्रदान करता है। सोमवार को दूध से अभिषेक करें। सफेद फूल चढ़ाएं।

मंगल यंत्र - शक्ति यंत्र

मंगल ग्रह का यंत्र साहस, शक्ति और संपत्ति प्रदान करता है। मंगलवार को लाल वस्त्र से पूजा करें। मंगल दोष निवारण में सहायक।

बुध यंत्र - बुद्धि यंत्र

बुध ग्रह का यंत्र बुद्धि, विवेक और व्यापार में सफलता प्रदान करता है। बुधवार को हरे रंग से पूजा करें। विद्यार्थियों के लिए लाभकारी।

गुरु यंत्र - ज्ञान यंत्र

बृहस्पति देव का यंत्र ज्ञान, धन और संतान सुख प्रदान करता है। गुरुवार को पीले फूल और चने की दाल चढ़ाएं। गुरु दोष निवारण में सहायक।

शुक्र यंत्र - सौंदर्य यंत्र

शुक्र ग्रह का यंत्र सौंदर्य, कला, प्रेम और वैभव प्रदान करता है। शुक्रवार को सफेद फूल और मिठाई चढ़ाएं। वैवाहिक सुख के लिए।

शनि यंत्र - न्याय यंत्र

शनि देव का यंत्र कर्म फल, न्याय और अनुशासन प्रदान करता है। शनिवार को तेल का दीपक जलाएं। शनि दोष और साढ़े साती से रक्षा करता है।

राहु यंत्र - छाया यंत्र

राहु का यंत्र भ्रम दूर करने और अप्रत्याशित लाभ के लिए। राहु काल में नीले फूल चढ़ाएं। राहु दोष निवारण में प्रभावशाली।

केतु यंत्र - मोक्ष यंत्र

केतु का यंत्र आध्यात्मिक उन्नति, मोक्ष और गुप्त ज्ञान प्रदान करता है। मंगलवार को धूप-दीप से पूजा करें। केतु दोष निवारण में सहायक।

वास्तु यंत्र - गृह शांति

वास्तु दोष निवारण के लिए वास्तु यंत्र की स्थापना करें। घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित करें।

संतान गोपाल यंत्र - संतान यंत्र

संतान प्राप्ति और संतान सुख के लिए संतान गोपाल यंत्र। निःसंतान दंपत्ति के लिए विशेष। गुरुवार को पूजा करें।

महासुदर्शन यंत्र - रक्षा यंत्र

भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का यंत्र सर्वोच्च रक्षा प्रदान करता है। नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है। एकादशी को स्थापित करें।

नृसिंह यंत्र - भय नाशक

भगवान नृसिंह का यंत्र भय, शत्रु और संकट से रक्षा करता है। अत्यंत शक्तिशाली रक्षा यंत्र। प्रदोष काल में पूजा करें।

हयग्रीव यंत्र - विद्या यंत्र

भगवान हयग्रीव का यंत्र वेद ज्ञान, बुद्धि और स्मरण शक्ति प्रदान करता है। विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी। बुधवार को पूजा करें।

धन्वंतरि यंत्र - आरोग्य यंत्र

भगवान धन्वंतरि का यंत्र स्वास्थ्य, रोग निवारण और दीर्घायु प्रदान करता है। धनतेरस पर स्थापना शुभ। तुलसी पत्र चढ़ाएं।

राम यंत्र - मर्यादा यंत्र

भगवान राम का यंत्र धर्म, सत्य और न्याय प्रदान करता है। चरित्र में दृढ़ता लाता है। रामनवमी पर स्थापना शुभ।

कृष्ण यंत्र - प्रेम यंत्र

भगवान कृष्ण का यंत्र प्रेम, भक्ति और आनंद प्रदान करता है। जन्माष्टमी पर स्थापना शुभ। मक्खन और मिश्री चढ़ाएं।

अन्नपूर्णा यंत्र - अन्न यंत्र

माँ अन्नपूर्णा का यंत्र अन्न, धन और पोषण की कभी कमी न हो। रसोई में स्थापित करें। अन्नकूट पर पूजा करें।

सर्व कार्य सिद्धि यंत्र

सभी कार्यों की सिद्धि के लिए यह यंत्र अत्यंत प्रभावशाली है। व्यापार, नौकरी और व्यक्तिगत लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक। बुधवार को स्थापित करें।

सर्व रक्षा यंत्र - सुरक्षा यंत्र

सभी प्रकार के संकटों, दुर्घटनाओं और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करता है। यात्रा के समय साथ रखें। मंगलवार को स्थापित करें।

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दोहा संग्रह

संत कवियों के अमर दोहे

कबीर - माला फेरत

"माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥"

अर्थ: माला फेरने से कुछ नहीं होता, मन को बदलना जरूरी है। बाहरी आडंबर से ज्यादा आंतरिक शुद्धि महत्वपूर्ण है।

कबीर - बुरा जो देखन

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥"

अर्थ: जब मैंने अपने भीतर झांका तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं। आत्म-निरीक्षण का महत्व।

कबीर - पोथी पढ़ि

"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥"

अर्थ: किताबें पढ़ने से ज्ञानी नहीं बनते, प्रेम का पाठ पढ़ने वाला ही सच्चा पंडित है।

कबीर - साईं इतना दीजिये

"साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥"

अर्थ: हे प्रभु! इतना दो कि परिवार का पालन हो सके और अतिथि को भी खिला सकूं। संतोष का संदेश।

कबीर - चलती चक्की देख

"चलती चक्की देख कर, दिया कबीरा रोय।
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥"

अर्थ: समय की चक्की में सब पिस जाते हैं। जीवन की नश्वरता का बोध।

कबीर - दुख में सुमिरन

"दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे होय॥"

अर्थ: सभी दुख में भगवान को याद करते हैं, सुख में भी याद करो तो दुख आएगा ही नहीं।

कबीर - गुरु गोविंद

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"

अर्थ: गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो गुरु के चरण छुओ, क्योंकि गुरु ने ही भगवान से मिलाया।

कबीर - निंदक नियरे राखिये

"निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥"

अर्थ: निंदा करने वाले को पास रखो, वह बिना साबुन के तुम्हें साफ कर देता है। आत्म-सुधार का माध्यम।

रहीम - धागा प्रेम का

"रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाय॥"

अर्थ: प्रेम के धागे को सावधानी से रखना चाहिए। एक बार टूटने पर गांठ पड़ जाती है।

रहीम - रहिमन पानी राखिये

"रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती मानुष चून॥"

अर्थ: पानी तीन अर्थों में रखना चाहिए - मोती की चमक, आटे की लोई और मनुष्य की इज्जत।

रहीम - बड़े बड़ाई ना करें

"बड़े बड़ाई ना करें, बड़े न बोलें बोल।
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल॥"

अर्थ: बड़े लोग अपनी बड़ाई नहीं करते। हीरा कभी अपना मूल्य नहीं बताता।

रहीम - दीन सबन को लखत है

"दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होय॥"

अर्थ: दीन सबको देखता है पर दीन को कोई नहीं देखता। जो दीन को देखे वह भगवान के समान है।

रहीम - समय पाय फल होत है

"समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात॥"

अर्थ: समय पर फल लगता है और समय पर झड़ जाता है। कुछ भी सदा एक जैसा नहीं रहता।

रहीम - जो रहीम उत्तम प्रकृति

"जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग॥"

अर्थ: उत्तम प्रकृति के व्यक्ति पर कुसंग का असर नहीं होता। चंदन पर सांप लिपटे रहने से विष नहीं चढ़ता।

तुलसीदास - साथी विपत्ति के

"तुलसी साथी विपत्ति के, विद्या विनय विवेक।
साहस सुकृति सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक॥"

अर्थ: विपत्ति में विद्या, विनय, विवेक, साहस, पुण्य, सत्य और राम का भरोसा साथ देते हैं।

तुलसीदास - सचिव बैद गुरु

"सचिव बैद गुरु तीनि जौं, प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिहीं नास॥"

अर्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु यदि प्रिय बोलें तो राज्य, धर्म और शरीर तीनों का नाश हो जाता है।

तुलसीदास - तुलसी मीठे बचन

"तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।
बसीकरन इक मंत्र है, परिहरू बचन कठोर॥"

अर्थ: मीठे वचन से चारों ओर सुख फैलता है। यह वशीकरण का मंत्र है, कठोर वचन त्याग दो।

तुलसीदास - आवत ही हरषै नहीं

"आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
तुलसी तहां न जाइये, कंचन बरसे मेह॥"

अर्थ: जहां आपके आने से खुशी न हो और प्रेम न हो, वहां सोना बरसे तो भी मत जाओ।

तुलसीदास - राम नाम मनि दीप

"राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥"

अर्थ: राम नाम रूपी मणि दीपक को जिह्वा रूपी देहरी पर रखो, भीतर-बाहर उजाला हो जाएगा।

बिहारी - मेरी भव बाधा

"मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोय।
जा तन की झाईं परे, स्याम हरित दुति होय॥"

अर्थ: राधा की महिमा का वर्णन। जिनकी छाया से श्याम भी हरित हो जाते हैं।

बिहारी - कहत नटत रीझत खिझत

"कहत नटत रीझत खिझत, मिलत खिलत लजियात।
भरे भौन में करत है, नैनन ही सौं बात॥"

अर्थ: नायिका की चंचलता का सुंदर वर्णन। भरी सभा में नैनों से ही बातें करती है।

बिहारी - मनो नीलमनि सैल

"मनो नीलमनि सैल पर, आतप परयो प्रभात।
दीप सिखा सी दीपति देत, नवल किसलय पात॥"

अर्थ: नीलमणि पर्वत पर प्रातःकालीन धूप का सुंदर चित्रण। नए पत्ते दीपक की लौ सी चमक रहे हैं।

बिहारी - जगतु तुरंग रूप

"जगतु तुरंग रूप है, सबै एकै अस जानि।
बिहारी बिनु बागुरे, कोउ न राखै ठानि॥"

अर्थ: संसार घोड़े के समान है। बिना लगाम के कोई इसे नहीं रोक सकता।

सूरदास - मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो

"मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो।
ख्याल परे ये सखा सबै मिलि, मोहि दूध को ठयो॥"

अर्थ: बाल कृष्ण की मनमोहक बाल लीला। माखन चोरी का आरोप झूठा बताते हुए।

सूरदास - अबिगत गति कछु कहत न आवै

"अबिगत गति कछु कहत न आवै।
ज्यों गूंगे मीठे फल को रस, अंतरगत ही भावै॥"

अर्थ: ईश्वर की अव्यक्त गति का वर्णन नहीं हो सकता। जैसे गूंगा मीठे फल का स्वाद बता नहीं सकता।

सूरदास - जसोदा हरि पालने झुलावै

"जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलरावै, मल्हावै, जोई सोई कछु गावै॥"

अर्थ: यशोदा कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। वात्सल्य रस का सुंदर चित्रण।

मीराबाई - पायो जी मैंने राम रतन

"पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥"

अर्थ: मीरा को राम रूपी रत्न मिल गया। गुरु की कृपा से अमूल्य वस्तु प्राप्त हुई।

मीराबाई - मेरे तो गिरधर गोपाल

"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥"

अर्थ: मीरा की एकनिष्ठ भक्ति। गिरधर गोपाल ही उनके सब कुछ हैं।

वृंद - सांचे सुख की चाह जो

"सांचे सुख की चाह जो, सुख की सांच सुनाय।
तृष्णा त्यागि संतोष धरि, जो कछु होय सहाय॥"

अर्थ: सच्चे सुख की चाह हो तो तृष्णा त्यागकर संतोष धारण करो।

वृंद - बनत बनत बन जात है

"बनत बनत बन जात है, बनत बनत बनराय।
वृंद सुजान सुबुद्धि के, बनत न लगत बनाय॥"

अर्थ: बनते-बनते वन बन जाता है, बनते-बनते राजा बन जाता है। सुजान की बुद्धि बनाने में नहीं लगती।

घनानंद - अति सूधो सनेह को मारग है

"अति सूधो सनेह को मारग है, जहां नेकु सयानप बांक नहीं।
घनआनंद ज्यों आवत है त्यों जात है, झिझकत कपटी जे निसांक नहीं॥"

अर्थ: प्रेम का मार्ग सीधा है, जहां चालाकी नहीं चलती। कपटी लोग झिझकते हैं।

रसखान - मानुष हौं तो वही रसखानि

"मानुस हौं तो वही रसखानि, बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥"

अर्थ: यदि मनुष्य बनूं तो गोकुल में ग्वाले बनूं, पशु बनूं तो नंद की गायों के बीच चरूं।

रसखान - या लकुटी अरु कामरिया

"या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥"

अर्थ: कृष्ण की लकुटी और कंबल के लिए तीनों लोकों का राज्य त्याग दूं।

गुरु नानक - सो क्यों मंदा आखिये

"सो क्यों मंदा आखिये, जित जम्मे राजान।
एक नारी ते सभ उपजे, एक नारी ते जहान॥"

अर्थ: स्त्री को बुरा क्यों कहें, जिससे राजा जन्म लेते हैं। एक नारी से ही सारा संसार है।

गुरु नानक - जो तू मेरा खसम है

"जो तू मेरा खसम है, तो किआ मेरी मनदी।
जो तू मेरा पिर है, तो किआ मेरी हंदी॥"

अर्थ: यदि तू मेरा स्वामी है तो मेरी मर्जी का क्या? यदि तू मेरा प्रियतम है तो मेरी हंसी का क्या?

दादू दयाल - दादू दुनिया देखि के

"दादू दुनिया देखि के, मन में आवै हांसि।
ऐसे जीवन जीवि के, क्यों न बंधे जम फांसि॥"

अर्थ: संसार को देखकर हंसी आती है। ऐसा जीवन जीकर यमराज के फंदे में क्यों न फंसें।

मलूकदास - अजगर करे न चाकरी

"अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥"

अर्थ: अजगर नौकरी नहीं करता, पक्षी काम नहीं करता। सबका दाता राम है।

मलूकदास - कहा किया हम आय के

"कहा किया हम आय के, कहा करेंगे पाय।
इत के भये न उत के, चाले मूल गंवाय॥"

अर्थ: आकर क्या किया, जाकर क्या करेंगे। न इस लोक के रहे न उस लोक के, मूल गंवा दिया।

सुंदरदास - माया महा ठगिनी हम जानी

"माया महा ठगिनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोले, बोले मधुरी बानी॥"

अर्थ: माया महा ठगिनी है। तीन गुणों का फंदा लेकर मीठी बोली बोलती है।

प्रेमानंद - आली मेरे नैनन में बसत नंदलाल

"आली मेरे नैनन में बसत नंदलाल।
प्रेमानंद सुख सागर, लहरत घन श्याम हिलोर॥"

अर्थ: हे सखी! मेरे नेत्रों में नंदलाल बसते हैं। प्रेमानंद के सुख सागर में श्याम की लहरें उठ रही हैं।

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वैदिक ज्ञान

वेदों का अमूल्य ज्ञान भंडार

ऋग्वेद - सबसे प्राचीन वेद

ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है। इसमें 10 मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 मंत्र हैं जो देवताओं की स्तुति में रचे गए हैं। यह ज्ञान, विज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम है। इंद्र, अग्नि, वरुण, सूर्य आदि देवताओं का वर्णन है।

यजुर्वेद - कर्मकांड का वेद

यजुर्वेद में यज्ञ और कर्मकांड की विधियां हैं। इसके दो भाग हैं - शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी संहिता) और कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता)। यह व्यावहारिक जीवन का मार्गदर्शक है और यज्ञ मंत्रों का संग्रह है।

सामवेद - संगीत का वेद

सामवेद संगीत का वेद है। इसके 1,875 मंत्रों को गाकर सुनाया जाता है। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल स्रोत है। इसमें 7 स्वर और संगीत के नियम वर्णित हैं। ऋग्वेद के मंत्रों को संगीतबद्ध रूप में प्रस्तुत करता है।

अथर्ववेद - जीवन विज्ञान का वेद

अथर्ववेद में जीवन के व्यावहारिक पहलुओं, चिकित्सा, ज्योतिष, तंत्र विद्या और औषधि विज्ञान का वर्णन है। इसमें 20 काण्ड और 730 सूक्त हैं। यह दैनिक जीवन का मार्गदर्शक है और रोग निवारण की विधियां बताता है।

गायत्री मंत्र - सर्वश्रेष्ठ मंत्र

"ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥" यह ऋग्वेद का सबसे पवित्र मंत्र है। इसे सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना जाता है। यह बुद्धि, ज्ञान और आत्मिक शक्ति प्रदान करता है।

महामृत्युंजय मंत्र - अमृत मंत्र

"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥" यह ऋग्वेद का शक्तिशाली मंत्र है। यह दीर्घायु, स्वास्थ्य और मृत्यु भय से मुक्ति प्रदान करता है। भगवान शिव का मंत्र है।

पुरुष सूक्त - सृष्टि का रहस्य

ऋग्वेद के 10वें मंडल का पुरुष सूक्त सृष्टि की उत्पत्ति का वर्णन करता है। विराट पुरुष से ब्रह्मांड की रचना हुई। चार वर्णों की उत्पत्ति का दार्शनिक विवेचन है। यह वैदिक दर्शन का महत्वपूर्ण अंश है।

नासदीय सूक्त - सृष्टि का प्रश्न

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त सृष्टि की उत्पत्ति पर गहन दार्शनिक प्रश्न उठाता है। "न सत् आसीत् न असत्" - न सत् था न असत्। यह अस्तित्व के रहस्य पर विचार करता है। विश्व का सबसे प्राचीन दार्शनिक चिंतन है।

श्री सूक्त - लक्ष्मी स्तुति

ऋग्वेद का श्री सूक्त माता लक्ष्मी की स्तुति है। यह धन, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करता है। 16 मंत्रों में लक्ष्मी के विभिन्न रूपों का वर्णन है। दीपावली पर इसका पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है।

दुर्गा सूक्त - शक्ति स्तुति

यजुर्वेद का दुर्गा सूक्त माँ दुर्गा की स्तुति है। यह शक्ति, साहस और संकट निवारण प्रदान करता है। अग्नि को दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी है।

रुद्र सूक्त - शिव स्तुति

यजुर्वेद का रुद्र सूक्त भगवान शिव की स्तुति है। इसमें शिव के विभिन्न रूपों और गुणों का वर्णन है। यह शांति, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करता है। रुद्राभिषेक में इसका पाठ किया जाता है।

शांति मंत्र - शांति का आह्वान

"ॐ सह नाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥" यह उपनिषदों का शांति मंत्र है। गुरु-शिष्य के बीच सामंजस्य और सहयोग का आह्वान करता है। शिक्षा के आरंभ में पढ़ा जाता है।

ईशावास्य उपनिषद - संपूर्ण उपनिषद

यजुर्वेद का ईशावास्य उपनिषद केवल 18 मंत्रों में संपूर्ण वेदांत दर्शन समाहित है। "ईशावास्यमिदं सर्वम्" - यह सब ईश्वर से व्याप्त है। यह कर्म और ज्ञान का समन्वय सिखाता है। अत्यंत संक्षिप्त और गहन उपनिषद है।

केन उपनिषद - ब्रह्म की खोज

सामवेद का केन उपनिषद "केन" (किसके द्वारा) प्रश्न से आरंभ होता है। यह इंद्रियों और मन के पीछे की शक्ति ब्रह्म को खोजता है। ब्रह्म को जानने की विधि बताता है। गहन दार्शनिक चिंतन है।

कठ उपनिषद - नचिकेता की कथा

यजुर्वेद का कठ उपनिषद नचिकेता और यमराज के संवाद पर आधारित है। मृत्यु के रहस्य और आत्मा की अमरता का वर्णन है। "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" - उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त करो। स्वामी विवेकानंद का प्रिय मंत्र।

प्रश्न उपनिषद - छह प्रश्न

अथर्ववेद का प्रश्न उपनिषद छह ऋषियों के छह प्रश्नों पर आधारित है। प्राण, मन, इंद्रियां, स्वप्न और मृत्यु का विवेचन है। ॐकार की महिमा का वर्णन है। प्रश्नोत्तर शैली में गहन ज्ञान है।

मुंडक उपनिषद - दो विद्याएं

अथर्ववेद का मुंडक उपनिषद परा और अपरा विद्या का भेद बताता है। "सत्यमेव जयते" इसी उपनिषद से लिया गया है। ब्रह्म विद्या का सुंदर विवेचन है। भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य इसी से है।

मांडूक्य उपनिषद - ॐकार का रहस्य

अथर्ववेद का मांडूक्य उपनिषद केवल 12 मंत्रों में ॐकार और चार अवस्थाओं का वर्णन है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्था का विवेचन। गौड़पाद की कारिका प्रसिद्ध है। अद्वैत वेदांत का मूल ग्रंथ।

तैत्तिरीय उपनिषद - आनंद की परिभाषा

यजुर्वेद का तैत्तिरीय उपनिषद पांच कोशों और आनंद के स्तरों का वर्णन करता है। "सत्यं वद धर्मं चर" - सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो। शिक्षा के नियम बताता है। आनंद ब्रह्म है - यह महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

ऐतरेय उपनिषद - सृष्टि और आत्मा

ऋग्वेद का ऐतरेय उपनिषद सृष्टि की उत्पत्ति और आत्मा के स्वरूप का वर्णन करता है। "प्रज्ञानं ब्रह्म" - चेतना ही ब्रह्म है। मनुष्य शरीर की रचना का विवेचन है। आत्मा की सर्वव्यापकता का प्रतिपादन।

छांदोग्य उपनिषद - तत्त्वमसि

सामवेद का छांदोग्य उपनिषद सबसे बड़ा उपनिषद है। "तत्त्वमसि" - तू वही है। उद्दालक और श्वेतकेतु का संवाद प्रसिद्ध है। ॐकार और उपासना की विधियां हैं। महावाक्यों में से एक का स्रोत।

बृहदारण्यक उपनिषद - सबसे बड़ा उपनिषद

यजुर्वेद का बृहदारण्यक उपनिषद सबसे विस्तृत और प्राचीन उपनिषद है। याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी का संवाद प्रसिद्ध है। "अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूं। आत्मा और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन। गहन दार्शनिक विवेचन है।

श्वेताश्वतर उपनिषद - शिव उपनिषद

यजुर्वेद का श्वेताश्वतर उपनिषद भगवान शिव की उपासना का वर्णन करता है। सांख्य, योग और वेदांत का समन्वय है। ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन। भक्ति और ज्ञान का सुंदर मिश्रण है।

शिक्षा - उच्चारण विज्ञान

शिक्षा वेदांग वर्ण, स्वर, मात्रा और उच्चारण का विज्ञान है। वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के नियम बताता है। स्वर विज्ञान का प्राचीन ग्रंथ है। पाणिनि की शिक्षा प्रसिद्ध है। मंत्र शक्ति का आधार है।

कल्प - यज्ञ विधि

कल्प वेदांग यज्ञ और संस्कारों की विधियां बताता है। श्रौत सूत्र, गृह्य सूत्र और धर्म सूत्र इसके तीन भाग हैं। वैदिक कर्मकांड का विस्तृत विवरण है। आपस्तम्ब, बौधायन आदि के सूत्र प्रसिद्ध हैं।

व्याकरण - भाषा का विज्ञान

व्याकरण वेदांग संस्कृत भाषा के नियमों का विज्ञान है। पाणिनि का अष्टाध्यायी विश्व का सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक व्याकरण है। 4000 सूत्रों में संपूर्ण व्याकरण समाहित है। भाषा विज्ञान का आधार स्तंभ है।

निरुक्त - शब्द व्युत्पत्ति

निरुक्त वेदांग वैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति और अर्थ बताता है। यास्क का निरुक्त प्रसिद्ध है। कठिन वैदिक शब्दों का अर्थ स्पष्ट करता है। शब्द विज्ञान का प्राचीन ग्रंथ है। वेद को समझने की कुंजी है।

छंद - काव्य मीमांसा

छंद वेदांग वैदिक मंत्रों के छंदों का विज्ञान है। गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती आदि छंदों का विवेचन है। पिंगल का छंद शास्त्र प्रसिद्ध है। काव्य और संगीत का आधार है। मंत्रों की लय और ताल का ज्ञान।

ज्योतिष - काल गणना

ज्योतिष वेदांग यज्ञों के शुभ मुहूर्त निर्धारण का विज्ञान है। सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों की गति का अध्ययन है। वेदांग ज्योतिष सबसे प्राचीन खगोल शास्त्र है। पंचांग निर्माण का आधार है। काल गणना की वैज्ञानिक विधि।

धर्म - कर्तव्य का मार्ग

वैदिक धर्म का अर्थ है कर्तव्य, नैतिकता और सत्य का पालन। "धारणात् धर्म" - जो धारण करे वह धर्म है। यह जीवन का आधार है। सनातन धर्म शाश्वत नियमों पर आधारित है। ऋत (सत्य) और धर्म वैदिक जीवन के मूल हैं।

कर्म - कर्म का सिद्धांत

वैदिक कर्म सिद्धांत कहता है कि हर कर्म का फल मिलता है। "कर्मण्येवाधिकारस्ते" - कर्म में ही अधिकार है। यज्ञ, दान और तप तीन प्रकार के कर्म हैं। कर्म योग जीवन का मार्ग है। फल की चिंता किए बिना कर्म करो।

यज्ञ - समर्पण का कर्म

यज्ञ वैदिक संस्कृति का केंद्र है। यह त्याग, समर्पण और सामूहिक कल्याण का प्रतीक है। अग्निहोत्र, सोमयाग आदि प्रमुख यज्ञ हैं। "यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म" - यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म है। पर्यावरण शुद्धि का वैज्ञानिक माध्यम।

ऋत - सत्य और व्यवस्था

ऋत वैदिक दर्शन का मूल सिद्धांत है। यह ब्रह्मांडीय व्यवस्था और सत्य का प्रतीक है। सूर्य, चंद्र, ऋतुएं सब ऋत से चलते हैं। "ऋतं सत्यं परं ब्रह्म" - ऋत, सत्य और ब्रह्म एक हैं। प्राकृतिक नियमों का पालन ही धर्म है।

ब्रह्म - परम सत्य

ब्रह्म वैदिक दर्शन का परम तत्व है। "एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" - सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से कहते हैं। ब्रह्म निर्गुण और सगुण दोनों है। यह सर्वव्यापी, अनंत और अविनाशी है। आत्मा और ब्रह्म एक हैं।

आत्मा - अमर चेतना

"न जायते म्रियते वा कदाचित्" - आत्मा न जन्म लेती है न मरती है। यह अविनाशी, अजर और अमर है। शरीर नश्वर है पर आत्मा शाश्वत है। "अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूं। आत्म-साक्षात्कार ही मोक्ष है।

माया - भ्रम की शक्ति

माया ब्रह्म की शक्ति है जो जगत को रचती है। यह भ्रम और अज्ञान का कारण है। "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" - ब्रह्म सत्य है, जगत मिथ्या। माया के कारण आत्मा को शरीर समझते हैं। ज्ञान से माया का नाश होता है।

मोक्ष - परम लक्ष्य

मोक्ष जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। यह वैदिक जीवन का परम लक्ष्य है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ हैं। "तत्त्वमसि" का साक्षात्कार ही मोक्ष है। ब्रह्म में लीन हो जाना ही मुक्ति है।

पुनर्जन्म - जन्म का चक्र

वैदिक दर्शन में पुनर्जन्म का सिद्धांत है। कर्मों के अनुसार अगला जन्म मिलता है। "यथा कर्म तथा फलम्" - जैसा कर्म वैसा फल। आत्मा अमर है और नए शरीर धारण करती है। मोक्ष से पुनर्जन्म का चक्र समाप्त होता है।

वर्णाश्रम - जीवन व्यवस्था

वैदिक समाज में चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और चार आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास) की व्यवस्था थी। यह कर्म और योग्यता पर आधारित थी। जीवन के चार चरणों का विभाजन वैज्ञानिक है।

संस्कार - जीवन के संस्कार

वैदिक परंपरा में 16 संस्कार हैं - गर्भाधान से अंत्येष्टि तक। ये जीवन को पवित्र और संस्कारित बनाते हैं। नामकरण, उपनयन, विवाह प्रमुख संस्कार हैं। संस्कार व्यक्तित्व निर्माण के साधन हैं। जीवन के हर चरण को पवित्र बनाते हैं।

वसुधैव कुटुम्बकम् - विश्व बंधुत्व

"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥" यह संपूर्ण पृथ्वी एक परिवार है। वैदिक दर्शन का सार्वभौमिक दृष्टिकोण है। सभी प्राणी एक हैं। विश्व शांति का मूल मंत्र है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः - सार्वभौमिक कल्याण

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥" सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों। वैदिक प्रार्थना का सार्वभौमिक स्वरूप है। सबके कल्याण की कामना। विश्व मंगल की भावना।

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लोकोक्तियाँ

लोक जीवन की सीख देती कहावतें

जैसा बोओगे वैसा काटोगे

कर्म का फल अवश्य मिलता है। जो व्यक्ति जैसे कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। अच्छे कर्म करने से अच्छा फल और बुरे कर्म से बुरा फल मिलता है। यह प्रकृति का नियम है। जीवन में सदैव अच्छे कर्म करने चाहिए।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप

जीवन में संतुलन अत्यंत आवश्यक है। न तो अधिक बोलना अच्छा है और न ही पूरी तरह चुप रहना। हर चीज की अति बुरी होती है। बोलने और चुप रहने में संतुलन बनाए रखना चाहिए। मध्यम मार्ग ही श्रेष्ठ है।

जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

जो लोग केवल दिखावा करते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे वास्तव में कुछ करते नहीं। खाली बादल ही गरजते हैं, जिनमें पानी होता है वे चुपचाप बरस जाते हैं। सच्चा ज्ञानी और कर्मठ व्यक्ति शांत रहता है और काम करता है।

अंधों में काना राजा

जहां सभी अज्ञानी हों, वहां थोड़ा ज्ञानी व्यक्ति भी बड़ा माना जाता है। जिस समाज में कोई योग्य न हो, वहां कम योग्य व्यक्ति भी महत्वपूर्ण हो जाता है। यह कहावत योग्यता की सापेक्षता को दर्शाती है।

समय और समुद्र किसी की प्रतीक्षा नहीं करते

समय बहुत मूल्यवान है और यह किसी के लिए नहीं रुकता। जैसे समुद्र की लहरें निरंतर चलती रहती हैं, वैसे ही समय भी बीतता रहता है। समय का सदुपयोग करना चाहिए। एक बार गया समय वापस नहीं आता। समय ही धन है।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब

कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए। जो काम कल करना है वह आज करो, और जो आज करना है वह अभी करो। टालमटोल करने से काम बिगड़ जाते हैं। समय पर काम करने से सफलता मिलती है। आलस्य त्यागकर तुरंत कार्य करना चाहिए।

दूर के ढोल सुहावने

दूर से देखने या सुनने पर चीजें अच्छी लगती हैं। जब हम किसी चीज के पास जाते हैं तो उसकी कमियां दिखने लगती हैं। दूसरों की जिंदगी हमें अच्छी लगती है पर अपनी बुरी। यथार्थ को समझना जरूरी है।

घर की मुर्गी दाल बराबर

अपनी चीजों की कद्र नहीं होती। जो चीज हमारे पास आसानी से उपलब्ध है, उसका महत्व हम नहीं समझते। दूसरों की चीजें अच्छी लगती हैं। अपने घर की वस्तुओं और व्यक्तियों का सम्मान करना चाहिए।

अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

समय बीत जाने के बाद पछताने से कोई लाभ नहीं। जब नुकसान हो चुका हो तो पश्चाताप व्यर्थ है। समय रहते सावधान रहना चाहिए। सही समय पर सही निर्णय लेना आवश्यक है। देर से की गई चिंता बेकार है।

एक और एक ग्यारह होते हैं

एकता में बल है। जब लोग मिलकर काम करते हैं तो उनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। अकेला व्यक्ति कमजोर होता है पर साथ मिलकर बड़े काम किए जा सकते हैं। संगठन में शक्ति होती है। मिलजुलकर रहना चाहिए।

जिसकी लाठी उसकी भैंस

जिसके पास शक्ति है, वही विजयी होता है। बल का प्रयोग करने वाला ही अधिकार जमाता है। न्याय-अन्याय की परवाह किए बिना ताकतवर व्यक्ति जीत जाता है। यह अन्याय की स्थिति को दर्शाता है। शक्ति का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

नाच न जाने आंगन टेढ़ा

अपनी कमी को छिपाने के लिए दूसरों पर दोष लगाना। जो व्यक्ति स्वयं अयोग्य होता है, वह अपनी असफलता के लिए परिस्थितियों को दोष देता है। अपनी गलतियां स्वीकार न करके बहाने बनाना। आत्म-मूल्यांकन करना चाहिए।

अधजल गगरी छलकत जाए

थोड़ा ज्ञान रखने वाला व्यक्ति अधिक दिखावा करता है। जिसके पास कम ज्ञान होता है वह अधिक शोर मचाता है। पूर्ण ज्ञानी व्यक्ति विनम्र होता है। अधूरा ज्ञान खतरनाक है। विनम्रता सच्चे ज्ञान की पहचान है।

आम के आम गुठलियों के दाम

एक काम से दोहरा लाभ होना। एक प्रयास से दो फायदे मिलना। चतुराई से काम करके अधिक लाभ उठाना। बुद्धिमानी से काम करने पर कई लाभ मिलते हैं। समझदारी से काम करना चाहिए।

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

अकेला व्यक्ति बड़ा काम नहीं कर सकता। बड़े कार्यों के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक है। एकता में ही शक्ति है। मिलजुलकर काम करने से बड़ी से बड़ी समस्या हल हो जाती है। सहयोग जरूरी है।

जल में रहकर मगर से बैर

जिस पर निर्भर हों उससे दुश्मनी करना मूर्खता है। अपने आश्रयदाता से शत्रुता करना बुद्धिमानी नहीं। परिस्थितियों को समझकर व्यवहार करना चाहिए। शक्तिशाली से टकराव उचित नहीं। विवेक से काम लेना चाहिए।

जान है तो जहान है

जीवन सबसे बड़ा धन है। जब तक जीवन है तभी तक सब कुछ है। प्राण बचे रहने पर सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। स्वास्थ्य सबसे महत्वपूर्ण है। जीवन की रक्षा सर्वोपरि है।

थोथा चना बाजे घना

खोखला व्यक्ति अधिक शोर मचाता है। जिसमें गुण नहीं होते वह दिखावा अधिक करता है। गुणवान व्यक्ति शांत रहता है। बाहरी चमक-दमक से धोखा नहीं खाना चाहिए। असली गुण अंदर होते हैं।

बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न भीख

भाग्य से कभी-कभी बिना प्रयास के बड़ी चीज मिल जाती है, पर मांगने पर छोटी चीज भी नहीं मिलती। भाग्य का खेल अजीब है। आत्मसम्मान बनाए रखना चाहिए। मांगना अपमानजनक है। स्वाभिमान से जीना चाहिए।

बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद

मूर्ख व्यक्ति गुणवान चीज की कद्र नहीं कर सकता। जिसे समझ नहीं वह अच्छी चीज का मूल्य नहीं जानता। योग्यता के अनुसार ही चीजों का मूल्य समझ आता है। ज्ञान के बिना गुण की पहचान नहीं होती।

हाथ कंगन को आरसी क्या

प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं। जो सामने है उसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं। स्पष्ट बात के लिए तर्क की आवश्यकता नहीं। सत्य स्वयं प्रमाण है। जो दिख रहा है उसे देखने के लिए दर्पण की जरूरत नहीं।

अपना हाथ जगन्नाथ

अपने परिश्रम पर ही भरोसा करना चाहिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा न करें। स्वावलंबी बनना चाहिए। अपने हाथ से किया गया काम ही विश्वसनीय है। आत्मनिर्भरता सबसे बड़ा गुण है।

आप भला तो जग भला

जैसी हमारी सोच होती है, वैसा ही हमें संसार दिखता है। अच्छे विचारों वाले को सब अच्छा लगता है। हमारा दृष्टिकोण ही संसार को बनाता है। सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। अच्छाई देखने से अच्छाई मिलती है।

जैसे को तैसा

जो जैसा व्यवहार करे, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। बुरे के साथ बुरा और अच्छे के साथ अच्छा। प्रतिक्रिया कर्म के अनुसार होनी चाहिए। समान व्यवहार न्याय है। जैसा बोओगे वैसा काटोगे।

चोर की दाढ़ी में तिनका

दोषी व्यक्ति हमेशा भयभीत रहता है। जिसने गलत काम किया हो वह हर बात में अपनी ओर संकेत समझता है। अपराधी का मन कभी शांत नहीं रहता। डर उसे हर समय सताता है। सच्चाई में निर्भयता है।

दूध का दूध पानी का पानी

न्याय करना, सही-गलत का फैसला करना। हर चीज को उसके स्थान पर रखना। सत्य और असत्य को अलग करना। निष्पक्ष निर्णय लेना। न्यायप्रिय व्यक्ति सबको उचित स्थान देता है।

मान न मान मैं तेरा मेहमान

बिना बुलाए आना या जबरदस्ती थोपना। अनचाहे व्यक्ति का आना। बिना इच्छा के किसी पर बोझ बनना। अवांछित उपस्थिति। शिष्टाचार का पालन करना चाहिए।

नौ दिन चले अढ़ाई कोस

बहुत धीमी गति से काम करना। आलस्य और सुस्ती से काम करना। समय का दुरुपयोग करना। कार्य में तेजी न होना। फुर्ती से काम करना चाहिए।

ऊंची दुकान फीका पकवान

बाहरी दिखावा अच्छा पर अंदर से खोखला। केवल प्रचार और वास्तविकता में कमी। दिखावे पर विश्वास न करें। असलियत देखनी चाहिए। गुणवत्ता महत्वपूर्ण है।

एक पंथ दो काज

एक प्रयास से दो काम पूरे करना। समझदारी से काम करके अधिक लाभ उठाना। समय और श्रम की बचत। कुशलता से काम करना। बुद्धिमानी से योजना बनानी चाहिए।

खोदा पहाड़ निकली चुहिया

बहुत परिश्रम करने पर बहुत कम परिणाम मिलना। अपेक्षा से बहुत कम प्राप्ति। बड़ी तैयारी और छोटा परिणाम। निराशाजनक परिणाम। यथार्थवादी अपेक्षा रखनी चाहिए।

गागर में सागर भरना

थोड़े शब्दों में बहुत कुछ कहना। संक्षिप्त में विस्तृत बात कहना। कम में अधिक समेटना। सारगर्भित भाषण। संक्षिप्तता कला है।

घर का भेदी लंका ढाए

अपने ही लोग नुकसान पहुंचाते हैं। आंतरिक शत्रु सबसे खतरनाक है। विश्वासघात सबसे बड़ा धोखा है। अपनों से सावधान रहना चाहिए। विश्वास सोच-समझकर करना चाहिए।

चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए

अत्यधिक कंजूस व्यक्ति। धन के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार। कृपणता की हद। धन से अधिक मोह। संतुलित दृष्टिकोण रखना चाहिए।

जिन खोजा तिन पाइयां गहरे पानी पैठ

मेहनत करने वाले को सफलता मिलती है। गहराई में जाने पर ही मोती मिलते हैं। प्रयास करने से लक्ष्य प्राप्त होता है। परिश्रम का फल मीठा होता है। हिम्मत से काम करना चाहिए।

तेल देखो तेल की धार देखो

काम करते समय सावधान रहना। ध्यान से काम करना। एकाग्रता जरूरी है। लापरवाही से नुकसान होता है। सतर्कता आवश्यक है।

दाल में कुछ काला है

कुछ गड़बड़ होना। संदेह की स्थिति। कुछ छिपा होना। रहस्य का आभास। सतर्क रहना चाहिए।

धोबी का कुत्ता घर का न घाट का

किसी का न होना। दोनों जगह से बेगाना। कहीं का न रहना। अपनापन न मिलना। अपनी पहचान बनानी चाहिए।

न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी

समस्या की जड़ खत्म करना। मूल कारण को समाप्त करना। स्थायी समाधान। झगड़े का अंत। समस्या का स्थायी निवारण करना चाहिए।

पढ़े फारसी बेचे तेल

योग्यता के अनुसार काम न मिलना। शिक्षा का सही उपयोग न होना। प्रतिभा की बर्बादी। अयोग्य कार्य करना। योग्यता का सदुपयोग करना चाहिए।

बिल्ली के भाग से छींका टूटा

अचानक सौभाग्य मिलना। बिना प्रयास लाभ होना। भाग्य का साथ। अप्रत्याशित लाभ। भाग्य भी साथ देता है।

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जीवन पथ

सफल और सार्थक जीवन जीने का मार्ग

धर्म का पालन - जीवन का आधार

धर्म जीवन का आधार है। सत्य, अहिंसा, दया और करुणा का पालन करें। धर्म के अनुसार जीवन जीने से मन में शांति और समाज में सद्भाव बना रहता है। धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सही आचरण है। नैतिकता और मूल्यों का पालन ही सच्चा धर्म है।

कर्म की महत्ता - निष्काम कर्म

निष्काम कर्म करें। फल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का पालन करें। कर्म ही पूजा है और कर्म से ही जीवन सार्थक होता है। गीता कहती है - "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"। कर्म में ही अधिकार है, फल में नहीं। कर्म करते रहो।

संयम और अनुशासन - जीवन की नींव

जीवन में संयम और अनुशासन आवश्यक है। इंद्रियों पर नियंत्रण रखें। समय का सदुपयोग करें और नियमित दिनचर्या का पालन करें। अनुशासित जीवन सफलता की कुंजी है। संयम से शक्ति मिलती है और अनुशासन से लक्ष्य प्राप्त होता है।

आत्म-विकास - निरंतर सीखना

निरंतर सीखते रहें और अपना विकास करें। स्वाध्याय, ध्यान और सत्संग से आत्मा का विकास होता है। ज्ञान की खोज जीवन भर चलती रहनी चाहिए। हर दिन कुछ नया सीखें। पुस्तकें पढ़ें, विचारशील लोगों से मिलें। आत्म-सुधार जीवन का लक्ष्य है।

सत्य का पालन - जीवन का प्रकाश

सत्य सबसे बड़ा धर्म है। हमेशा सच बोलें, चाहे कितनी भी कठिनाई हो। "सत्यमेव जयते" - सत्य की ही विजय होती है। झूठ से क्षणिक लाभ मिल सकता है पर अंत में सत्य ही जीतता है। सत्य बोलने से आत्मविश्वास बढ़ता है और समाज में सम्मान मिलता है।

अहिंसा परमो धर्मः - दया और करुणा

अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है। किसी को मन, वचन और कर्म से दुख न पहुंचाएं। सभी प्राणियों के प्रति दया और करुणा रखें। महात्मा गांधी ने अहिंसा से देश को आजादी दिलाई। प्रेम और करुणा से बड़ी कोई शक्ति नहीं। हिंसा से केवल हिंसा बढ़ती है।

विनम्रता - महानता का गुण

विनम्रता सबसे बड़ा गुण है। अहंकार त्यागें और विनम्र बनें। जितना बड़ा व्यक्ति होता है, उतना ही विनम्र होता है। "विद्या ददाति विनयम्" - विद्या विनम्रता देती है। घमंड पतन का कारण है। विनम्र व्यक्ति सबका प्रिय होता है और उसे सम्मान मिलता है।

क्षमा - आत्मबल का प्रतीक

क्षमा करना सबसे बड़ी शक्ति है। दूसरों की गलतियों को माफ करें। "क्षमा वीरस्य भूषणम्" - क्षमा वीर का आभूषण है। क्षमा करने से मन हल्का होता है और शत्रुता समाप्त होती है। प्रतिशोध से केवल दुख बढ़ता है। क्षमा करने वाला व्यक्ति महान होता है।

दान और परोपकार - सेवा का भाव

दान और परोपकार से जीवन सार्थक होता है। जरूरतमंदों की सहायता करें। "परोपकाराय सतां विभूतयः" - सज्जनों की संपत्ति परोपकार के लिए है। दान से धन बढ़ता है, घटता नहीं। निस्वार्थ सेवा से आत्मा को शांति मिलती है। देने में ही सच्चा सुख है।

कृतज्ञता - धन्यवाद का भाव

कृतज्ञ रहें और दूसरों के उपकारों को याद रखें। माता-पिता, गुरु और समाज के प्रति आभार व्यक्त करें। कृतघ्न व्यक्ति सबसे बुरा होता है। जो मिला है उसके लिए धन्यवाद दें। कृतज्ञता से संबंध मजबूत होते हैं और जीवन में सकारात्मकता आती है।

संतोष - सुख का स्रोत

संतोष सबसे बड़ा धन है। जो मिला है उसमें संतुष्ट रहें। "संतोषं परमं सुखम्" - संतोष परम सुख है। असंतोष दुख का कारण है। महत्वाकांक्षा रखें पर लालच नहीं। संतुष्ट व्यक्ति सदा प्रसन्न रहता है। संतोष से मन में शांति रहती है।

धैर्य और सहनशीलता - जीवन की परीक्षा

जीवन में धैर्य रखें। कठिनाइयों में घबराएं नहीं। "धैर्यं सर्वार्थ साधनम्" - धैर्य सब कुछ साधने का माध्यम है। जल्दबाजी में गलतियां होती हैं। समय सब कुछ ठीक कर देता है। धैर्यवान व्यक्ति हर परिस्थिति में संयमित रहता है। सहनशीलता से समस्याएं हल होती हैं।

साहस और निर्भयता - वीरता का गुण

जीवन में साहस रखें और निर्भय बनें। "अभयं सत्त्वसंशुद्धिः" - निर्भयता सात्विक गुण है। डर से कुछ नहीं मिलता। सही के लिए लड़ें। साहसी व्यक्ति कठिनाइयों से नहीं डरता। निर्भयता से आत्मविश्वास बढ़ता है। डर को जीतना ही असली जीत है।

आत्मविश्वास - सफलता की कुंजी

अपने ऊपर विश्वास रखें। आत्मविश्वास से असंभव भी संभव हो जाता है। "यथा चिन्तयसि तथा भवसि" - जैसा सोचोगे वैसे बन जाओगे। नकारात्मक विचार त्यागें। अपनी क्षमताओं को पहचानें। आत्मविश्वासी व्यक्ति हर चुनौती का सामना करता है। स्वयं पर भरोसा रखें।

परिश्रम - सफलता का मूल

कड़ी मेहनत करें। परिश्रम के बिना सफलता नहीं मिलती। "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि" - परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं। भाग्य भी परिश्रमी का साथ देता है। आलस्य त्यागें और मेहनत करें। परिश्रमी व्यक्ति कभी असफल नहीं होता। मेहनत का फल मीठा होता है।

समय का सदुपयोग - अमूल्य धन

समय सबसे बड़ा धन है। इसका सदुपयोग करें। "काल करे सो आज कर" - आज का काम कल पर न टालें। बीता समय वापस नहीं आता। समय नष्ट करना पाप है। समय के साथ चलें। समयनिष्ठ व्यक्ति सफल होता है। हर पल का सदुपयोग करें।

लक्ष्य निर्धारण - दिशा का ज्ञान

जीवन में स्पष्ट लक्ष्य रखें। बिना लक्ष्य के जीवन भटकाव है। लक्ष्य निर्धारित करें और उसे प्राप्त करने के लिए योजना बनाएं। छोटे-छोटे लक्ष्य रखें और उन्हें पूरा करें। लक्ष्य से प्रेरणा मिलती है। दृढ़ संकल्प से लक्ष्य प्राप्त होता है।

सकारात्मक सोच - जीवन का दृष्टिकोण

सकारात्मक सोच रखें। नकारात्मकता से दूर रहें। "मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः" - मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है। अच्छे विचार रखें। समस्याओं में अवसर देखें। सकारात्मक व्यक्ति सदा प्रसन्न रहता है। आशावादी बनें, निराशावादी नहीं।

स्वास्थ्य का ध्यान - शरीर मंदिर है

स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" - शरीर धर्म साधन का प्रथम साधन है। नियमित व्यायाम करें। संतुलित आहार लें। पर्याप्त नींद लें। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन रहता है। योग और प्राणायाम करें। स्वास्थ्य की उपेक्षा न करें।

मन की शांति - आंतरिक सुख

मन की शांति सबसे बड़ा सुख है। ध्यान और प्राणायाम से मन शांत होता है। चिंता और तनाव से दूर रहें। वर्तमान में जीएं। अतीत की चिंता और भविष्य की फिक्र छोड़ें। शांत मन से सही निर्णय लिए जा सकते हैं। आंतरिक शांति बाहरी सुख से बड़ी है।

आत्म-नियंत्रण - इंद्रिय संयम

इंद्रियों पर नियंत्रण रखें। "इन्द्रियाणि प्रमाथीनि" - इंद्रियां चंचल होती हैं। क्रोध, लोभ, मोह पर काबू रखें। संयम से शक्ति मिलती है। विषय-वासनाओं में न फंसें। आत्म-नियंत्रण से व्यक्तित्व निखरता है। जो इंद्रियों को जीत ले वही विजयी है।

विवेक और बुद्धि - सही निर्णय

विवेक से काम लें। सही-गलत का विचार करें। "विवेकः सर्वसाधनम्" - विवेक सब साधनों का साधन है। भावना में बहकर निर्णय न लें। बुद्धि से काम करें। विवेकशील व्यक्ति गलत रास्ते पर नहीं जाता। सोच-समझकर कदम उठाएं। विवेक जीवन का मार्गदर्शक है।

सत्संग - अच्छी संगति

अच्छी संगति में रहें। "संगति से गुण आवे" - संगति का प्रभाव पड़ता है। सज्जनों का साथ करें। बुरी संगति से दूर रहें। अच्छे लोगों से प्रेरणा मिलती है। सत्संग से ज्ञान बढ़ता है। जैसी संगति वैसा प्रभाव। मित्रों का चयन सावधानी से करें।

स्वाध्याय - ज्ञान की खोज

नियमित स्वाध्याय करें। अच्छी पुस्तकें पढ़ें। "स्वाध्यायान्मा प्रमदः" - स्वाध्याय में प्रमाद न करें। ज्ञान से अज्ञान का नाश होता है। धार्मिक और नैतिक ग्रंथ पढ़ें। स्वाध्याय से आत्मा का विकास होता है। पढ़ना जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है।

ध्यान और योग - आत्मिक शक्ति

नियमित ध्यान और योग करें। "योगः चित्तवृत्ति निरोधः" - योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। ध्यान से मन एकाग्र होता है। योग से शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं। आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। प्रतिदिन कम से कम 15 मिनट ध्यान करें।

प्रार्थना - ईश्वर से संवाद

नियमित प्रार्थना करें। ईश्वर से जुड़े रहें। प्रार्थना से मन को शांति मिलती है। कृतज्ञता व्यक्त करें। प्रार्थना में शक्ति है। विनम्रता से प्रार्थना करें। ईश्वर सबकी सुनता है। प्रार्थना आत्मा का भोजन है। श्रद्धा से प्रार्थना करें।

माता-पिता का सम्मान - प्रथम गुरु

माता-पिता का सम्मान करें। "मातृ देवो भव, पितृ देवो भव" - माता-पिता देवता समान हैं। उनकी सेवा करें। उनका आशीर्वाद सबसे बड़ा धन है। उनके बिना हम कुछ नहीं। उनकी आज्ञा का पालन करें। माता-पिता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है।

गुरु का सम्मान - ज्ञान के दाता

गुरु का सम्मान करें। "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" - गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। गुरु ज्ञान के दाता हैं। उनका आशीर्वाद जीवन में सफलता दिलाता है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता। गुरु की शिक्षा को जीवन में उतारें। गुरु-शिष्य परंपरा पवित्र है।

परिवार का महत्व - जीवन का आधार

परिवार जीवन का आधार है। परिवार के साथ समय बिताएं। रिश्तों को मजबूत बनाएं। परिवार में प्रेम और सद्भाव रखें। परिवार का सहयोग जीवन में बल देता है। संयुक्त परिवार की परंपरा बनाए रखें। परिवार सबसे बड़ी संपत्ति है।

मित्रता - जीवन का सहारा

सच्चे मित्र बनाएं। "मित्रं धर्मसाधनम्" - मित्र धर्म साधन का माध्यम है। अच्छे मित्र जीवन में सहारा देते हैं। मित्रता में विश्वास और समर्पण होना चाहिए। बुरे समय में मित्र की पहचान होती है। सच्चा मित्र अनमोल है। मित्रता निभाएं।

समाज सेवा - सामाजिक दायित्व

समाज की सेवा करें। सामाजिक कार्यों में भाग लें। समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं। गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करें। समाज सेवा से जीवन सार्थक होता है। "सर्वे भवन्तु सुखिनः" - सबके सुख की कामना करें। समाज के बिना व्यक्ति अधूरा है।

पर्यावरण संरक्षण - प्रकृति का सम्मान

पर्यावरण की रक्षा करें। वृक्षारोपण करें। प्रकृति का सम्मान करें। "वृक्षो रक्षति रक्षितः" - वृक्ष की रक्षा करने वाले की वृक्ष रक्षा करता है। प्रदूषण कम करें। जल और ऊर्जा की बचत करें। पर्यावरण हमारा भविष्य है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाएं।

देश प्रेम - राष्ट्र के प्रति कर्तव्य

देश से प्रेम करें। राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाएं। "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" - जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं। देश के नियमों का पालन करें। राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा करें। देश की प्रगति में योगदान दें। देशभक्ति सबसे बड़ा गुण है।

नारी सम्मान - शक्ति का स्रोत

नारी का सम्मान करें। "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः" - जहां नारी की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं। माता, बहन, पत्नी और बेटी का सम्मान करें। नारी समाज की शक्ति है। नारी शिक्षा और सशक्तिकरण आवश्यक है। नारी सम्मान संस्कृति की पहचान है।

बाल संस्कार - भविष्य का निर्माण

बच्चों को अच्छे संस्कार दें। "बालस्य मूलमाचारः" - बालक का मूल आचार है। बचपन में दिए गए संस्कार जीवन भर काम आते हैं। बच्चों को नैतिक शिक्षा दें। उन्हें धर्म और संस्कृति से जोड़ें। बच्चे राष्ट्र का भविष्य हैं। संस्कारित बच्चे समाज की संपत्ति हैं।

वृद्धों का सम्मान - अनुभव का खजाना

वृद्धों का सम्मान करें। उनका अनुभव अमूल्य है। उनकी सेवा करें। उनसे सीखें। वृद्धावस्था में सहारे की जरूरत होती है। वृद्धों को अकेला न छोड़ें। उनका आशीर्वाद जीवन में सफलता दिलाता है। वृद्ध सम्मान संस्कृति की पहचान है।

क्रोध पर नियंत्रण - मन का शत्रु

क्रोध पर नियंत्रण रखें। "क्रोधो हि शत्रुः" - क्रोध शत्रु है। क्रोध में लिए गए निर्णय गलत होते हैं। क्रोध से रिश्ते बिगड़ते हैं। शांत रहें और धैर्य रखें। क्रोध आने पर गहरी सांस लें। क्रोध विनाश का कारण है। शांत मन से समस्याओं का समाधान करें।

ईर्ष्या और द्वेष से मुक्ति - मन की शुद्धि

ईर्ष्या और द्वेष त्यागें। दूसरों की सफलता से खुश हों। ईर्ष्या से केवल स्वयं को दुख होता है। प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो, ईर्ष्या नहीं। दूसरों के लिए शुभकामना रखें। ईर्ष्या मन को जला देती है। प्रेम और सद्भाव से रहें। मन को शुद्ध रखें।

सादगी - जीवन शैली

सादा जीवन उच्च विचार। दिखावे से दूर रहें। सादगी में सुंदरता है। "सरलता परमो धर्मः" - सरलता परम धर्म है। आडंबर से बचें। जरूरत के अनुसार जीएं। सादा जीवन शांति देता है। दिखावे में धन और समय की बर्बादी होती है। सादगी से जीवन सुखी होता है।

आत्म-चिंतन - स्वयं को जानना

नियमित आत्म-चिंतन करें। अपनी गलतियों को पहचानें। "आत्मानं विद्धि" - स्वयं को जानो। आत्म-मूल्यांकन से सुधार होता है। दिन के अंत में अपने कर्मों का विश्लेषण करें। अपनी कमजोरियों को दूर करें। आत्म-चिंतन से आत्म-विकास होता है। स्वयं को जानना सबसे बड़ा ज्ञान है।

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नैतिकता

नैतिक मूल्य और आचार विचार

सत्य और ईमानदारी - जीवन का आधार

सत्य सबसे बड़ा धर्म है। हमेशा सच बोलें और ईमानदारी से जीवन जिएं। झूठ और छल-कपट से दूर रहें। सत्य की राह कठिन हो सकती है पर यही सही है। "सत्यमेव जयते" - सत्य की ही विजय होती है। ईमानदारी से कमाया धन ही सच्चा धन है। झूठ से क्षणिक लाभ मिल सकता है पर अंत में सत्य ही जीतता है।

दया और करुणा - मानवता का गुण

सभी प्राणियों के प्रति दया भाव रखें। जरूरतमंदों की मदद करें। करुणा मानवता का सबसे बड़ा गुण है। दूसरों के दुःख में सहानुभूति दिखाएं। "परोपकाराय सतां विभूतयः" - सज्जनों की संपत्ति परोपकार के लिए है। दया से बड़ा कोई धर्म नहीं। करुणा से हृदय शुद्ध होता है।

विनम्रता और सम्मान - महानता का चिह्न

विनम्र रहें और सभी का सम्मान करें। अहंकार त्यागें। बड़ों का आदर और छोटों से प्रेम करें। विनम्रता से ही सच्ची महानता आती है। "विद्या ददाति विनयम्" - विद्या विनम्रता देती है। घमंड पतन का कारण है। विनम्र व्यक्ति सबका प्रिय होता है। सम्मान देने से सम्मान मिलता है।

न्याय और समानता - समाज का स्तंभ

सभी के साथ न्याय करें। भेदभाव न करें। समानता का व्यवहार रखें। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं। न्याय ही समाज का आधार है। जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव न करें। सभी मनुष्य समान हैं। न्याय से समाज में शांति रहती है। अन्याय को सहना भी पाप है।

कर्तव्य पालन - जिम्मेदारी का निर्वहन

अपने कर्तव्यों का पालन करें। जिम्मेदारी से न भागें। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व निभाएं। कर्तव्य पालन सबसे बड़ा धर्म है। अधिकारों से पहले कर्तव्य आते हैं। जिम्मेदार व्यक्ति समाज का आधार होता है। कर्तव्य निष्ठा से सफलता मिलती है।

वचन की पवित्रता - विश्वास का आधार

अपने वचन का पालन करें। जो कहें वही करें। वचन भंग न करें। "प्राणा यान्ति न वचनम्" - प्राण जा सकते हैं पर वचन नहीं। वचन की पवित्रता व्यक्तित्व की पहचान है। विश्वास वचन पालन से बनता है। झूठे वादे न करें। वचनबद्ध व्यक्ति सम्मानित होता है।

ईमानदारी से कार्य - कर्म की शुद्धता

हर काम ईमानदारी से करें। धोखाधड़ी से दूर रहें। बेईमानी से कमाया धन अभिशाप है। ईमानदारी से किया गया कार्य सफल होता है। "सत्येन लभ्यस्तपसा" - सत्य और तप से सब कुछ मिलता है। ईमानदार व्यक्ति का सिर हमेशा ऊंचा रहता है। बेईमानी क्षणिक लाभ देती है पर स्थायी हानि करती है।

अनुशासन - जीवन की व्यवस्था

अनुशासित जीवन जिएं। नियमों का पालन करें। समय की पाबंदी रखें। अनुशासन सफलता की कुंजी है। बिना अनुशासन के कुछ नहीं मिलता। स्व-अनुशासन सबसे महत्वपूर्ण है। अनुशासित व्यक्ति लक्ष्य प्राप्त करता है। अनुशासन से व्यक्तित्व निखरता है।

परिश्रम की महिमा - सफलता का मार्ग

कड़ी मेहनत करें। आलस्य त्यागें। परिश्रम से ही सफलता मिलती है। "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि" - परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं। भाग्य भी परिश्रमी का साथ देता है। शॉर्टकट से बचें। ईमानदारी से परिश्रम करें। मेहनत का फल मीठा होता है।

संयम और आत्म-नियंत्रण - शक्ति का स्रोत

संयम रखें और इंद्रियों पर नियंत्रण करें। अति से बचें। संतुलित जीवन जिएं। संयम से शक्ति मिलती है। विषय-वासनाओं में न फंसें। आत्म-नियंत्रण सबसे बड़ी शक्ति है। जो इंद्रियों को जीत ले वही विजयी है। संयम से स्वास्थ्य और सफलता दोनों मिलते हैं।

क्षमा का महत्व - मन की शांति

दूसरों की गलतियों को माफ करें। प्रतिशोध की भावना न रखें। "क्षमा वीरस्य भूषणम्" - क्षमा वीर का आभूषण है। क्षमा करने से मन हल्का होता है। बदले की भावना से केवल दुख बढ़ता है। क्षमा करना कमजोरी नहीं बल्कि शक्ति है। क्षमाशील व्यक्ति महान होता है।

कृतज्ञता - उपकार का स्मरण

दूसरों के उपकारों को याद रखें। कृतज्ञ रहें। धन्यवाद देना न भूलें। कृतघ्न व्यक्ति सबसे बुरा होता है। जो मिला है उसके लिए आभारी रहें। माता-पिता, गुरु और समाज के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। कृतज्ञता से संबंध मजबूत होते हैं। आभार व्यक्त करना सभ्यता की पहचान है।

दान और परोपकार - सेवा का भाव

जरूरतमंदों की मदद करें। दान करें। परोपकार से जीवन सार्थक होता है। "दानं भोगाय भुक्ताय" - दान भोग के लिए और भोगा हुआ धन ही सच्चा धन है। निस्वार्थ सेवा करें। दान से धन बढ़ता है, घटता नहीं। परोपकार से आत्मा को शांति मिलती है। देने में ही सच्चा सुख है।

सहनशीलता - धैर्य का गुण

कठिनाइयों को सहन करें। धैर्य रखें। जल्दबाजी न करें। सहनशीलता से समस्याएं हल होती हैं। "धैर्यं सर्वार्थ साधनम्" - धैर्य सब कुछ साधने का माध्यम है। कठिन समय में धैर्य न खोएं। सहनशील व्यक्ति हर परिस्थिति में संयमित रहता है। धैर्य से सफलता मिलती है।

विश्वास और भरोसा - रिश्तों की नींव

विश्वास बनाए रखें। भरोसे को न तोड़ें। विश्वासघात सबसे बड़ा पाप है। रिश्ते विश्वास पर टिके होते हैं। एक बार टूटा विश्वास फिर नहीं बनता। विश्वसनीय बनें। दूसरों पर भरोसा करें पर अंधविश्वास न करें। विश्वास से प्रेम बढ़ता है।

निष्पक्षता - पक्षपात से मुक्ति

निष्पक्ष रहें। पक्षपात न करें। सही का साथ दें चाहे कोई भी हो। निष्पक्षता न्याय का आधार है। अपने-पराए का भेद न करें। सत्य के पक्ष में खड़े रहें। निष्पक्ष व्यक्ति सम्मानित होता है। पक्षपात से अन्याय होता है।

गोपनीयता - विश्वास की रक्षा

दूसरों के रहस्य न बताएं। गोपनीयता बनाए रखें। विश्वास में बताई गई बात को गुप्त रखें। गोपनीयता भंग करना विश्वासघात है। दूसरों की निजता का सम्मान करें। राज की बात राज ही रहनी चाहिए। गोपनीयता से विश्वास बढ़ता है।

शुद्ध आचरण - चरित्र की पवित्रता

शुद्ध आचरण रखें। चरित्रवान बनें। बुरे कामों से दूर रहें। चरित्र सबसे बड़ा धन है। "चरित्रं परमं भूषणम्" - चरित्र सबसे बड़ा आभूषण है। अच्छे आचरण से सम्मान मिलता है। चरित्रहीन व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं। शुद्ध आचरण से जीवन सफल होता है।

मर्यादा का पालन - सीमाओं का सम्मान

मर्यादा में रहें। सीमाओं का उल्लंघन न करें। मर्यादा पुरुषोत्तम राम मर्यादा के प्रतीक हैं। सामाजिक मर्यादाओं का पालन करें। दूसरों की सीमाओं का सम्मान करें। मर्यादा से समाज में व्यवस्था रहती है। मर्यादाहीन व्यवहार अपमानजनक है।

स्वच्छता - पवित्रता का प्रतीक

स्वच्छता रखें। "स्वच्छता ईश्वर की ओर ले जाती है"। शरीर, मन और परिवेश को स्वच्छ रखें। स्वच्छता से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। गंदगी बीमारी का कारण है। स्वच्छता व्यक्तित्व की पहचान है। स्वच्छ वातावरण में मन प्रसन्न रहता है।

समय की पाबंदी - अनुशासन का प्रमाण

समय का पालन करें। समय पर पहुंचें। देर से आना अपमानजनक है। समय की पाबंदी व्यक्तित्व की पहचान है। दूसरों के समय का सम्मान करें। समयनिष्ठ व्यक्ति विश्वसनीय होता है। समय की बर्बादी जीवन की बर्बादी है। समय पर काम करने से सफलता मिलती है।

मितव्ययिता - संसाधनों का सदुपयोग

मितव्ययी बनें। फिजूलखर्ची न करें। संसाधनों का सदुपयोग करें। बचत करें। अपव्यय पाप है। जरूरत के अनुसार खर्च करें। मितव्ययिता से धन की बचत होती है। फिजूलखर्ची से गरीबी आती है। मितव्ययी व्यक्ति सुरक्षित भविष्य बनाता है।

सादगी - जीवन का सौंदर्य

सादा जीवन जिएं। दिखावे से बचें। "सरलता परमो धर्मः" - सरलता परम धर्म है। आडंबर से दूर रहें। सादगी में सुंदरता है। दिखावे में धन और समय की बर्बादी होती है। सादा जीवन शांति देता है। सादगी से जीवन सुखी होता है।

विवेक - सही-गलत का ज्ञान

विवेक से काम लें। सही-गलत का विचार करें। "विवेकः सर्वसाधनम्" - विवेक सब साधनों का साधन है। भावना में बहकर निर्णय न लें। बुद्धि से काम करें। विवेकशील व्यक्ति गलत रास्ते पर नहीं जाता। सोच-समझकर कदम उठाएं। विवेक जीवन का मार्गदर्शक है।

आत्म-सम्मान - स्वाभिमान की रक्षा

आत्म-सम्मान बनाए रखें। स्वाभिमान से जीएं। गलत काम के लिए झुकें नहीं। आत्म-सम्मान से बड़ा कोई धन नहीं। दूसरों के सामने गिड़गिड़ाएं नहीं। स्वाभिमानी व्यक्ति सम्मानित होता है। आत्म-सम्मान खोना सब कुछ खोना है। स्वाभिमान से जीवन जिएं।

दूसरों की निंदा से बचें - सकारात्मकता

दूसरों की निंदा न करें। बुराई न करें। "पर निंदा सम अघ नहीं" - दूसरों की निंदा सबसे बड़ा पाप है। अच्छाई देखें, बुराई नहीं। निंदा से रिश्ते बिगड़ते हैं। सकारात्मक बातें करें। निंदा करने वाला स्वयं गिरता है। दूसरों की अच्छाई की प्रशंसा करें।

ईर्ष्या से मुक्ति - मन की शुद्धि

ईर्ष्या त्यागें। दूसरों की सफलता से खुश हों। ईर्ष्या से केवल स्वयं को दुख होता है। "ईर्ष्या परपीड़ा" - ईर्ष्या दूसरों को पीड़ा देने का भाव है। प्रतिस्पर्धा स्वस्थ हो, ईर्ष्या नहीं। दूसरों के लिए शुभकामना रखें। ईर्ष्या मन को जला देती है। प्रेम और सद्भाव से रहें।

क्रोध पर नियंत्रण - शांति का मार्ग

क्रोध पर नियंत्रण रखें। "क्रोधो हि शत्रुः" - क्रोध शत्रु है। क्रोध में लिए गए निर्णय गलत होते हैं। क्रोध से रिश्ते बिगड़ते हैं। शांत रहें और धैर्य रखें। क्रोध आने पर गहरी सांस लें। क्रोध विनाश का कारण है। शांत मन से समस्याओं का समाधान करें।

लोभ से मुक्ति - संतोष का महत्व

लोभ त्यागें। संतोष रखें। "लोभ पाप का मूल" - लोभ सभी पापों का मूल है। अधिक की चाह में वर्तमान को न खोएं। लोभ से कभी संतुष्टि नहीं मिलती। जरूरत और लालच में अंतर समझें। लोभी व्यक्ति कभी सुखी नहीं होता। संतोष से सुख मिलता है।

मोह से मुक्ति - वैराग्य का ज्ञान

अत्यधिक मोह न रखें। वैराग्य का भाव रखें। मोह बंधन है। संतुलित लगाव रखें। मोह से दुख होता है। "मोहो मृत्युः" - मोह मृत्यु के समान है। अनासक्त भाव से कर्म करें। मोह में फंसकर विवेक खो जाता है। संतुलित दृष्टिकोण रखें।

अहंकार का त्याग - विनम्रता का पाठ

अहंकार त्यागें। विनम्र बनें। "अहंकार विनाश का कारण" - अहंकार पतन का कारण है। घमंड न करें। सफलता में विनम्र रहें। अहंकारी व्यक्ति का पतन निश्चित है। विनम्रता से महानता आती है। अहंकार से रिश्ते बिगड़ते हैं। विनम्र व्यक्ति सबका प्रिय होता है।

वाणी की मधुरता - मीठे बोल

मीठा बोलें। कटु वचन न बोलें। "वाणी की मधुरता सबको प्रिय" - मीठी वाणी सबको अच्छी लगती है। कड़वे बोल घाव करते हैं। सोच-समझकर बोलें। वाणी से रिश्ते बनते और बिगड़ते हैं। मधुर वाणी से सबका दिल जीता जा सकता है। बोलने से पहले सोचें।

सुनने की कला - धैर्यपूर्वक श्रवण

धैर्य से सुनें। दूसरों की बात ध्यान से सुनें। बीच में न टोकें। सुनना भी एक कला है। "श्रवणं प्रथमं ज्ञानम्" - सुनना प्रथम ज्ञान है। सुनने से समझ बढ़ती है। अच्छा श्रोता अच्छा वक्ता बनता है। सुनने से रिश्ते मजबूत होते हैं। धैर्यपूर्वक सुनें।

गलती स्वीकारना - साहस का प्रमाण

अपनी गलती स्वीकार करें। माफी मांगने में संकोच न करें। गलती स्वीकारना साहस है। "गलती मानना बड़प्पन" - गलती मानना बड़े व्यक्ति का गुण है। गलती छिपाने से बड़ी गलती होती है। गलती से सीखें। माफी मांगने से रिश्ते सुधरते हैं। गलती सुधारने का प्रयास करें।

आलोचना को सकारात्मक लें - सुधार का अवसर

आलोचना को सकारात्मक रूप से लें। रचनात्मक आलोचना से सीखें। आलोचना से बुरा न मानें। आलोचना सुधार का अवसर है। अपनी कमियों को पहचानें। आलोचना से विकास होता है। नकारात्मक आलोचना को नजरअंदाज करें। सकारात्मक आलोचना को अपनाएं।

प्रशंसा करना - सकारात्मकता फैलाना

दूसरों की अच्छाई की प्रशंसा करें। सच्ची प्रशंसा करें। प्रशंसा से प्रोत्साहन मिलता है। "प्रशंसा प्रेरणा देती है" - प्रशंसा से लोग प्रेरित होते हैं। चापलूसी न करें, सच्ची प्रशंसा करें। प्रशंसा से रिश्ते मजबूत होते हैं। दूसरों की मेहनत को सराहें।

वादा निभाना - विश्वसनीयता का प्रमाण

अपने वादे निभाएं। जो कहें वही करें। वादा तोड़ना विश्वासघात है। "वादा करना आसान, निभाना मुश्किल" - वादा सोच-समझकर करें। झूठे वादे न करें। वादा निभाने से विश्वास बढ़ता है। वादा न निभा सकें तो वादा न करें। विश्वसनीय बनें।

दूसरों की मदद - सेवा का भाव

जरूरतमंदों की मदद करें। निस्वार्थ सेवा करें। "सेवा परमो धर्मः" - सेवा सबसे बड़ा धर्म है। मदद के बदले में कुछ न चाहें। छोटी-छोटी मदद भी महत्वपूर्ण है। मदद करने से आत्मा को शांति मिलती है। सेवा से जीवन सार्थक होता है।

सहयोग की भावना - टीम वर्क

सहयोग करें। मिलकर काम करें। "एकता में शक्ति" - मिलकर काम करने से बड़े काम होते हैं। टीम भावना रखें। दूसरों के साथ सहयोग करें। सहयोग से सफलता मिलती है। अकेले से मिलकर बेहतर। सहयोगी व्यक्ति सफल होता है।

नैतिक साहस - सही के लिए खड़े होना

सही के लिए साहस से खड़े हों। अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं। "सत्य के पक्ष में खड़े रहें" - चाहे कितनी भी कठिनाई हो। नैतिक साहस दिखाएं। गलत को गलत कहने का साहस रखें। सही के लिए लड़ें। नैतिक साहस सच्ची वीरता है।

प्रेरणा

प्रेरणादायक विचार और कहानियां

स्वामी विवेकानंद - युवा शक्ति के प्रेरक

"उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" - स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को आत्मविश्वास और साहस का संदेश दिया। उन्होंने कहा, "तुम्हारे भीतर अनंत शक्ति है।" शिकागो में उनके भाषण ने भारत का गौरव बढ़ाया। वे कहते थे, "शक्ति ही जीवन है, निर्बलता मृत्यु है।" उनका संदेश था - आत्मविश्वास से सब कुछ संभव है।

महात्मा गांधी - सत्य और अहिंसा के पुजारी

"खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।" - गांधी जी ने सत्य और अहिंसा से विश्व को प्रेरित किया। उन्होंने बिना हथियार उठाए अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। उनका मानना था कि सत्याग्रह सबसे बड़ी शक्ति है। "अहिंसा परमो धर्मः" - यह उनका जीवन मंत्र था। साधारण व्यक्ति से महात्मा बनने की यात्रा प्रेरणादायक है।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम - मिसाइल मैन ऑफ इंडिया

"सपने वो नहीं जो नींद में आएं, सपने वो हैं जो नींद उड़ा दें।" - कलाम साहब ने युवाओं को बड़े सपने देखने की प्रेरणा दी। गरीब परिवार से राष्ट्रपति बनने तक का सफर अद्भुत है। उन्होंने भारत को परमाणु शक्ति बनाया। "सपने सच होते हैं अगर हम उन्हें पूरा करने का साहस रखें।" वे युवाओं के सबसे प्रिय राष्ट्रपति थे।

रामकृष्ण परमहंस - आध्यात्मिक गुरु

"जब तक जीना, तब तक सीखना" - परमहंस जी ने निरंतर सीखने और आध्यात्मिक विकास का संदेश दिया। उन्होंने सभी धर्मों की एकता का प्रचार किया। "जितने मत, उतने पथ" - सभी रास्ते ईश्वर तक पहुंचते हैं। उनकी सरलता और भक्ति अद्वितीय थी। स्वामी विवेकानंद उनके शिष्य थे। उनका जीवन सच्ची भक्ति का उदाहरण है।

सरदार वल्लभभाई पटेल - लौह पुरुष

"मनुष्य को ठंडा रहना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए। लोहा भले ही गर्म हो, हथौड़ा तो ठंडा ही रहता है।" - सरदार पटेल ने 562 रियासतों को एक भारत में मिलाया। उनकी दृढ़ता और कूटनीति अद्भुत थी। "एकता में शक्ति" - यह उनका मूल मंत्र था। बिना उनके अखंड भारत संभव नहीं था। वे सच्चे राष्ट्रभक्त और कुशल प्रशासक थे।

भगत सिंह - अमर शहीद

"मैं नास्तिक क्यों हूं" लिखकर भी भगत सिंह ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। 23 वर्ष की उम्र में फांसी पर चढ़ गए। "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा उन्होंने दिया। उनकी वीरता और बलिदान अतुलनीय है। "मेरा रंग दे बसंती चोला" - उनका जीवन प्रेरणा है। युवाओं के लिए वे आदर्श हैं। देशभक्ति का सच्चा उदाहरण।

सुभाष चंद्र बोस - नेताजी

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" - नेताजी का यह नारा आज भी गूंजता है। उन्होंने आजाद हिंद फौज बनाई। अंग्रेजों से सीधे युद्ध किया। "दिल्ली चलो" का नारा दिया। उनका साहस और नेतृत्व अद्भुत था। रहस्यमय मृत्यु आज भी रहस्य है। सच्चे देशभक्त और योद्धा थे।

चंद्रशेखर आजाद - अमर क्रांतिकारी

"मैं आजाद था, आजाद हूं और आजाद ही रहूंगा।" - आजाद ने यह प्रण लिया और निभाया। जीवित पकड़े नहीं गए, खुद को गोली मार ली। क्रांतिकारी आंदोलन के नायक थे। भगत सिंह के साथी और मार्गदर्शक। उनकी वीरता किंवदंती बन गई। स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व न्योछावर किया। सच्चे आजाद योद्धा।

रानी लक्ष्मीबाई - झांसी की रानी

"मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।" - रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया। 1857 के विद्रोह की नायिका थीं। पीठ पर बच्चा बांधकर युद्ध किया। वीरता और साहस की प्रतीक हैं। "खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।" महिला शक्ति का प्रतीक। अमर वीरांगना।

स्वामी दयानंद सरस्वती - आर्य समाज संस्थापक

"वेदों की ओर लौटो" - स्वामी दयानंद ने समाज सुधार का बीड़ा उठाया। आर्य समाज की स्थापना की। अंधविश्वास और कुरीतियों के खिलाफ लड़े। "स्वदेशी" का नारा दिया। शिक्षा और समानता के पक्षधर थे। सामाजिक क्रांति के अग्रदूत। वैदिक धर्म के प्रचारक।

राजा राम मोहन राय - समाज सुधारक

"सती प्रथा" को समाप्त करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय पुनर्जागरण के जनक माने जाते हैं। ब्रह्म समाज की स्थापना की। महिला शिक्षा के पक्षधर थे। अंधविश्वास के खिलाफ लड़े। आधुनिक भारत के निर्माता। प्रगतिशील विचारों के प्रणेता।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर - शिक्षा के पुरोधा

विधवा पुनर्विवाह के समर्थक और बाल विवाह के विरोधी थे। संस्कृत के महान विद्वान। महिला शिक्षा के लिए स्कूल खोले। दयालु और उदार व्यक्तित्व। "विद्यासागर" उपाधि से सम्मानित। समाज सुधार में अग्रणी। शिक्षा प्रसार के लिए समर्पित।

सावित्रीबाई फुले - प्रथम महिला शिक्षिका

भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। लड़कियों के लिए स्कूल खोले। सामाजिक बहिष्कार का सामना किया। महिला शिक्षा की अग्रदूत। जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ीं। महिला सशक्तिकरण की प्रतीक। साहस और दृढ़ता का उदाहरण।

डॉ. भीमराव अंबेडकर - संविधान निर्माता

"शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।" - बाबासाहेब ने दलितों को समानता का अधिकार दिलाया। भारतीय संविधान के निर्माता। सामाजिक न्याय के योद्धा। 32 डिग्रियां हासिल कीं। "जय भीम" का नारा प्रेरणा देता है। समानता और न्याय के प्रतीक। महान विद्वान और नेता।

लाल बहादुर शास्त्री - सादगी के प्रतीक

"जय जवान, जय किसान" - शास्त्री जी का यह नारा अमर है। सादगी और ईमानदारी के प्रतीक थे। 1965 के युद्ध में नेतृत्व किया। "आत्मनिर्भर भारत" का सपना देखा। छोटे कद के महान नेता। सच्चे देशभक्त और जननायक। सादा जीवन उच्च विचार।

इंदिरा गांधी - लौह महिला

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। "गरीबी हटाओ" का नारा दिया। 1971 के युद्ध में बांग्लादेश बनाया। मजबूत नेतृत्व और निर्णय क्षमता। "आयरन लेडी ऑफ इंडिया" कहलाईं। महिला सशक्तिकरण का प्रतीक। साहसी और दृढ़ निश्चयी।

मदर टेरेसा - करुणा की मूर्ति

"प्यार की भूख रोटी की भूख से बड़ी है।" - मदर टेरेसा ने गरीबों की सेवा की। "मिशनरीज ऑफ चैरिटी" की स्थापना की। नोबेल शांति पुरस्कार मिला। भारत रत्न से सम्मानित। निस्वार्थ सेवा का जीवन। करुणा और प्रेम की प्रतिमूर्ति। संत कहलाईं।

सी.वी. रमन - नोबेल विजेता वैज्ञानिक

"रमन प्रभाव" की खोज की। भारत के पहले नोबेल विजेता वैज्ञानिक। विज्ञान में भारत का नाम रोशन किया। "राष्ट्रीय विज्ञान दिवस" उनके सम्मान में। सादा जीवन, उच्च विचार। शोध और अनुसंधान में समर्पित। भारतीय विज्ञान के जनक।

होमी जहांगीर भाभा - परमाणु ऊर्जा के जनक

भारत के परमाणु कार्यक्रम के संस्थापक। TIFR और BARC की स्थापना की। विज्ञान में भारत को आत्मनिर्भर बनाया। दूरदर्शी वैज्ञानिक और प्रशासक। परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग। भारतीय विज्ञान के स्तंभ। राष्ट्र निर्माण में योगदान।

विक्रम साराभाई - अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक

ISRO के संस्थापक। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव रखी। "अंतरिक्ष विज्ञान भारत के विकास के लिए" - उनका विजन। दूरदर्शी और प्रतिभाशाली वैज्ञानिक। शिक्षा और विज्ञान के प्रसार में योगदान। भारत को अंतरिक्ष शक्ति बनाया। राष्ट्र के गौरव।

ध्यानचंद - हॉकी के जादूगर

"हॉकी के जादूगर" कहलाए। तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते। उनकी हॉकी स्टिक में चुंबक होने की जांच हुई। खेल में भारत का नाम रोशन किया। "राष्ट्रीय खेल दिवस" उनके जन्मदिन पर। सादगी और विनम्रता के प्रतीक। महान खिलाड़ी और देशभक्त।

मिल्खा सिंह - फ्लाइंग सिख

"फ्लाइंग सिख" के नाम से प्रसिद्ध। विभाजन की त्रासदी से उबरकर चैंपियन बने। ओलंपिक में चौथे स्थान पर रहे। "भाग मिल्खा भाग" - उनकी जीवनी प्रेरणादायक। कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प का उदाहरण। भारतीय खेलों के आइकन। संघर्ष से सफलता की कहानी।

सचिन तेंदुलकर - क्रिकेट के भगवान

"मास्टर ब्लास्टर" और "क्रिकेट के भगवान" कहलाए। 100 अंतरराष्ट्रीय शतक बनाए। 24 वर्षों तक भारत का प्रतिनिधित्व किया। भारत रत्न से सम्मानित। विनम्रता और समर्पण का प्रतीक। करोड़ों का प्रेरणास्रोत। महानतम क्रिकेटर।

मैरी कॉम - बॉक्सिंग क्वीन

छह बार विश्व चैंपियन बनीं। ओलंपिक कांस्य पदक विजेता। मां बनने के बाद भी चैंपियन बनीं। "मैग्नीफिसेंट मैरी" कहलाती हैं। संघर्ष और दृढ़ता का प्रतीक। महिला सशक्तिकरण की मिसाल। प्रेरणादायक खिलाड़ी।

पी.वी. सिंधु - बैडमिंटन स्टार

ओलंपिक रजत और कांस्य पदक विजेता। विश्व चैंपियन बनीं। भारतीय बैडमिंटन का गौरव। कड़ी मेहनत और अनुशासन का उदाहरण। युवाओं के लिए प्रेरणा। खेल में भारत का नाम रोशन किया। महान खिलाड़ी।

रतन टाटा - उद्योग जगत के आदर्श

टाटा समूह को विश्व स्तर पर पहुंचाया। "नैनो" कार से आम आदमी का सपना पूरा किया। परोपकार और दान में विश्वास। सादगी और विनम्रता के प्रतीक। "पद्म विभूषण" से सम्मानित। नैतिक व्यापार के पक्षधर। प्रेरणादायक उद्यमी।

नारायण मूर्ति - इन्फोसिस के संस्थापक

इन्फोसिस की स्थापना की। भारत को IT सुपरपावर बनाने में योगदान। सादगी और ईमानदारी के प्रतीक। "पद्म विभूषण" से सम्मानित। शिक्षा और परोपकार में विश्वास। युवाओं के लिए आदर्श। सफल उद्यमी।

किरण मजूमदार शॉ - बायोकॉन की संस्थापक

भारत की सबसे अमीर स्व-निर्मित महिला। बायोकॉन को विश्व स्तर पर पहुंचाया। महिला उद्यमिता का प्रतीक। "पद्म भूषण" से सम्मानित। परोपकार में सक्रिय। प्रेरणादायक व्यक्तित्व। सफल उद्यमी।

सुंदर पिचाई - गूगल के CEO

साधारण परिवार से गूगल के CEO बने। भारत का गौरव। कड़ी मेहनत और प्रतिभा का उदाहरण। विनम्रता और सादगी बरकरार। युवाओं के लिए प्रेरणा। "पद्म भूषण" से सम्मानित। सफलता की कहानी।

सत्या नडेला - माइक्रोसॉफ्ट के CEO

माइक्रोसॉफ्ट को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। भारतीय मूल के सफल CEO। "एम्पैथी" और "ग्रोथ माइंडसेट" के पक्षधर। विनम्र और दूरदर्शी नेता। भारत का गौरव। प्रेरणादायक व्यक्तित्व। सफल नेतृत्व का उदाहरण।

कल्पना चावला - अंतरिक्ष यात्री

अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय महिला। "सपने देखो और उन्हें पूरा करो" - उनका संदेश। कोलंबिया दुर्घटना में शहीद हुईं। साहस और दृढ़ता का प्रतीक। महिला सशक्तिकरण की मिसाल। युवाओं के लिए प्रेरणा। अमर शहीद।

टेसी थॉमस - मिसाइल वुमन

"अग्नि मिसाइल" परियोजना की निदेशक। "मिसाइल वुमन ऑफ इंडिया" कहलाती हैं। रक्षा अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान। महिला वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा। "पद्म भूषण" से सम्मानित। राष्ट्र सेवा में समर्पित। प्रेरणादायक वैज्ञानिक।

मंगल पांडे - प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नायक

1857 के विद्रोह की चिंगारी सुलगाई। अंग्रेजों के खिलाफ पहले विद्रोही। साहस और बलिदान का प्रतीक। स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम शहीद। "मंगल पांडे" नाम प्रेरणा देता है। देशभक्ति का उदाहरण। अमर शहीद।

तात्या टोपे - महान क्रांतिकारी

1857 के विद्रोह के प्रमुख नेता। गुरिल्ला युद्ध के माहिर। अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी। रानी लक्ष्मीबाई के सहयोगी। साहस और रणनीति के धनी। स्वतंत्रता संग्राम के नायक। अमर क्रांतिकारी।

बाल गंगाधर तिलक - लोकमान्य

"स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है" - तिलक का यह नारा अमर है। "लोकमान्य" कहलाए। गणेश उत्सव और शिवाजी जयंती शुरू की। राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक। "गीता रहस्य" लिखी। स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत। महान नेता और विद्वान।

गोपाल कृष्ण गोखले - उदारवादी नेता

गांधी जी के राजनीतिक गुरु थे। "सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी" की स्थापना की। शिक्षा और सामाजिक सुधार के पक्षधर। उदारवादी विचारधारा के नेता। संवैधानिक तरीकों में विश्वास। महान देशभक्त और समाज सुधारक। प्रेरणादायक नेता।

लाला लाजपत राय - पंजाब केसरी

"पंजाब केसरी" और "शेर-ए-पंजाब" कहलाए। साइमन कमीशन के विरोध में शहीद हुए। "लाठी की चोट मुझ पर पड़ी है, अंग्रेजी राज के ताबूत पर कील ठोकी है।" आर्य समाज के सक्रिय सदस्य। स्वतंत्रता संग्राम के नायक। अमर शहीद।

बिपिन चंद्र पाल - क्रांतिकारी नेता

"लाल-बाल-पाल" तिकड़ी के सदस्य। उग्र राष्ट्रवाद के समर्थक। "स्वदेशी आंदोलन" के नेता। लेखक और पत्रकार। बंगाल विभाजन के विरोधी। स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत। प्रेरणादायक नेता।

मौलाना अबुल कलाम आजाद - शिक्षा मंत्री

स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री। IIT और UGC की स्थापना में योगदान। "भारत रत्न" से सम्मानित। राष्ट्रीय एकता के पक्षधर। विद्वान और लेखक। शिक्षा प्रसार में योगदान। महान नेता।

जवाहरलाल नेहरू - आधुनिक भारत के निर्माता

"चाचा नेहरू" के नाम से प्रसिद्ध। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री। आधुनिक भारत की नींव रखी। IIT, IIM, AIIMS की स्थापना। "पंचशील सिद्धांत" दिए। बच्चों से प्रेम। "भारत रत्न" से सम्मानित। दूरदर्शी नेता।

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प्राचीन शिक्षा

भारतीय शिक्षा प्रणाली का गौरवशाली इतिहास

गुरुकुल परंपरा - समग्र शिक्षा का केंद्र

प्राचीन भारत में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली थी। शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। यह समग्र विकास की शिक्षा थी - शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक। गुरु-शिष्य संबंध पवित्र माना जाता था। "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः" - गुरु को सर्वोच्च स्थान था। शिष्य गुरु की सेवा करते और ज्ञान प्राप्त करते थे। यहां राजा-रंक का भेद नहीं था।

नालंदा विश्वविद्यालय - विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय

नालंदा विश्व का प्रथम आवासीय विश्वविद्यालय था। यहां 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 शिक्षक थे। चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत से छात्र यहां पढ़ने आते थे। 9 मंजिला पुस्तकालय "धर्मगंज" था। बौद्ध धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा पढ़ाए जाते थे। ह्वेनसांग और इत्सिंग यहां अध्ययन किए। 12वीं सदी में बख्तियार खिलजी ने नष्ट किया।

तक्षशिला विश्वविद्यालय - प्राचीन ज्ञान का महाकेंद्र

तक्षशिला में 68 विषय पढ़ाए जाते थे। चाणक्य यहां के प्रसिद्ध आचार्य थे। यह राजनीति, अर्थशास्त्र और चिकित्सा का प्रमुख केंद्र था। पाणिनि, चरक, जीवक जैसे विद्वान यहां पढ़े। 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 5वीं शताब्दी तक फला-फूला। विश्व भर से छात्र आते थे। प्रवेश परीक्षा कठिन थी। आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा में विशेषज्ञता।

शिक्षा के सिद्धांत - चरित्र निर्माण का आधार

प्राचीन भारतीय शिक्षा में चरित्र निर्माण पर जोर था। "सा विद्या या विमुक्तये" - वही विद्या है जो मुक्ति दे। शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका नहीं, बल्कि जीवन था। "विद्या ददाति विनयम्" - विद्या विनम्रता देती है। नैतिक मूल्यों का विकास प्रमुख था। आत्म-साक्षात्कार शिक्षा का लक्ष्य। ज्ञान, कर्म और भक्ति का समन्वय।

विक्रमशिला विश्वविद्यालय - तांत्रिक बौद्ध धर्म का केंद्र

पाल राजा धर्मपाल ने 8वीं शताब्दी में स्थापित किया। तांत्रिक बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र था। 160 शिक्षकों और हजारों छात्रों का निवास। तर्कशास्त्र, व्याकरण और दर्शन में विशेषज्ञता। अतिश दीपंकर जैसे विद्वान यहां पढ़ाते थे। तिब्बती छात्रों का प्रमुख गंतव्य। 12वीं सदी में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट किया।

वल्लभी विश्वविद्यालय - पश्चिमी भारत का शिक्षा केंद्र

गुजरात में स्थित प्रसिद्ध विश्वविद्यालय। 6वीं से 12वीं शताब्दी तक फला-फूला। हीनयान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र। राजनीति, प्रशासन और कानून में विशेषज्ञता। ह्वेनसांग ने इसकी प्रशंसा की। 6000 से अधिक छात्र अध्ययन करते थे। अरब आक्रमणकारियों ने 8वीं सदी में नष्ट किया।

ओदंतपुरी विश्वविद्यालय - बिहार का गौरव

पाल राजा गोपाल ने 8वीं शताब्दी में स्थापित किया। नालंदा के बाद दूसरा सबसे बड़ा विश्वविद्यालय। 12,000 छात्रों का निवास। वज्रयान बौद्ध धर्म का केंद्र। तिब्बती बौद्ध धर्म पर गहरा प्रभाव। बख्तियार खिलजी ने 1193 में नष्ट किया। अब बिहार शरीफ में खंडहर।

जगद्दल विश्वविद्यालय - बंगाल का शिक्षा केंद्र

पाल राजा रामपाल ने 11वीं शताब्दी में स्थापित किया। नालंदा और विक्रमशिला के बाद तीसरा प्रमुख केंद्र। तांत्रिक बौद्ध धर्म और व्याकरण में विशेषज्ञता। तिब्बती अनुवादकों का प्रमुख केंद्र। संस्कृत और तिब्बती भाषा का अध्ययन। 13वीं सदी में मुस्लिम आक्रमण में नष्ट हुआ।

पुष्पगिरि विश्वविद्यालय - ओडिशा का प्राचीन केंद्र

ओडिशा में स्थित बौद्ध विश्वविद्यालय। तीन पहाड़ियों पर फैला विशाल परिसर। 3वीं से 11वीं शताब्दी तक सक्रिय। महायान और वज्रयान बौद्ध धर्म का केंद्र। दक्षिण-पूर्व एशिया से छात्र आते थे। ह्वेनसांग ने इसका उल्लेख किया। हाल में पुरातात्विक खुदाई से खोजा गया।

शारदा पीठ - कश्मीर का ज्ञान मंदिर

कश्मीर में स्थित प्राचीन शिक्षा केंद्र। शारदा देवी (सरस्वती) को समर्पित। संस्कृत, व्याकरण और दर्शन का प्रमुख केंद्र। आदि शंकराचार्य ने यहां शास्त्रार्थ किया। कश्मीरी शैव दर्शन का विकास केंद्र। अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में। तीर्थयात्रियों के लिए महत्वपूर्ण स्थल।

काशी - सनातन ज्ञान की राजधानी

वाराणसी सदियों से शिक्षा का केंद्र रहा है। वेद, उपनिषद, दर्शन का प्रमुख अध्ययन केंद्र। संस्कृत विद्वानों का तीर्थ स्थल। शंकराचार्य, रामानुज, मध्वाचार्य यहां आए। काशी विद्यापीठ की स्थापना। आज भी संस्कृत शिक्षा का केंद्र। "काशी विश्वनाथ" मंदिर आध्यात्मिक केंद्र।

कांची कामकोटि पीठ - दक्षिण का शिक्षा केंद्र

तमिलनाडु में स्थित प्राचीन पीठ। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित। वेदांत और अद्वैत दर्शन का केंद्र। संस्कृत और तमिल साहित्य का अध्ययन। चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती जैसे महान संत। आज भी सक्रिय शिक्षा केंद्र। धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र।

मिथिला - न्याय शास्त्र का गढ़

बिहार का मिथिला क्षेत्र शिक्षा का प्रमुख केंद्र। न्याय शास्त्र और तर्कशास्त्र में विशेषज्ञता। गंगेश उपाध्याय ने "नव्य न्याय" की स्थापना की। संस्कृत पंडितों की परंपरा। मैथिली भाषा और साहित्य का विकास। विद्यापति जैसे कवि यहां पैदा हुए। आज भी संस्कृत शिक्षा जीवित।

नवद्वीप - बंगाल का शिक्षा केंद्र

पश्चिम बंगाल में स्थित प्राचीन शिक्षा केंद्र। न्याय शास्त्र और स्मृति का अध्ययन। रघुनाथ शिरोमणि जैसे विद्वान। चैतन्य महाप्रभु का जन्मस्थान। भक्ति आंदोलन का केंद्र। संस्कृत टोल (पाठशाला) की परंपरा। आज भी वैष्णव धर्म का केंद्र।

उज्जैन - ज्योतिष और खगोल विज्ञान का केंद्र

मध्य प्रदेश में स्थित प्राचीन शिक्षा नगरी। ज्योतिष और खगोल विज्ञान का प्रमुख केंद्र। वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त यहां कार्यरत थे। "जंतर मंतर" वेधशाला। कालिदास की नगरी। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। सिंहस्थ कुंभ मेला का आयोजन स्थल।

मदुरै - तमिल साहित्य का केंद्र

तमिलनाडु में स्थित प्राचीन शिक्षा केंद्र। तमिल संगम साहित्य का विकास स्थल। तीन संगम (साहित्यिक अकादमी) आयोजित हुए। तमिल व्याकरण और काव्य का अध्ययन। मीनाक्षी मंदिर सांस्कृतिक केंद्र। भक्ति आंदोलन के संतों का स्थान। आज भी तमिल संस्कृति का गढ़।

श्रृंगेरी मठ - आदि शंकराचार्य की विरासत

कर्नाटक में स्थित प्रथम शंकर मठ। आदि शंकराचार्य द्वारा 8वीं शताब्दी में स्थापित। अद्वैत वेदांत का प्रमुख केंद्र। संस्कृत और वेद अध्ययन। शारदा मंदिर और पुस्तकालय। आज भी सक्रिय शिक्षा केंद्र। धार्मिक और दार्शनिक शिक्षा।

द्वारका पीठ - पश्चिमी भारत का मठ

गुजरात में स्थित शंकर मठ। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित। वेदांत और उपनिषद का अध्ययन। द्वारकाधीश मंदिर के निकट। समुद्र तट पर स्थित। संन्यासियों का प्रशिक्षण केंद्र। आज भी धार्मिक शिक्षा प्रदान करता है।

पुरी गोवर्धन मठ - पूर्वी भारत का केंद्र

ओडिशा के पुरी में स्थित शंकर मठ। जगन्नाथ मंदिर के निकट। वेद और वेदांत का अध्ययन। पूर्वी भारत के लिए धार्मिक केंद्र। संस्कृत शिक्षा और अनुसंधान। आज भी सक्रिय मठ। धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां।

ज्योतिर्मठ - हिमालय का शिक्षा केंद्र

उत्तराखंड में स्थित शंकर मठ। बद्रीनाथ के निकट हिमालय में। उत्तर भारत के लिए धार्मिक केंद्र। वेद और उपनिषद का अध्ययन। कठोर जलवायु में स्थित। संन्यासियों का तपस्या स्थल। आज भी धार्मिक शिक्षा केंद्र।

वेद पाठशाला - वैदिक ज्ञान की रक्षा

प्राचीन काल से वेद पाठशालाएं चलती आ रही हैं। वेदों का मौखिक संरक्षण और प्रसारण। कठोर अनुशासन और समर्पण की आवश्यकता। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद का अध्ययन। वैदिक उच्चारण और स्वर का महत्व। आज भी कई पाठशालाएं सक्रिय। UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त परंपरा।

संस्कृत टोल - पारंपरिक पाठशाला

संस्कृत टोल पारंपरिक शिक्षा केंद्र थे। व्याकरण, काव्य, न्याय, वेदांत का अध्ययन। गुरु-शिष्य परंपरा का पालन। निःशुल्क शिक्षा और आवास। पंडितों का प्रशिक्षण। बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध। आज भी कुछ टोल सक्रिय हैं।

आयुर्वेद शिक्षा - चरक और सुश्रुत की परंपरा

प्राचीन भारत में आयुर्वेद शिक्षा उन्नत थी। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता प्रमुख ग्रंथ। शल्य चिकित्सा (सर्जरी) में विशेषज्ञता। औषधि विज्ञान और रोग निदान। तक्षशिला और नालंदा में पढ़ाया जाता था। गुरु-शिष्य परंपरा से ज्ञान हस्तांतरण। आज भी आयुर्वेद शिक्षा जीवित।

गणित और खगोल विज्ञान - आर्यभट्ट की विरासत

प्राचीन भारत में गणित और खगोल विज्ञान उन्नत थे। आर्यभट्ट ने शून्य और दशमलव प्रणाली दी। ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य जैसे महान गणितज्ञ। ज्योतिष और खगोल विज्ञान का अध्ययन। सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय ग्रंथ। नालंदा और उज्जैन में पढ़ाया जाता था। विश्व को भारतीय अंक प्रणाली दी।

धनुर्विद्या - युद्ध कला की शिक्षा

प्राचीन भारत में धनुर्विद्या (तीरंदाजी) अनिवार्य थी। द्रोणाचार्य जैसे गुरु प्रसिद्ध थे। अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण। घुड़सवारी और रथ चालन। युद्ध नीति और रणनीति। क्षत्रिय वर्ण के लिए अनिवार्य। महाभारत में धनुर्विद्या का वर्णन। शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण।

योग और ध्यान - पतंजलि की शिक्षा

पतंजलि के योग सूत्र शिक्षा का आधार। अष्टांग योग का अध्ययन। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य। ध्यान और प्राणायाम का अभ्यास। आत्म-साक्षात्कार का मार्ग। गुरुकुल में योग अनिवार्य था। आज विश्व भर में लोकप्रिय। UNESCO द्वारा मान्यता प्राप्त।

संगीत और नृत्य - नाट्यशास्त्र की परंपरा

भरत मुनि का नाट्यशास्त्र प्रमुख ग्रंथ। संगीत, नृत्य और नाटक का अध्ययन। शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। भरतनाट्यम, कथक, ओडिसी आदि नृत्य। गुरु-शिष्य परंपरा से सीखना। मंदिरों में देवदासी परंपरा। आज भी शास्त्रीय कला जीवित। UNESCO विरासत सूची में।

शिल्प और वास्तुकला - विश्वकर्मा की परंपरा

प्राचीन भारत में शिल्प शिक्षा उन्नत थी। वास्तुशास्त्र का अध्ययन। मंदिर और महल निर्माण कला। मूर्तिकला और चित्रकला। धातु कर्म और आभूषण निर्माण। गुरु-शिष्य परंपरा से सीखना। अजंता-एलोरा की गुफाएं उदाहरण। आज भी पारंपरिक शिल्प जीवित।

व्याकरण - पाणिनि की अष्टाध्यायी

पाणिनि की अष्टाध्यायी विश्व का प्रथम व्याकरण ग्रंथ। संस्कृत व्याकरण के नियम। 4000 सूत्रों में संपूर्ण व्याकरण। तक्षशिला में पाणिनि ने रचना की। पतंजलि का महाभाष्य टीका। संस्कृत शिक्षा का आधार। आज भी अध्ययन किया जाता है। भाषा विज्ञान में क्रांतिकारी योगदान।

न्याय दर्शन - तर्कशास्त्र की शिक्षा

गौतम ऋषि के न्याय सूत्र प्रमुख ग्रंथ। तर्क और प्रमाण का विज्ञान। वाद-विवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा। मिथिला और नवद्वीप प्रमुख केंद्र। गंगेश उपाध्याय का नव्य न्याय। बौद्धिक विकास का माध्यम। आज भी दर्शन शास्त्र में पढ़ाया जाता है। तार्किक चिंतन का विकास।

अर्थशास्त्र - कौटिल्य का अर्थशास्त्र

चाणक्य (कौटिल्य) का अर्थशास्त्र प्रमुख ग्रंथ। राजनीति, अर्थव्यवस्था और प्रशासन। राजधर्म और राज्य संचालन। कूटनीति और युद्ध नीति। तक्षशिला में पढ़ाया जाता था। चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु चाणक्य। आज भी प्रासंगिक ग्रंथ। प्रबंधन शिक्षा में उपयोगी।

धर्मशास्त्र - मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति

मनुस्मृति प्राचीन धर्म ग्रंथ। सामाजिक नियम और कानून। याज्ञवल्क्य स्मृति भी प्रमुख। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का विवेचन। वर्णाश्रम धर्म का वर्णन। न्याय और दंड व्यवस्था। गुरुकुल में पढ़ाया जाता था। सामाजिक व्यवस्था का आधार।

काव्य और साहित्य - कालिदास की परंपरा

संस्कृत काव्य और साहित्य की समृद्ध परंपरा। कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट जैसे कवि। अभिज्ञान शाकुंतलम्, मेघदूत जैसी रचनाएं। काव्यशास्त्र और अलंकार का अध्ययन। रस सिद्धांत और छंद शास्त्र। गुरुकुल में काव्य रचना सिखाई जाती थी। आज भी संस्कृत साहित्य पढ़ाया जाता है।

वेदांत दर्शन - उपनिषदों की शिक्षा

उपनिषद वेदांत दर्शन के आधार। ब्रह्म और आत्मा का ज्ञान। "तत्त्वमसि" - तुम वही हो। आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदांत। रामानुज का विशिष्टाद्वैत। मध्वाचार्य का द्वैत। गुरुकुल में गहन अध्ययन। आत्म-साक्षात्कार का मार्ग।

बौद्ध शिक्षा - विहार और संघ परंपरा

बौद्ध विहारों में शिक्षा व्यवस्था। भिक्षुओं का प्रशिक्षण। त्रिपिटक का अध्ययन। ध्यान और विपश्यना। नालंदा और विक्रमशिला बौद्ध केंद्र। पाली और संस्कृत भाषा। महायान और हीनयान परंपरा। आज भी तिब्बती बौद्ध शिक्षा जीवित।

जैन शिक्षा - अहिंसा और तप की शिक्षा

जैन मठों में शिक्षा व्यवस्था। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह का पालन। आगम ग्रंथों का अध्ययन। तर्कशास्त्र और स्याद्वाद। प्राकृत और संस्कृत भाषा। कठोर तप और अनुशासन। श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा। आज भी जैन शिक्षा संस्थान सक्रिय।

लोक शिक्षा - पंचतंत्र और हितोपदेश

पंचतंत्र और हितोपदेश नीति ग्रंथ। कहानियों के माध्यम से शिक्षा। बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा। व्यावहारिक ज्ञान और जीवन कौशल। विष्णु शर्मा की रचना पंचतंत्र। विश्व की सबसे अधिक अनुवादित पुस्तक। आज भी बच्चों को पढ़ाई जाती है। मनोरंजक और शिक्षाप्रद।

महिला शिक्षा - गार्गी और मैत्रेयी की परंपरा

प्राचीन भारत में महिला शिक्षा सम्मानित थी। गार्गी और मैत्रेयी विदुषी महिलाएं। उपनिषदों में महिला ऋषियों का उल्लेख। शास्त्रार्थ में भाग लेती थीं। वैदिक काल में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार। बाद में प्रतिबंध लगे। आज फिर से महिला शिक्षा पर जोर। समानता और सशक्तिकरण।

शिक्षा का उद्देश्य - मोक्ष की प्राप्ति

"सा विद्या या विमुक्तये" - वही विद्या जो मुक्ति दे। शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका नहीं। चरित्र निर्माण और आत्म-विकास। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति। "विद्या ददाति विनयम्" - विद्या विनम्रता देती है। समग्र व्यक्तित्व का विकास। आज भी यह दर्शन प्रासंगिक। शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया।

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ब्रह्मांड के रहस्य

वैदिक विज्ञान में ब्रह्मांड का ज्ञान

नासदीय सूक्त - सृष्टि का महान रहस्य

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में सृष्टि की उत्पत्ति का गहन दार्शनिक विवेचन है। "न सत् आसीत् न असत् आसीत्" - न सत् था न असत्। सृष्टि से पहले क्या था? न अंधकार था न प्रकाश। न मृत्यु थी न अमरता। केवल एक तत्व था जो स्वयं से सांस ले रहा था। फिर काम (इच्छा) उत्पन्न हुई और सृष्टि का आरंभ हुआ। यह विज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम है।

हिरण्यगर्भ - ब्रह्मांड का स्वर्णिम गर्भ

हिरण्यगर्भ सूक्त में ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन है। सृष्टि के आरंभ में एक स्वर्णिम अंडा (गर्भ) था। इसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए और सृष्टि रची। यह बिग बैंग सिद्धांत से मिलता-जुलता है। एक बिंदु से संपूर्ण ब्रह्मांड का विस्तार। वैदिक ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले यह ज्ञान प्राप्त किया था। आधुनिक विज्ञान अब इसे स्वीकार कर रहा है।

ब्रह्मा का दिन - 4.32 अरब वर्ष

एक कल्प ब्रह्मा का एक दिन है जो 4.32 अरब वर्ष का होता है। ब्रह्मा की रात भी उतनी ही लंबी। एक कल्प में 14 मन्वंतर होते हैं। प्रत्येक मन्वंतर में 71 चतुर्युगी होती हैं। यह काल गणना आधुनिक विज्ञान के पृथ्वी की आयु (4.5 अरब वर्ष) से मेल खाती है। वैदिक ऋषियों की गणना की सूक्ष्मता अद्भुत है।

चतुर्युगी - चार युगों का चक्र

सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग - ये चार युग हैं। सतयुग 17,28,000 वर्ष का, त्रेता 12,96,000 वर्ष का, द्वापर 8,64,000 वर्ष का और कलियुग 4,32,000 वर्ष का होता है। कुल मिलाकर एक चतुर्युगी 43,20,000 वर्ष की होती है। वर्तमान में कलियुग चल रहा है जो लगभग 5000 वर्ष पहले शुरू हुआ। यह चक्र निरंतर चलता रहता है।

सूर्य - प्राण का स्रोत

सूर्य को आत्मा जगतस्तस्थुषश्च - जगत की आत्मा कहा गया है। सूर्य सभी ग्रहों का केंद्र है। गायत्री मंत्र सूर्य को समर्पित है। सूर्य से ही जीवन संभव है। प्राचीन भारतीयों को सूर्य केंद्रित सौर मंडल का ज्ञान था। आर्यभट्ट ने पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने का सिद्धांत दिया। सूर्य नमस्कार योग में महत्वपूर्ण है।

चंद्रमा - मन का स्वामी

चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। चंद्रमा की कलाएं (phases) मानव मन को प्रभावित करती हैं। पूर्णिमा और अमावस्या का विशेष महत्व। ज्वार-भाटा चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण से होता है - यह ज्ञान प्राचीन भारत में था। चंद्र कैलेंडर (पंचांग) चंद्रमा पर आधारित। सोम (चंद्रमा) वैदिक देवता हैं। चंद्रमा की दूरी और आकार की गणना प्राचीन ज्योतिष में थी।

मंगल - शक्ति का ग्रह

मंगल को भूमिपुत्र (पृथ्वी का पुत्र) कहा गया है। यह शक्ति, साहस और युद्ध का कारक है। मंगल का लाल रंग रक्त और ऊर्जा का प्रतीक। मंगलवार मंगल को समर्पित। हनुमान जी मंगल के देवता माने जाते हैं। मंगल दोष विवाह में महत्वपूर्ण माना जाता है। आधुनिक विज्ञान ने मंगल पर जीवन की खोज शुरू की है।

बुध - बुद्धि का स्वामी

बुध ग्रह बुद्धि, वाणी और व्यापार का कारक है। यह सबसे तेज गति से सूर्य की परिक्रमा करता है। बुधवार बुध को समर्पित। बुध चंद्रमा और तारा का पुत्र माना गया है। संचार, गणित और विज्ञान पर बुध का प्रभाव। बुध की स्थिति बुद्धि के विकास को प्रभावित करती है। प्राचीन ज्योतिषियों ने बुध की गति की सटीक गणना की थी।

गुरु (बृहस्पति) - ज्ञान का देवता

बृहस्पति देवताओं के गुरु हैं। यह सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। ज्ञान, धर्म और विस्तार का कारक। गुरुवार बृहस्पति को समर्पित। बृहस्पति की स्थिति भाग्य और समृद्धि को प्रभावित करती है। 12 वर्ष में एक राशि की यात्रा - इसलिए 12 वर्ष का चक्र महत्वपूर्ण। प्राचीन भारतीयों को बृहस्पति के उपग्रहों का ज्ञान था।

शुक्र - सौंदर्य और प्रेम का ग्रह

शुक्र असुरों के गुरु हैं। सौंदर्य, प्रेम, कला और विलासिता का कारक। शुक्रवार शुक्र को समर्पित। शुक्र सबसे चमकीला ग्रह है - शुक्र तारा। संगीत, नृत्य और कला पर शुक्र का प्रभाव। शुक्र की स्थिति वैवाहिक जीवन को प्रभावित करती है। शुक्राचार्य संजीवनी विद्या के ज्ञाता थे। शुक्र का घनत्व और वायुमंडल की जानकारी प्राचीन ग्रंथों में।

शनि - न्याय का देवता

शनि सूर्य पुत्र और न्याय के देवता हैं। कर्म फल देने वाले ग्रह। शनिवार शनि को समर्पित। शनि की साढ़े साती और ढैय्या प्रसिद्ध हैं। शनि धीमी गति से चलता है - 30 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा। अनुशासन, कठोर परिश्रम और त्याग का कारक। शनि के वलय (rings) का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। शनि देव की पूजा कष्टों से मुक्ति के लिए।

राहु - छाया ग्रह का रहस्य

राहु चंद्र ग्रहण का कारक है। यह छाया ग्रह है - भौतिक नहीं। समुद्र मंथन की कथा में राहु का उल्लेख। राहु सिर है और केतु धड़। राहु भौतिक इच्छाओं और महत्वाकांक्षा का कारक। राहु काल अशुभ माना जाता है। ग्रहण के समय राहु सूर्य या चंद्र को ग्रस लेता है। आधुनिक विज्ञान में राहु चंद्रमा की कक्षा का उत्तरी बिंदु है।

केतु - मोक्ष का मार्ग

केतु राहु का धड़ है - छाया ग्रह। आध्यात्मिकता और मोक्ष का कारक। केतु अतीत के कर्मों का प्रतिनिधि। केतु की स्थिति आध्यात्मिक जागृति देती है। केतु भौतिक संसार से विरक्ति का कारक। गणेश जी केतु के देवता माने जाते हैं। केतु ध्यान और योग में सहायक। आधुनिक विज्ञान में केतु चंद्रमा की कक्षा का दक्षिणी बिंदु है।

नक्षत्र - 27 तारा समूह

27 नक्षत्र चंद्रमा की यात्रा के पड़ाव हैं। प्रत्येक नक्षत्र 13°20' का होता है। अश्विनी से रेवती तक 27 नक्षत्र। प्रत्येक नक्षत्र का अपना देवता और गुण। जन्म नक्षत्र व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। नक्षत्र पंचांग और मुहूर्त में महत्वपूर्ण। रोहिणी, पुष्य, श्रवण शुभ नक्षत्र माने जाते हैं। नक्षत्र विज्ञान प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान की देन।

राशि चक्र - 12 राशियों का विज्ञान

मेष से मीन तक 12 राशियां हैं। प्रत्येक राशि 30° की होती है। राशि चक्र 360° का वृत्त है। सूर्य एक वर्ष में सभी राशियों से गुजरता है। प्रत्येक राशि का अपना स्वामी ग्रह। राशि व्यक्तित्व और भाग्य को प्रभावित करती है। अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल - चार तत्वों में राशियां विभाजित। राशि चक्र ज्योतिष का आधार है।

भचक्र - ग्रहों की कक्षाएं

भचक्र वह पथ है जिस पर ग्रह चलते हैं। सूर्य के चारों ओर ग्रहों की अण्डाकार कक्षाएं। आर्यभट्ट ने भचक्र की सटीक गणना की। ग्रहों की गति और स्थिति की भविष्यवाणी। भचक्र ज्योतिष गणना का आधार। ग्रहण की भविष्यवाणी भचक्र से। प्राचीन भारतीय खगोलविदों की सटीकता अद्भुत। आधुनिक विज्ञान ने इसे स्वीकार किया।

14 लोक - बहुआयामी ब्रह्मांड

7 ऊर्ध्व लोक: भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम्। 7 अधो लोक: अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल। पृथ्वी (भूलोक) मध्य में है। प्रत्येक लोक की अपनी विशेषता। यह बहुआयामी ब्रह्मांड की अवधारणा है। आधुनिक विज्ञान में parallel universes का सिद्धांत। वैदिक ऋषियों का गहन ज्ञान। लोक यात्रा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग।

स्वर्ग लोक - देवताओं का निवास

स्वर्ग लोक (स्वः) देवताओं का निवास स्थान। इंद्र स्वर्ग के राजा हैं। पुण्य कर्म करने वालों को स्वर्ग मिलता है। स्वर्ग में दिव्य सुख और सुविधाएं। अप्सराएं, गंधर्व स्वर्ग में रहते हैं। स्वर्ग अस्थायी है - पुण्य समाप्त होने पर पुनर्जन्म। मोक्ष स्वर्ग से भी ऊपर है। स्वर्ग की अवधारणा कर्म सिद्धांत से जुड़ी।

पाताल लोक - नागों का संसार

पाताल सात अधो लोकों में सबसे नीचे। नाग (सर्प) पाताल के निवासी। वासुकि, शेषनाग, तक्षक प्रसिद्ध नाग। पाताल में अपार धन और रत्न। पाताल सुंदर और समृद्ध लोक। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजते हैं। पाताल यात्रा की कथाएं पुराणों में। यह पृथ्वी के भीतर का संसार हो सकता है।

ब्रह्मलोक (सत्यलोक) - सर्वोच्च लोक

सत्यलोक सभी लोकों में सर्वोच्च। ब्रह्मा जी का निवास स्थान। यहां पहुंचने पर पुनर्जन्म नहीं। महान ऋषि और योगी यहां पहुंचते हैं। ब्रह्मलोक की आयु एक महाकल्प। यहां से भी मोक्ष संभव है। ब्रह्मलोक आध्यात्मिक उन्नति का शिखर। केवल परम ज्ञानी ही यहां पहुंचते हैं।

वैकुंठ - विष्णु का धाम

वैकुंठ भगवान विष्णु का नित्य धाम। यह 14 लोकों से परे है। वैकुंठ में कोई दुःख नहीं। लक्ष्मी जी वैकुंठ की स्वामिनी। भक्त वैकुंठ में विष्णु के साथ रहते हैं। वैकुंठ से वापसी नहीं - मोक्ष। वैकुंठ नित्य और अविनाशी। भक्ति मार्ग से वैकुंठ की प्राप्ति।

कैलाश - शिव का निवास

कैलाश पर्वत शिव का निवास। यह हिमालय में स्थित है। कैलाश पवित्र तीर्थ स्थल। शिव-पार्वती कैलाश पर विराजते हैं। कैलाश की परिक्रमा महापुण्य। कैलाश से मानसरोवर झील निकट। कैलाश आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र। तिब्बत में स्थित कैलाश अब भी रहस्यमय।

गोलोक - कृष्ण का धाम

गोलोक श्री कृष्ण का नित्य धाम। यह वैकुंठ से भी ऊपर माना जाता है। राधा-कृष्ण गोलोक में विराजते हैं। गोलोक में नित्य रास लीला। गोपियां और ग्वाल-बाल गोलोक में। प्रेम भक्ति से गोलोक की प्राप्ति। गोलोक परम आनंद का स्थान। वैष्णव भक्त गोलोक को परम लक्ष्य मानते हैं।

अयोध्या - राम की नगरी

अयोध्या सरयू नदी के तट पर स्थित। भगवान राम की जन्मभूमि। इक्ष्वाकु वंश की राजधानी। अयोध्या सात पवित्र नगरों में एक। राम मंदिर अयोध्या का केंद्र। अयोध्या प्राचीन और समृद्ध नगरी थी। आज भी अयोध्या तीर्थ स्थल। अयोध्या भारतीय संस्कृति का प्रतीक।

द्वारका - कृष्ण की नगरी

द्वारका गुजरात के तट पर स्थित थी। श्री कृष्ण ने द्वारका बसाई। समुद्र में डूबी हुई नगरी। पुरातात्विक खोज में द्वारका के अवशेष मिले। द्वारकाधीश मंदिर प्रसिद्ध। द्वारका चार धाम में एक। द्वारका यादवों की राजधानी थी। द्वारका की भव्यता पुराणों में वर्णित।

मथुरा-वृंदावन - कृष्ण की लीला भूमि

मथुरा श्री कृष्ण की जन्मभूमि। वृंदावन कृष्ण की बाल लीलाओं का स्थान। यमुना नदी के तट पर स्थित। राधा-कृष्ण की रास लीला वृंदावन में। गोवर्धन पर्वत कृष्ण ने उठाया। मथुरा-वृंदावन पवित्र तीर्थ। हजारों मंदिर और घाट। भक्ति आंदोलन का केंद्र।

ब्रह्मांड का विस्तार - फैलता हुआ ब्रह्मांड

वेदों में ब्रह्मांड के विस्तार का उल्लेख। "विराट पुरुष" से ब्रह्मांड का विस्तार। ब्रह्मांड निरंतर फैल रहा है - आधुनिक विज्ञान की पुष्टि। हबल ने 1929 में इसे सिद्ध किया। वैदिक ऋषियों को हजारों वर्ष पहले यह ज्ञान था। ब्रह्मांड का अंत और पुनः सृष्टि - चक्रीय प्रक्रिया। प्रलय के बाद पुनः सृष्टि।

प्रलय - ब्रह्मांड का विनाश

प्रलय तीन प्रकार की होती है: नित्य, नैमित्तिक और प्राकृतिक। नित्य प्रलय - प्रतिदिन मृत्यु। नैमित्तिक प्रलय - ब्रह्मा की रात। महाप्रलय - ब्रह्मा की मृत्यु। प्रलय में सब कुछ नष्ट हो जाता है। केवल ब्रह्म शेष रहता है। प्रलय के बाद पुनः सृष्टि। यह चक्र अनंत काल से चल रहा है।

पंच महाभूत - पांच तत्व

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - पांच महाभूत। इन्हीं से सृष्टि बनी है। प्रत्येक तत्व का अपना गुण। पृथ्वी - गंध, जल - रस, अग्नि - रूप, वायु - स्पर्श, आकाश - शब्द। मानव शरीर भी पंच तत्वों से बना। मृत्यु के बाद पंच तत्वों में विलीन। आयुर्वेद पंच महाभूत सिद्धांत पर आधारित। यह प्राचीन भारतीय विज्ञान की नींव।

त्रिगुण - सत्व, रजस, तमस

प्रकृति तीन गुणों से बनी है। सत्व - शुद्धता, ज्ञान, प्रकाश। रजस - क्रिया, इच्छा, गति। तमस - अज्ञान, जड़ता, अंधकार। सभी वस्तुओं में तीनों गुण हैं। गुणों का संतुलन महत्वपूर्ण। योग और ध्यान से सात्विक गुण बढ़ता है। भगवद गीता में त्रिगुण का विस्तृत वर्णन। गुणातीत होना मोक्ष का मार्ग।

कर्म सिद्धांत - कारण और प्रभाव

"जैसा कर्म वैसा फल" - कर्म का सिद्धांत। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अच्छे कर्म सुख देते हैं, बुरे कर्म दुःख। कर्म तीन प्रकार के: संचित, प्राब्ध, क्रियमाण। पुनर्जन्म कर्म के कारण होता है। कर्म से मुक्ति ही मोक्ष है। निष्काम कर्म गीता का संदेश। कर्म सिद्धांत न्याय का आधार।

पुनर्जन्म - आत्मा की यात्रा

आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। मृत्यु के बाद आत्मा नया शरीर धारण करती है। "वासांसि जीर्णानि यथा विहाय" - जैसे पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करते हैं। कर्म के अनुसार अगला जन्म मिलता है। पुनर्जन्म का उद्देश्य कर्म पूर्ण करना। मोक्ष प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं। पुनर्जन्म की अवधारणा वैदिक दर्शन की देन। आधुनिक शोध पुनर्जन्म की पुष्टि करते हैं।

मोक्ष - परम लक्ष्य

मोक्ष जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। यह जीवन का परम लक्ष्य। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष - चार पुरुषार्थ। मोक्ष में आत्मा ब्रह्म से मिल जाती है। "तत्त्वमसि" - तुम वही हो। ज्ञान, भक्ति, कर्म - तीन मार्ग मोक्ष के। मोक्ष परम आनंद की अवस्था। मोक्ष प्राप्त आत्मा पुनः जन्म नहीं लेती।

ब्रह्म - परम सत्य

ब्रह्म सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, अनंत। "एकम् सत् विप्राः बहुधा वदन्ति" - सत्य एक है, विद्वान अनेक नाम देते हैं। ब्रह्म निराकार और सगुण दोनों। ब्रह्म ही सृष्टि का कारण। "अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूं। आत्मा और ब्रह्म एक हैं। ब्रह्म को जानना ही मोक्ष। उपनिषद ब्रह्म विद्या के ग्रंथ।

माया - भ्रम का जाल

माया ब्रह्म की शक्ति है जो भ्रम उत्पन्न करती है। संसार माया का खेल है। माया के कारण आत्मा को अपना स्वरूप भूल जाता है। "जगत मिथ्या" - संसार भ्रम है। माया से मुक्ति ज्ञान से होती है। माया दो प्रकार की: विद्या माया और अविद्या माया। माया को समझना मोक्ष का मार्ग। शंकराचार्य ने माया सिद्धांत विकसित किया।

कुंडलिनी - सुप्त शक्ति

कुंडलिनी मूलाधार चक्र में सुप्त शक्ति है। सर्प की तरह कुंडली मारकर बैठी है। योग साधना से कुंडलिनी जागृत होती है। सात चक्रों से होकर सहस्रार तक पहुंचती है। कुंडलिनी जागरण से दिव्य शक्तियां मिलती हैं। यह आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग। कुंडलिनी योग उन्नत विज्ञान है। गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है।

सप्त चक्र - ऊर्जा केंद्र

मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार - सात चक्र। प्रत्येक चक्र शरीर में ऊर्जा केंद्र है। चक्रों का संतुलन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक। योग और ध्यान से चक्र सक्रिय होते हैं। प्रत्येक चक्र का अपना रंग और बीज मंत्र। सहस्रार चक्र सर्वोच्च - यहां ब्रह्म का निवास। चक्र विज्ञान प्राचीन भारतीय योग की देन।

नाड़ी तंत्र - प्राण का मार्ग

72,000 नाड़ियां शरीर में हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना - तीन मुख्य नाड़ियां। इड़ा चंद्र नाड़ी - बाएं नासिका। पिंगला सूर्य नाड़ी - दाएं नासिका। सुषुम्ना मध्य नाड़ी - रीढ़ की हड्डी में। प्राण नाड़ियों से प्रवाहित होता है। प्राणायाम से नाड़ी शुद्धि। नाड़ी तंत्र योग विज्ञान का आधार।

ओम् - प्रणव नाद

ओम् ब्रह्मांड की मूल ध्वनि है। अ, उ, म - तीन अक्षरों से बना। ओम् में संपूर्ण वेद समाहित। ओम् का जाप परम शक्तिशाली। ओम् ब्रह्म का प्रतीक। सभी मंत्र ओम् से शुरू होते हैं। ओम् ध्यान का आधार। आधुनिक विज्ञान ने ओम् की आवृत्ति मापी। ओम् ब्रह्मांड की आवृत्ति से मेल खाता है।

ब्रह्मांड और मानव - लघु ब्रह्मांड

"यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे" - जैसा शरीर में वैसा ब्रह्मांड में। मानव शरीर लघु ब्रह्मांड है। शरीर में सभी तत्व और ग्रह प्रतिबिंबित। सात चक्र सात लोकों के समान। नाड़ियां ब्रह्मांड की ऊर्जा धाराओं जैसी। आत्मा ब्रह्म का अंश। मानव में ब्रह्मांड की सभी शक्तियां। आत्म-ज्ञान से ब्रह्मांड का ज्ञान। यह वैदिक विज्ञान का मूल सिद्धांत।

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धर्म अवधारणाएं

सनातन धर्म के मूल सिद्धांत

सत्य - परम धर्म

सत्य सबसे बड़ा धर्म है। "सत्यमेव जयते" - सत्य की ही विजय होती है। सत्य बोलना, सत्य आचरण करना जीवन का मूल है। झूठ से पाप और सत्य से पुण्य मिलता है। सत्य कभी नहीं बदलता। महात्मा गांधी ने सत्य को ईश्वर माना। सत्य की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य। सत्य से ही न्याय की स्थापना होती है।

अहिंसा - सर्वोच्च धर्म

अहिंसा परमो धर्मः - अहिंसा सर्वोच्च धर्म है। मन, वचन और कर्म से किसी को दुःख न देना अहिंसा है। जैन धर्म में अहिंसा सर्वोपरि। बुद्ध ने करुणा और अहिंसा का उपदेश दिया। अहिंसा केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी। क्रोध, घृणा, ईर्ष्या भी हिंसा हैं। अहिंसा से शांति और प्रेम फैलता है। गांधी जी ने अहिंसा से स्वतंत्रता प्राप्त की।

दया और करुणा

दया धर्म का मूल है। सभी प्राणियों पर दया करना मनुष्य का धर्म। करुणा हृदय का गुण है। दुःखी को देखकर सहायता करना करुणा है। बुद्ध ने करुणा को सर्वोच्च गुण बताया। दया से हृदय शुद्ध होता है। निर्बल और असहाय की सहायता परम धर्म। दया और करुणा से समाज में प्रेम बढ़ता है।

क्षमा - महान गुण

क्षमा वीरस्य भूषणम् - क्षमा वीर का आभूषण है। अपराध को क्षमा करना महानता है। क्षमा से मन शांत होता है। क्रोध और प्रतिशोध से दुःख बढ़ता है। क्षमा करने वाला महान होता है। भगवान राम ने विभीषण को क्षमा किया। क्षमा से शत्रु भी मित्र बन जाता है। क्षमा आत्मिक शक्ति का प्रतीक है।

दान - पुण्य कर्म

दान देना परम पुण्य है। जरूरतमंद को देना सच्चा दान। अन्न दान, विद्या दान, अभय दान महान। दान निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए। दान से धन की शुद्धि होती है। कर्ण दानवीर के नाम से प्रसिद्ध। दान करने वाले को सुख और समृद्धि मिलती है। दान से समाज में समानता आती है।

तप - आत्म संयम

तप का अर्थ है आत्म संयम और साधना। इंद्रियों पर नियंत्रण तप है। कठोर साधना से सिद्धि मिलती है। ऋषि-मुनि तप से शक्ति प्राप्त करते थे। तप से मन और शरीर शुद्ध होता है। विश्वामित्र ने तप से ब्रह्मर्षि पद पाया। तप तीन प्रकार का: शारीरिक, वाचिक, मानसिक। तप से आध्यात्मिक उन्नति होती है।

संतोष - सुख का मूल

संतोष परम सुख है। जो मिला है उसमें संतुष्ट रहना संतोष। असंतोष दुःख का कारण है। संतोष से मन शांत रहता है। लालच और लोभ से दुःख बढ़ता है। संतोषी सदा सुखी - प्रसिद्ध कहावत। संतोष योग का एक नियम है। संतोष से आत्मिक शांति मिलती है।

श्रद्धा - विश्वास की शक्ति

श्रद्धा ईश्वर और गुरु में विश्वास है। श्रद्धा से भक्ति संभव है। बिना श्रद्धा के साधना व्यर्थ। श्रद्धावान को ज्ञान मिलता है। गीता में श्रद्धा का महत्व बताया गया। श्रद्धा तीन प्रकार की: सात्विक, राजसिक, तामसिक। सात्विक श्रद्धा सर्वोत्तम। श्रद्धा से असंभव भी संभव हो जाता है।

भक्ति - प्रेम का मार्ग

भक्ति ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण है। भक्ति मार्ग सबसे सरल। नवधा भक्ति - नौ प्रकार की भक्ति। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्म निवेदन। मीरा, तुलसी, सूर भक्त कवि। भक्ति से मोक्ष मिलता है। भक्ति में जाति-पाति का भेद नहीं। भक्ति योग गीता में वर्णित।

ज्ञान - अंधकार से प्रकाश

ज्ञान अज्ञान का नाश करता है। आत्म-ज्ञान परम ज्ञान है। ज्ञान से मुक्ति मिलती है। "तमसो मा ज्योतिर्गमय" - अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। ज्ञान योग गीता का मार्ग। ज्ञानी ब्रह्म को जानता है। गुरु से ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान सबसे बड़ा धन है।

कर्म योग - निष्काम कर्म

कर्म करो, फल की इच्छा मत करो - गीता का संदेश। निष्काम कर्म से बंधन नहीं होता। कर्म योग गीता का मुख्य उपदेश। कर्म करना मनुष्य का धर्म है। फल ईश्वर के हाथ में है। कर्म में कुशलता ही योग है। कर्म से पलायन नहीं, कर्म में लीन होना। कर्म योग से मोक्ष संभव है।

राज योग - मन का नियंत्रण

राज योग पतंजलि का योग दर्शन है। अष्टांग योग - आठ अंग। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। मन को नियंत्रित करना राज योग। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। समाधि परम अवस्था है। राज योग से आत्म साक्षात्कार। योग सूत्र राज योग का ग्रंथ।

हठ योग - शारीरिक साधना

हठ योग शरीर की साधना है। आसन और प्राणायाम हठ योग के अंग। षट्कर्म शरीर शुद्धि की विधि। हठ योग से शरीर स्वस्थ और मजबूत। कुंडलिनी जागरण हठ योग का लक्ष्य। गोरखनाथ हठ योग के प्रवर्तक। हठ योग प्रदीपिका प्रसिद्ध ग्रंथ। हठ योग राज योग की तैयारी है।

ध्यान - मन की एकाग्रता

ध्यान मन को एक बिंदु पर केंद्रित करना है। ध्यान से मन शांत होता है। नियमित ध्यान से आत्म-ज्ञान। ध्यान योग का सातवां अंग। ध्यान में श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। ध्यान से तनाव दूर होता है। बुद्ध ने ध्यान से बोधि प्राप्त की। ध्यान आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित।

समाधि - परम अवस्था

समाधि योग की चरम अवस्था है। समाधि में आत्मा और ब्रह्म का मिलन। समाधि दो प्रकार की: सविकल्प और निर्विकल्प। निर्विकल्प समाधि परम अवस्था। समाधि में समय का ज्ञान नहीं रहता। समाधि से परम आनंद की अनुभूति। महान योगी समाधि में लीन रहते हैं। समाधि से मोक्ष की प्राप्ति।

मंत्र - ध्वनि की शक्ति

मंत्र पवित्र ध्वनि है जिसमें शक्ति है। मंत्र जाप से मन शुद्ध होता है। वैदिक मंत्र सबसे प्राचीन। गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ मंत्र। ओम् सभी मंत्रों का मूल। मंत्र का सही उच्चारण आवश्यक। मंत्र दीक्षा गुरु से लेनी चाहिए। मंत्र साधना से सिद्धि मिलती है।

यज्ञ - पवित्र अनुष्ठान

यज्ञ वैदिक परंपरा का मूल है। अग्नि में आहुति देना यज्ञ। यज्ञ से वातावरण शुद्ध होता है। पंच महायज्ञ प्रतिदिन करने चाहिए। ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ, अतिथि यज्ञ। यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं। यज्ञ त्याग और समर्पण का प्रतीक। आधुनिक विज्ञान यज्ञ के लाभ मानता है।

संस्कार - जीवन के संस्कार

16 संस्कार हिंदू धर्म में हैं। गर्भाधान से अंत्येष्टि तक संस्कार। संस्कार व्यक्तित्व निर्माण करते हैं। नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, उपनयन महत्वपूर्ण। विवाह सबसे बड़ा संस्कार। संस्कार से जीवन पवित्र बनता है। संस्कार परंपरा को जीवित रखते हैं। संस्कार धर्म और संस्कृति के वाहक।

आश्रम व्यवस्था - जीवन के चार चरण

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास - चार आश्रम। प्रत्येक आश्रम 25 वर्ष का। ब्रह्मचर्य में शिक्षा और साधना। गृहस्थ में कर्तव्य पालन। वानप्रस्थ में वन गमन और तप। संन्यास में मोक्ष की साधना। आश्रम व्यवस्था जीवन को व्यवस्थित करती है। यह प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था थी।

वर्ण व्यवस्था - कर्म आधारित विभाजन

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र - चार वर्ण। वर्ण कर्म और गुण पर आधारित था। ब्राह्मण ज्ञान का कार्य करते थे। क्षत्रिय रक्षा का कार्य। वैश्य व्यापार और कृषि। शूद्र सेवा कार्य। वर्ण जन्म से नहीं, कर्म से निर्धारित। बाद में यह जाति व्यवस्था बन गई। मूल वर्ण व्यवस्था लचीली थी।

गुरु - ज्ञान का स्रोत

गुरु बिना ज्ञान नहीं मिलता। गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। "गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः" - गुरु ब्रह्मा, विष्णु और शिव हैं। गुरु-शिष्य परंपरा प्राचीन है। गुरु दक्षिणा शिष्य का कर्तव्य। गुरु पूर्णिमा गुरु को समर्पित। गुरु का सम्मान परम धर्म। सद्गुरु मिलना दुर्लभ है।

सेवा - परोपकार का भाव

सेवा परम धर्म है। निःस्वार्थ सेवा से पुण्य मिलता है। मानव सेवा माधव सेवा है। रोगी, वृद्ध, असहाय की सेवा महान। सेवा से अहंकार नष्ट होता है। कर्म योग में सेवा महत्वपूर्ण। स्वामी विवेकानंद ने सेवा पर बल दिया। सेवा से समाज में प्रेम बढ़ता है।

तीर्थ यात्रा - पवित्र स्थलों की यात्रा

तीर्थ यात्रा पुण्य कार्य है। चार धाम यात्रा सर्वोच्च। बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम चार धाम। काशी, मथुरा, अयोध्या पवित्र नगरियां। गंगा स्नान पापों को धोता है। तीर्थ यात्रा से मन शुद्ध होता है। तीर्थ में साधु-संतों का सत्संग। तीर्थ यात्रा आध्यात्मिक यात्रा है।

व्रत और उपवास - आत्म शुद्धि

व्रत आत्म संयम का साधन है। उपवास से शरीर और मन शुद्ध होता है। एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि प्रमुख व्रत। व्रत में संयम और भक्ति आवश्यक। व्रत से इच्छा शक्ति बढ़ती है। उपवास स्वास्थ्य के लिए लाभदायक। व्रत धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों। व्रत से मनोकामना पूर्ण होती है।

पूजा - भक्ति का माध्यम

पूजा ईश्वर की आराधना है। षोडशोपचार पूजा विधि। गंध, पुष्प, धूप, दीप से पूजा। पूजा से मन एकाग्र होता है। नित्य पूजा घर में शांति लाती है। पूजा भक्ति भाव से करनी चाहिए। मूर्ति पूजा प्रतीक पूजा है। पूजा से ईश्वर से संवाद होता है।

प्रसाद - ईश्वर का आशीर्वाद

प्रसाद ईश्वर को अर्पित भोजन है। प्रसाद ग्रहण करना पवित्र। प्रसाद में ईश्वर का आशीर्वाद। प्रसाद सबको समान रूप से बांटें। प्रसाद से भेदभाव मिटता है। प्रसाद पवित्र और सात्विक होना चाहिए। प्रसाद ग्रहण से पाप नष्ट होते हैं। प्रसाद भक्ति का प्रतीक है।

आरती - प्रकाश की पूजा

आरती दीपक से ईश्वर की पूजा है। आरती पूजा का अंतिम भाग। आरती में घंटी और शंख बजाते हैं। आरती से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। आरती सामूहिक भक्ति का माध्यम। आरती गीत भक्ति रस से भरे। आरती का प्रकाश अज्ञान दूर करता है। आरती मंदिरों में नियमित होती है।

भजन-कीर्तन - भक्ति संगीत

भजन-कीर्तन भक्ति का माध्यम है। संगीत से ईश्वर की स्तुति। भजन मन को शांत करते हैं। कीर्तन सामूहिक गायन है। मीरा, सूरदास के भजन प्रसिद्ध। भजन से भक्ति रस की अनुभूति। कीर्तन में नाचना और गाना। भजन-कीर्तन से आनंद मिलता है।

सत्संग - संतों का साथ

सत्संग संतों और साधुओं का साथ है। सत्संग से ज्ञान मिलता है। बुरी संगति से बचना चाहिए। सत्संग में धर्म चर्चा होती है। सत्संग से मन पवित्र होता है। संत वचन अमृत समान। सत्संग जीवन बदल देता है। नियमित सत्संग आवश्यक है।

स्वाध्याय - आत्म अध्ययन

स्वाध्याय धर्म ग्रंथों का अध्ययन है। नित्य स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है। गीता, रामायण, उपनिषद पढ़ें। स्वाध्याय योग का नियम है। स्वाध्याय से आत्म-चिंतन होता है। स्वाध्याय मन को शांत करता है। स्वाध्याय आध्यात्मिक विकास का साधन। प्रतिदिन कुछ समय स्वाध्याय करें।

जप - मंत्र का जाप

जप मंत्र को बार-बार दोहराना है। माला से जप करते हैं। 108 बार जप एक माला। जप से मन एकाग्र होता है। नाम जप सबसे सरल साधना। राम नाम, हरे कृष्ण जप प्रसिद्ध। जप से मन शुद्ध होता है। नियमित जप से सिद्धि मिलती है।

तीर्थ - पवित्र जल स्रोत

तीर्थ पवित्र नदी या जल स्रोत है। गंगा सबसे पवित्र तीर्थ। यमुना, सरस्वती, गोदावरी पवित्र नदियां। तीर्थ स्नान पापों को धोता है। कुंभ मेला सबसे बड़ा तीर्थ मेला। तीर्थ में स्नान और दान पुण्यदायी। तीर्थ आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र। तीर्थ यात्रा जीवन में एक बार अवश्य।

प्रायश्चित - पाप का प्रायश्चित

प्रायश्चित पाप को धोने की विधि है। पाप करने पर प्रायश्चित आवश्यक। उपवास, दान, जप प्रायश्चित के साधन। प्रायश्चित से मन हल्का होता है। सच्चे मन से प्रायश्चित करें। प्रायश्चित पश्चाताप का प्रतीक। प्रायश्चित से पाप का प्रभाव कम होता है। प्रायश्चित धर्म का महत्वपूर्ण अंग।

श्राद्ध - पितरों का तर्पण

श्राद्ध पितरों को भोजन अर्पित करना है। पितृ पक्ष में श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध से पितर प्रसन्न होते हैं। ब्राह्मण भोजन श्राद्ध का अंग। श्राद्ध पितृ ऋण चुकाना है। श्राद्ध से पितरों को मुक्ति मिलती है। श्राद्ध परंपरा प्राचीन है। श्राद्ध पुत्र का कर्तव्य है।

होम - अग्नि में आहुति

होम यज्ञ का छोटा रूप है। अग्नि में घी और सामग्री की आहुति। होम से वातावरण शुद्ध होता है। होम मंत्रों के साथ करते हैं। होम विशेष अवसरों पर करते हैं। होम से देवता प्रसन्न होते हैं। होम धार्मिक अनुष्ठान है। होम से मनोकामना पूर्ण होती है।

रुद्राभिषेक - शिव की पूजा

रुद्राभिषेक शिवलिंग पर जल चढ़ाना है। दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल से अभिषेक। रुद्राभिषेक सोमवार को विशेष। रुद्राभिषेक से शिव प्रसन्न होते हैं। रुद्राभिषेक में रुद्र मंत्र का जाप। रुद्राभिषेक महाशिवरात्रि पर विशेष। रुद्राभिषेक से मनोकामना पूर्ण होती है। रुद्राभिषेक शिव भक्ति का प्रतीक।

अभिषेक - देवता को स्नान

अभिषेक देवता की मूर्ति को स्नान कराना है। जल, दूध, दही से अभिषेक। अभिषेक पूजा का महत्वपूर्ण अंग। अभिषेक से मूर्ति शुद्ध होती है। अभिषेक भक्ति भाव से करें। अभिषेक विशेष दिनों पर करते हैं। अभिषेक से देवता प्रसन्न होते हैं। अभिषेक मंदिरों में नियमित होता है।

दर्शन - देवता के दर्शन

दर्शन देवता की मूर्ति देखना है। मंदिर जाकर दर्शन करते हैं। दर्शन से मन शांत होता है। दर्शन भक्ति का माध्यम है। सुबह-शाम दर्शन शुभ। दर्शन से आशीर्वाद मिलता है। दर्शन में श्रद्धा आवश्यक। दर्शन से भक्ति भाव जागता है।

परिक्रमा - प्रदक्षिणा

परिक्रमा मंदिर या देवता के चारों ओर घूमना है। दक्षिण दिशा से परिक्रमा शुरू करें। परिक्रमा सम्मान का प्रतीक है। परिक्रमा से पुण्य मिलता है। पर्वत और तीर्थ की भी परिक्रमा। कैलाश परिक्रमा महापुण्य। परिक्रमा भक्ति का अंग है। परिक्रमा में मंत्र जाप करें।

नमस्कार - अभिवादन

नमस्कार हाथ जोड़कर अभिवादन है। नमस्कार सम्मान का प्रतीक। नमस्कार में विनम्रता है। देवता, गुरु, बड़ों को नमस्कार। नमस्कार भारतीय संस्कृति का अंग। नमस्कार से अहंकार नष्ट होता है। नमस्कार आत्मा को आत्मा का अभिवादन। नमस्कार सार्वभौमिक अभिवादन है।

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आध्यात्मिकता

आध्यात्मिक जागरण का मार्ग

आत्मा का स्वरूप

आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। शरीर नश्वर है पर आत्मा शाश्वत। आत्मा न जन्म लेती है न मरती है। आत्मा ब्रह्म का अंश है। "अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूं। आत्मा चेतना का स्रोत है। आत्मा को जानना ही जीवन का उद्देश्य। आत्मा सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है।

माया - भ्रम का जाल

माया संसार का भ्रम है। माया से आत्मा का वास्तविक स्वरूप छिप जाता है। संसार माया का खेल है। माया से मोह और आसक्ति उत्पन्न होती है। ज्ञान से माया का नाश होता है। माया ब्रह्म की शक्ति है। माया से मुक्ति ही मोक्ष है। माया को पहचानना आध्यात्मिक जागरण है।

ब्रह्म - परम सत्य

ब्रह्म परम सत्य है। ब्रह्म निराकार और सर्वव्यापी है। ब्रह्म ही सृष्टि का कारण। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" - सब कुछ ब्रह्म है। ब्रह्म अनंत और असीम है। ब्रह्म को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। ब्रह्म ज्ञान से ही ब्रह्म की प्राप्ति। ब्रह्म आनंद का स्रोत है।

कुंडलिनी जागरण

कुंडलिनी मूलाधार में सुप्त शक्ति है। कुंडलिनी जागरण से आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। सात चक्र कुंडलिनी का मार्ग हैं। कुंडलिनी सहस्रार में पहुंचकर शिव से मिलती है। कुंडलिनी जागरण गुरु के मार्गदर्शन में करें। कुंडलिनी योग उन्नत साधना है। कुंडलिनी जागरण से सिद्धियां मिलती हैं। कुंडलिनी शक्ति का सही उपयोग आवश्यक।

चक्र - ऊर्जा केंद्र

शरीर में सात मुख्य चक्र हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा, सहस्रार। प्रत्येक चक्र विशेष ऊर्जा का केंद्र। चक्र संतुलित होने से स्वास्थ्य अच्छा। ध्यान से चक्र जागृत होते हैं। चक्र रंग और मंत्र से जुड़े हैं। चक्र साधना से आध्यात्मिक उन्नति। सहस्रार चक्र परम चक्र है।

प्राण - जीवन शक्ति

प्राण जीवन शक्ति है। प्राण से शरीर जीवित रहता है। पांच प्राण: प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान। प्राणायाम से प्राण नियंत्रित होता है। प्राण श्वास से जुड़ा है। प्राण ऊर्जा का स्रोत है। प्राण शुद्धि से मन शुद्ध होता है। प्राण साधना योग का अंग है।

नाड़ी - ऊर्जा मार्ग

शरीर में 72,000 नाड़ियां हैं। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना मुख्य नाड़ियां। सुषुम्ना कुंडलिनी का मार्ग है। इड़ा चंद्र नाड़ी, पिंगला सूर्य नाड़ी। नाड़ी शुद्धि प्राणायाम से होती है। नाड़ी शुद्ध होने से प्राण सुचारू बहता है। नाड़ी साधना योग में महत्वपूर्ण। नाड़ी ऊर्जा के वाहक हैं।

साक्षी भाव - द्रष्टा बनना

साक्षी भाव में स्वयं को देखना। विचारों का साक्षी बनें, भागीदार नहीं। साक्षी भाव से मन शांत होता है। साक्षी भाव ध्यान की उन्नत अवस्था। साक्षी भाव में आसक्ति नहीं रहती। साक्षी भाव से आत्म-ज्ञान होता है। साक्षी भाव जीवन में शांति लाता है। साक्षी भाव अद्वैत का अनुभव है।

वैराग्य - विरक्ति

वैराग्य संसार से विरक्ति है। वैराग्य त्याग नहीं, आसक्ति का त्याग है। वैराग्य से मन मुक्त होता है। वैराग्य आध्यात्मिक साधना का आधार। वैराग्य से मोह समाप्त होता है। वैराग्य ज्ञान से आता है। वैराग्य जीवन में संतुलन लाता है। वैराग्य मोक्ष का मार्ग है।

विवेक - सही निर्णय

विवेक सत्य और असत्य में भेद करना है। विवेक से सही मार्ग मिलता है। विवेक बुद्धि का गुण है। विवेक से भ्रम दूर होता है। विवेक ज्ञान का प्रकाश है। विवेक से जीवन में स्पष्टता आती है। विवेक आध्यात्मिक साधना में आवश्यक। विवेक से मुक्ति मिलती है।

मुमुक्षा - मोक्ष की इच्छा

मुमुक्षा मोक्ष की तीव्र इच्छा है। मुमुक्षा से साधना में गति आती है। मुमुक्षा आध्यात्मिक जिज्ञासा है। मुमुक्षा बिना मोक्ष नहीं मिलता। मुमुक्षा संसार से विरक्ति लाती है। मुमुक्षा साधक का लक्षण है। मुमुक्षा से साधना में दृढ़ता आती है। मुमुक्षा मोक्ष का प्रथम चरण है।

शम - मन का नियंत्रण

शम मन को शांत करना है। शम से मन स्थिर होता है। शम साधना का साधन है। शम से विचार नियंत्रित होते हैं। शम आंतरिक शांति लाता है। शम ध्यान के लिए आवश्यक। शम से मन की चंचलता दूर होती है। शम आत्म-नियंत्रण का गुण है।

दम - इंद्रिय नियंत्रण

दम इंद्रियों पर नियंत्रण है। दम से विषयों से विरक्ति आती है। दम साधना का महत्वपूर्ण अंग। दम से मन शुद्ध होता है। दम आत्म-संयम का गुण है। दम से इच्छाएं नियंत्रित होती हैं। दम ब्रह्मचर्य का आधार है। दम से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है।

उपरति - विषयों से विरक्ति

उपरति विषय भोगों से विरक्ति है। उपरति से मन शांत होता है। उपरति आंतरिक संतोष लाती है। उपरति साधना में सहायक। उपरति से आसक्ति समाप्त होती है। उपरति वैराग्य का फल है। उपरति से मन स्थिर होता है। उपरति मोक्ष का मार्ग है।

तितिक्षा - सहनशीलता

तितिक्षा सुख-दुःख को समान भाव से सहना है। तितिक्षा से मन मजबूत होता है। तितिक्षा साधना में आवश्यक। तितिक्षा से विचलित नहीं होते। तितिक्षा धैर्य का गुण है। तितिक्षा से मन संतुलित रहता है। तितिक्षा आध्यात्मिक परिपक्वता है। तितिक्षा से साधना में स्थिरता आती है।

श्रद्धा - गुरु और शास्त्र में विश्वास

श्रद्धा गुरु और शास्त्र में दृढ़ विश्वास है। श्रद्धा बिना ज्ञान नहीं मिलता। श्रद्धा साधना का आधार है। श्रद्धा से संदेह दूर होते हैं। श्रद्धा हृदय का गुण है। श्रद्धा से गुरु कृपा मिलती है। श्रद्धा आध्यात्मिक प्रगति में सहायक। श्रद्धा से असंभव भी संभव हो जाता है।

समाधान - एकाग्रता

समाधान मन की एकाग्रता है। समाधान से ध्यान गहरा होता है। समाधान साधना में आवश्यक। समाधान से विचार स्थिर होते हैं। समाधान आंतरिक शांति लाता है। समाधान से लक्ष्य प्राप्ति होती है। समाधान मन की दृढ़ता है। समाधान से समाधि की ओर बढ़ते हैं।

अद्वैत - अद्वैत दर्शन

अद्वैत में केवल ब्रह्म ही सत्य है। द्वैत भ्रम है, अद्वैत सत्य। "एकमेवाद्वितीयम्" - एक ही है, दूसरा नहीं। आत्मा और ब्रह्म एक हैं। अद्वैत वेदांत का सार है। शंकराचार्य अद्वैत के प्रवर्तक। अद्वैत अनुभव से जाना जाता है। अद्वैत परम ज्ञान है।

द्वैत - द्वैत दर्शन

द्वैत में जीव और ब्रह्म भिन्न हैं। द्वैत भक्ति का आधार है। माधवाचार्य द्वैत के प्रवर्तक। द्वैत में भक्त और भगवान का संबंध। द्वैत सरल और सुगम मार्ग। द्वैत में प्रेम और भक्ति महत्वपूर्ण। द्वैत दर्शन लोकप्रिय है। द्वैत से भक्ति रस की अनुभूति।

विशिष्टाद्वैत - विशिष्ट अद्वैत

विशिष्टाद्वैत रामानुज का दर्शन है। ब्रह्म विशेषताओं सहित है। जीव ब्रह्म का अंश है पर भिन्न भी। विशिष्टाद्वैत भक्ति और ज्ञान का समन्वय। विशिष्टाद्वैत में भगवान सगुण हैं। विशिष्टाद्वैत मध्यम मार्ग है। विशिष्टाद्वैत वैष्णव परंपरा का आधार। विशिष्टाद्वैत संतुलित दर्शन है।

सत्-चित्-आनंद - ब्रह्म का स्वरूप

ब्रह्म सत्-चित्-आनंद स्वरूप है। सत् - सत्य और अस्तित्व। चित् - चेतना और ज्ञान। आनंद - परम आनंद। सत्-चित्-आनंद ब्रह्म की परिभाषा। आत्मा भी सत्-चित्-आनंद स्वरूप। सत्-चित्-आनंद की अनुभूति मोक्ष है। सत्-चित्-आनंद परम लक्ष्य है।

तुरीय - चौथी अवस्था

तुरीय चेतना की चौथी अवस्था है। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति के बाद तुरीय। तुरीय में शुद्ध चेतना का अनुभव। तुरीय समाधि की अवस्था है। तुरीय में द्वैत नहीं रहता। तुरीय ब्रह्म की अनुभूति है। तुरीय परम शांति की अवस्था। तुरीय मोक्ष का अनुभव है।

निर्विकल्प समाधि - परम समाधि

निर्विकल्प समाधि में विचार नहीं रहते। निर्विकल्प समाधि परम अवस्था है। निर्विकल्प समाधि में आत्मा-ब्रह्म एक हो जाते हैं। निर्विकल्प समाधि अद्वैत का अनुभव। निर्विकल्प समाधि दुर्लभ है। निर्विकल्प समाधि से मोक्ष मिलता है। निर्विकल्प समाधि परम आनंद है। निर्विकल्प समाधि योग का लक्ष्य है।

सविकल्प समाधि - विचार सहित समाधि

सविकल्प समाधि में सूक्ष्म विचार रहते हैं। सविकल्प समाधि निर्विकल्प से पहले की अवस्था। सविकल्प समाधि में द्वैत का अनुभव। सविकल्प समाधि साधना की उन्नत अवस्था। सविकल्प समाधि से आध्यात्मिक अनुभव। सविकल्प समाधि में देवता के दर्शन। सविकल्प समाधि से निर्विकल्प की ओर बढ़ते हैं। सविकल्प समाधि साधना का चरण है।

जीवन मुक्ति - जीवित रहते मुक्ति

जीवन मुक्ति जीवित रहते मोक्ष है। जीवन मुक्त संसार में रहकर भी मुक्त। जीवन मुक्त को संसार बंधन नहीं। जीवन मुक्त ब्रह्म ज्ञानी होता है। जीवन मुक्त कर्म करता है पर आसक्त नहीं। जीवन मुक्त परम शांति में रहता है। जीवन मुक्ति साधना का फल है। जीवन मुक्त महान आत्मा होता है।

विदेह मुक्ति - शरीर त्याग के बाद मुक्ति

विदेह मुक्ति शरीर छोड़ने के बाद मोक्ष है। विदेह मुक्ति में पुनर्जन्म नहीं होता। विदेह मुक्ति में आत्मा ब्रह्म में विलीन हो जाती है। विदेह मुक्ति परम लक्ष्य है। विदेह मुक्ति से जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त। विदेह मुक्ति परम शांति है। विदेह मुक्ति मोक्ष का अंतिम चरण। विदेह मुक्ति सभी बंधनों से मुक्ति है।

सिद्धि - आध्यात्मिक शक्तियां

सिद्धि साधना से प्राप्त शक्तियां हैं। अष्ट सिद्धियां: अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व। सिद्धियां साधना का उपोत्पाद हैं, लक्ष्य नहीं। सिद्धियों में फंसना खतरनाक। सिद्धियां अहंकार बढ़ा सकती हैं। सिद्धियों का सदुपयोग करें। सिद्धियां मोक्ष में बाधा बन सकती हैं। सिद्धियों से परे जाना आवश्यक।

कैवल्य - परम एकाकीपन

कैवल्य आत्मा की स्वतंत्र अवस्था है। कैवल्य में आत्मा प्रकृति से मुक्त। कैवल्य योग का परम लक्ष्य। कैवल्य में केवल आत्मा शेष रहती है। कैवल्य परम शांति की अवस्था। कैवल्य मोक्ष का पर्याय है। कैवल्य में द्वंद्व नहीं रहता। कैवल्य परम स्वतंत्रता है।

निर्वाण - बुद्ध का मोक्ष

निर्वाण बौद्ध धर्म में मोक्ष है। निर्वाण दुःख का अंत है। निर्वाण में तृष्णा का नाश होता है। निर्वाण शांति की परम अवस्था। निर्वाण अष्टांग मार्ग से मिलता है। निर्वाण में पुनर्जन्म नहीं होता। निर्वाण परम लक्ष्य है। निर्वाण अनुभव से जाना जाता है।

शून्य - बौद्ध दर्शन

शून्य सब कुछ का अभाव है। शून्य परम सत्य है। शून्य में कोई स्थायी तत्व नहीं। शून्य अनित्यता का बोध है। शून्य माध्यमिक दर्शन का केंद्र। शून्य निर्वाण का मार्ग है। शून्य को समझना कठिन है। शून्य परम ज्ञान है।

अनात्मा - आत्मा का अभाव

अनात्मा बौद्ध सिद्धांत है। अनात्मा में स्थायी आत्मा नहीं है। सब कुछ परिवर्तनशील है। अनात्मा अहंकार का नाश करता है। अनात्मा से आसक्ति दूर होती है। अनात्मा निर्वाण का मार्ग है। अनात्मा गहन दर्शन है। अनात्मा बुद्ध का उपदेश है।

अनित्य - सब कुछ नश्वर

अनित्य का अर्थ है सब कुछ परिवर्तनशील। कोई भी चीज स्थायी नहीं है। अनित्य बोध से आसक्ति दूर होती है। अनित्य बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत। अनित्य को समझना ज्ञान है। अनित्य से वैराग्य आता है। अनित्य जीवन का सत्य है। अनित्य बोध से दुःख कम होता है।

दुःख - जीवन का सत्य

दुःख जीवन का प्रथम आर्य सत्य है। जन्म, जरा, मरण सब दुःख हैं। दुःख से मुक्ति ही निर्वाण है। दुःख का कारण तृष्णा है। दुःख को समझना आवश्यक है। दुःख से भागना नहीं, समझना है। दुःख बोध से करुणा जागती है। दुःख को स्वीकारना ज्ञान है।

तृष्णा - दुःख का कारण

तृष्णा दुःख का मूल कारण है। तृष्णा इच्छा और लालसा है। तृष्णा से आसक्ति उत्पन्न होती है। तृष्णा का नाश निर्वाण का मार्ग। तृष्णा तीन प्रकार की: काम, भव, विभव। तृष्णा से बंधन होता है। तृष्णा को समाप्त करना साधना है। तृष्णा रहित जीवन शांत है।

करुणा - सार्वभौमिक दया

करुणा सभी प्राणियों के प्रति दया है। करुणा बुद्ध का मूल उपदेश। करुणा से हृदय शुद्ध होता है। करुणा बोधिसत्व का गुण है। करुणा से प्रेम फैलता है। करुणा आध्यात्मिक गुण है। करुणा से दुःख कम होता है। करुणा निर्वाण का मार्ग है।

मैत्री - सार्वभौमिक मित्रता

मैत्री सभी के प्रति मित्रता भाव है। मैत्री से घृणा दूर होती है। मैत्री बौद्ध धर्म का मूल भाव। मैत्री से शांति फैलती है। मैत्री ध्यान में महत्वपूर्ण। मैत्री से मन प्रसन्न रहता है। मैत्री सार्वभौमिक प्रेम है। मैत्री से समाज में सद्भाव बढ़ता है।

मुदिता - दूसरों के सुख में प्रसन्नता

मुदिता दूसरों की खुशी में खुश होना है। मुदिता से ईर्ष्या दूर होती है। मुदिता उदार हृदय का गुण। मुदिता बौद्ध ध्यान का अंग। मुदिता से मन प्रसन्न रहता है। मुदिता सकारात्मक भाव है। मुदिता से संबंध मधुर होते हैं। मुदिता आध्यात्मिक गुण है।

उपेक्षा - समभाव

उपेक्षा सुख-दुःख में समान भाव है। उपेक्षा से मन संतुलित रहता है। उपेक्षा आध्यात्मिक परिपक्वता है। उपेक्षा बौद्ध ध्यान का चौथा भाव। उपेक्षा से विचलित नहीं होते। उपेक्षा शांति का स्रोत है। उपेक्षा से आसक्ति दूर होती है। उपेक्षा निर्वाण का मार्ग है।

विपश्यना - अंतर्दृष्टि ध्यान

विपश्यना बुद्ध की ध्यान विधि है। विपश्यना में श्वास का निरीक्षण। विपश्यना से आत्म-ज्ञान होता है। विपश्यना अनित्य का बोध कराती है। विपश्यना से मन शांत होता है। विपश्यना निर्वाण का मार्ग है। विपश्यना वैज्ञानिक विधि है। विपश्यना विश्वभर में लोकप्रिय है।

सम्यक दृष्टि - सही दृष्टिकोण

सम्यक दृष्टि अष्टांग मार्ग का प्रथम अंग है। सम्यक दृष्टि चार आर्य सत्यों को समझना है। सम्यक दृष्टि से भ्रम दूर होता है। सम्यक दृष्टि सही ज्ञान है। सम्यक दृष्टि से मार्ग स्पष्ट होता है। सम्यक दृष्टि निर्वाण का आधार। सम्यक दृष्टि से जीवन बदलता है। सम्यक दृष्टि बुद्ध का उपदेश है।

सम्यक संकल्प - सही इरादा

सम्यक संकल्प सही विचार और इरादा है। सम्यक संकल्प अष्टांग मार्ग का दूसरा अंग। सम्यक संकल्प में त्याग, अहिंसा, करुणा। सम्यक संकल्प से कर्म शुद्ध होते हैं। सम्यक संकल्प मन की दिशा तय करता है। सम्यक संकल्प से जीवन में स्पष्टता। सम्यक संकल्प निर्वाण का मार्ग। सम्यक संकल्प आध्यात्मिक दृढ़ता है।

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योग सूत्र

पतंजलि के योग सूत्र

पतंजलि योग सूत्र

महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र की रचना की। योग सूत्र में 196 सूत्र हैं। योग सूत्र योग का मूल ग्रंथ है। "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" - योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है। योग सूत्र चार पाद में विभाजित: समाधि, साधना, विभूति, कैवल्य। योग सूत्र आध्यात्मिक विज्ञान है। योग सूत्र सार्वभौमिक मार्गदर्शक है।

चित्त वृत्ति निरोध

चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है। पांच वृत्तियां: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति। वृत्तियां क्लिष्ट या अक्लिष्ट होती हैं। वृत्ति निरोध से मन शांत होता है। वृत्ति निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है। वृत्ति निरोध योग का लक्ष्य है। वृत्ति निरोध से आत्मा अपने स्वरूप में स्थित होती है।

अभ्यास - निरंतर प्रयास

अभ्यास योग साधना का आधार है। अभ्यास दीर्घकाल तक निरंतर करना चाहिए। अभ्यास श्रद्धा और उत्साह से करें। अभ्यास से मन स्थिर होता है। अभ्यास बिना सिद्धि नहीं मिलती। अभ्यास धैर्य मांगता है। अभ्यास से असंभव भी संभव हो जाता है। अभ्यास योग का प्रथम सूत्र है।

वैराग्य - आसक्ति का त्याग

वैराग्य विषयों से विरक्ति है। वैराग्य अभ्यास का साथी है। वैराग्य दो प्रकार का: अपर और पर। अपर वैराग्य दृश्य विषयों से विरक्ति। पर वैराग्य गुणों से भी विरक्ति। वैराग्य से मन मुक्त होता है। वैराग्य आध्यात्मिक परिपक्वता है। वैराग्य योग में आवश्यक है।

ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर को समर्पण

ईश्वर प्रणिधान सब कुछ ईश्वर को समर्पित करना है। ईश्वर प्रणिधान से अहंकार नष्ट होता है। ईश्वर प्रणिधान भक्ति योग है। ईश्वर प्रणिधान से समाधि मिलती है। ईश्वर प्रणिधान नियम का अंग है। ईश्वर प्रणिधान से कृपा मिलती है। ईश्वर प्रणिधान सरल मार्ग है। ईश्वर प्रणिधान से शांति मिलती है।

अहिंसा - प्रथम यम

अहिंसा मन, वचन, कर्म से किसी को दुःख न देना। अहिंसा सभी यमों का आधार है। अहिंसा में करुणा और प्रेम निहित है। अहिंसा से शत्रुता समाप्त होती है। अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा से मन शुद्ध होता है। अहिंसा महावीर और बुद्ध का उपदेश। अहिंसा योग की नींव है।

सत्य - दूसरा यम

सत्य मन, वचन, कर्म में सत्यता है। सत्य बोलना पर हितकारी होना चाहिए। सत्य से विश्वास बनता है। सत्य आत्मा का स्वभाव है। सत्य में साहस चाहिए। सत्य से शक्ति मिलती है। सत्य परम तप है। सत्य योग का मूल है।

अस्तेय - तीसरा यम

अस्तेय चोरी न करना है। अस्तेय मन से भी लालच न करना। अस्तेय से संतोष आता है। अस्तेय में ईमानदारी निहित है। अस्तेय से विश्वास बढ़ता है। अस्तेय आत्म-सम्मान का गुण। अस्तेय से मन शुद्ध होता है। अस्तेय योग का महत्वपूर्ण अंग है।

ब्रह्मचर्य - चौथा यम

ब्रह्मचर्य इंद्रिय संयम है। ब्रह्मचर्य ऊर्जा का संरक्षण है। ब्रह्मचर्य मन, वचन, कर्म में पवित्रता। ब्रह्मचर्य से तेज बढ़ता है। ब्रह्मचर्य आध्यात्मिक शक्ति देता है। ब्रह्मचर्य संयम का गुण है। ब्रह्मचर्य से मन एकाग्र होता है। ब्रह्मचर्य योग साधना में आवश्यक।

अपरिग्रह - पांचवां यम

अपरिग्रह आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना। अपरिग्रह से मन हल्का रहता है। अपरिग्रह संतोष का मार्ग है। अपरिग्रह से लोभ दूर होता है। अपरिग्रह सरल जीवन है। अपरिग्रह से मन मुक्त होता है। अपरिग्रह आध्यात्मिक गुण है। अपरिग्रह योग का अंतिम यम है।

शौच - प्रथम नियम

शौच बाहरी और आंतरिक शुद्धि है। बाहरी शौच शरीर की स्वच्छता। आंतरिक शौच मन की पवित्रता। शौच से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। शौच से मन प्रसन्न रहता है। शौच योग साधना का आधार। शौच से आत्मा शुद्ध होती है। शौच पवित्रता का प्रतीक है।

संतोष - दूसरा नियम

संतोष जो है उसमें प्रसन्न रहना। संतोष से परम सुख मिलता है। संतोष लालच को दूर करता है। संतोष मन की शांति है। संतोष से तनाव नहीं रहता। संतोष आध्यात्मिक धन है। संतोष से जीवन सरल होता है। संतोष योग का महत्वपूर्ण नियम है।

तप - तीसरा नियम

तप कठिनाइयों को सहना है। तप से इच्छाशक्ति मजबूत होती है। तप शरीर और मन का अनुशासन। तप से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है। तप त्याग और संयम है। तप से शुद्धि होती है। तप योग साधना का अंग। तप से लक्ष्य प्राप्ति होती है।

स्वाध्याय - चौथा नियम

स्वाध्याय आत्म-अध्ययन है। स्वाध्याय में शास्त्र पठन और मनन। स्वाध्याय से आत्म-ज्ञान होता है। स्वाध्याय आत्म-निरीक्षण है। स्वाध्याय से बुद्धि विकसित होती है। स्वाध्याय आध्यात्मिक विकास का साधन। स्वाध्याय से ज्ञान बढ़ता है। स्वाध्याय योग का महत्वपूर्ण नियम है।

आसन - तीसरा अंग

आसन स्थिर और सुखपूर्वक बैठना है। आसन से शरीर स्वस्थ रहता है। आसन ध्यान के लिए आवश्यक। आसन से प्राण नियंत्रित होता है। आसन अनेक प्रकार के हैं। आसन नियमित अभ्यास से सिद्ध होते हैं। आसन योग का शारीरिक अंग। आसन से मन भी स्थिर होता है।

प्राणायाम - चौथा अंग

प्राणायाम प्राण का नियमन है। प्राणायाम में पूरक, कुम्भक, रेचक। प्राणायाम से प्राण शुद्ध होता है। प्राणायाम से मन एकाग्र होता है। प्राणायाम अनेक प्रकार के हैं। प्राणायाम से स्वास्थ्य लाभ होता है। प्राणायाम ध्यान की तैयारी है। प्राणायाम योग का महत्वपूर्ण अंग है।

प्रत्याहार - पांचवां अंग

प्रत्याहार इंद्रियों को विषयों से हटाना है। प्रत्याहार से मन अंतर्मुखी होता है। प्रत्याहार इंद्रिय नियंत्रण है। प्रत्याहार से मन शांत होता है। प्रत्याहार ध्यान का आधार है। प्रत्याहार से विषयों से विरक्ति आती है। प्रत्याहार आंतरिक यात्रा की शुरुआत। प्रत्याहार योग का महत्वपूर्ण मोड़ है।

धारणा - छठा अंग

धारणा मन को एक स्थान पर स्थिर करना है। धारणा एकाग्रता का अभ्यास है। धारणा किसी बिंदु, मंत्र या देवता पर हो सकती है। धारणा से मन की चंचलता दूर होती है। धारणा ध्यान की तैयारी है। धारणा से मन शक्तिशाली होता है। धारणा आंतरिक अंग है। धारणा से ध्यान की ओर बढ़ते हैं।

ध्यान - सातवां अंग

ध्यान में मन निरंतर एक विषय पर केंद्रित रहता है। ध्यान धारणा का विस्तार है। ध्यान में विचारों की धारा एक दिशा में बहती है। ध्यान से मन शांत और स्थिर होता है। ध्यान आत्म-साक्षात्कार का मार्ग। ध्यान से आंतरिक शांति मिलती है। ध्यान समाधि की तैयारी है। ध्यान योग का सातवां अंग है।

समाधि - आठवां अंग

समाधि योग का अंतिम लक्ष्य है। समाधि में ध्याता, ध्यान और ध्येय एक हो जाते हैं। समाधि में आत्मा का साक्षात्कार होता है। समाधि परम आनंद की अवस्था। समाधि दो प्रकार की: सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। समाधि से मोक्ष मिलता है। समाधि योग की चरम अवस्था। समाधि अनुभव से जानी जाती है।

सम्प्रज्ञात समाधि

सम्प्रज्ञात समाधि में विषय का ज्ञान रहता है। सम्प्रज्ञात समाधि चार प्रकार की: वितर्क, विचार, आनंद, अस्मिता। सम्प्रज्ञात समाधि में बीज रहता है। सम्प्रज्ञात समाधि असम्प्रज्ञात की तैयारी। सम्प्रज्ञात समाधि में सिद्धियां मिलती हैं। सम्प्रज्ञात समाधि साधना का चरण। सम्प्रज्ञात समाधि से ज्ञान बढ़ता है।

असम्प्रज्ञात समाधि

असम्प्रज्ञात समाधि निर्बीज समाधि है। असम्प्रज्ञात समाधि में सभी वृत्तियां रुक जाती हैं। असम्प्रज्ञात समाधि परम अवस्था है। असम्प्रज्ञात समाधि में केवल संस्कार शेष रहते हैं। असम्प्रज्ञात समाधि से कैवल्य मिलता है। असम्प्रज्ञात समाधि योग का लक्ष्य। असम्प्रज्ञात समाधि दुर्लभ है।

क्लेश - पांच कष्ट

पांच क्लेश: अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश। क्लेश दुःख के कारण हैं। अविद्या सभी क्लेशों का मूल। क्लेश से कर्म बंधन होता है। क्लेश से जन्म-मृत्यु का चक्र चलता है। योग से क्लेश नष्ट होते हैं। क्लेश निरोध मोक्ष का मार्ग। क्लेश को समझना आवश्यक है।

अविद्या - मूल क्लेश

अविद्या अज्ञान है। अविद्या सत्य को न जानना है। अविद्या से अन्य क्लेश उत्पन्न होते हैं। अविद्या नित्य को अनित्य समझना। अविद्या शुद्ध को अशुद्ध समझना। अविद्या आत्मा को शरीर समझना। विद्या से अविद्या नष्ट होती है। अविद्या माया का रूप है।

अस्मिता - अहंकार

अस्मिता अहंकार है। अस्मिता "मैं" का भाव है। अस्मिता से अलगाव की भावना। अस्मिता द्वैत का कारण। अस्मिता से राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं। अस्मिता बंधन का कारण। योग से अस्मिता नष्ट होती है। अस्मिता निरोध से एकत्व का अनुभव।

राग - आसक्ति

राग सुख में आसक्ति है। राग से बंधन होता है। राग इच्छा का रूप है। राग से दुःख उत्पन्न होता है। राग मन को अशांत करता है। राग से मोह बढ़ता है। वैराग्य से राग नष्ट होता है। राग निरोध मुक्ति का मार्ग।

द्वेष - घृणा

द्वेष दुःख से घृणा है। द्वेष से शत्रुता उत्पन्न होती है। द्वेष मन को विषाक्त करता है। द्वेष से हिंसा होती है। द्वेष राग का विपरीत पर समान रूप से बंधनकारी। द्वेष से मन अशांत रहता है। प्रेम से द्वेष नष्ट होता है। द्वेष निरोध शांति का मार्ग।

अभिनिवेश - मृत्यु का भय

अभिनिवेश जीवन से चिपकना है। अभिनिवेश मृत्यु का भय है। अभिनिवेश सभी में स्वाभाविक रूप से है। अभिनिवेश अज्ञान से उत्पन्न होता है। अभिनिवेश से जीवन में भय रहता है। आत्म-ज्ञान से अभिनिवेश नष्ट होता है। अभिनिवेश निरोध से निर्भयता आती है। अभिनिवेश अंतिम क्लेश है।

कर्म और संस्कार

कर्म से संस्कार बनते हैं। संस्कार मन में छाप छोड़ते हैं। संस्कार भविष्य के कर्मों को प्रभावित करते हैं। संस्कार जन्म-जन्मांतर तक रहते हैं। शुभ संस्कार मोक्ष में सहायक। अशुभ संस्कार बंधन का कारण। योग से संस्कार शुद्ध होते हैं। संस्कार निरोध मुक्ति का मार्ग।

विभूति - सिद्धियां

विभूति योग सूत्र का तीसरा पाद है। विभूति में सिद्धियों का वर्णन। संयम से विभूतियां प्राप्त होती हैं। संयम धारणा, ध्यान और समाधि का संयोग। विभूतियां अनेक प्रकार की हैं। विभूतियां साधना का उपोत्पाद। विभूतियों में फंसना खतरनाक। विभूतियों से परे जाना आवश्यक।

अणिमा सिद्धि

अणिमा शरीर को अत्यंत सूक्ष्म बनाना है। अणिमा से अणु जितना छोटा हो सकते हैं। अणिमा अष्ट सिद्धियों में प्रथम। अणिमा संयम से प्राप्त होती है। अणिमा भौतिक नियमों से परे है। अणिमा योग की शक्ति का प्रमाण। अणिमा साधना का फल है। अणिमा लक्ष्य नहीं, मार्ग में मिलती है।

महिमा सिद्धि

महिमा शरीर को विशाल बनाना है। महिमा से असीम रूप से बड़े हो सकते हैं। महिमा अणिमा का विपरीत। महिमा संयम से प्राप्त होती है। महिमा अष्ट सिद्धियों में द्वितीय। महिमा योग शक्ति का प्रदर्शन। महिमा साधना का उपोत्पाद। महिमा में अहंकार का खतरा।

लघिमा सिद्धि

लघिमा शरीर को अत्यंत हल्का बनाना है। लघिमा से पंख की तरह हल्के हो सकते हैं। लघिमा से आकाश में उड़ सकते हैं। लघिमा संयम से प्राप्त होती है। लघिमा अष्ट सिद्धियों में तृतीय। लघिमा योग की अद्भुत शक्ति। लघिमा साधना का फल है। लघिमा लक्ष्य नहीं, साधन है।

गरिमा सिद्धि

गरिमा शरीर को अत्यंत भारी बनाना है। गरिमा से पर्वत जितने भारी हो सकते हैं। गरिमा लघिमा का विपरीत। गरिमा संयम से प्राप्त होती है। गरिमा अष्ट सिद्धियों में चतुर्थ। गरिमा योग शक्ति का प्रमाण। गरिमा साधना का उपोत्पाद। गरिमा से परे जाना आवश्यक।

प्राप्ति सिद्धि

प्राप्ति दूर की वस्तु को प्राप्त करना है। प्राप्ति से कहीं भी पहुंच सकते हैं। प्राप्ति स्थान की सीमा से परे है। प्राप्ति संयम से प्राप्त होती है। प्राप्ति अष्ट सिद्धियों में पांचवीं। प्राप्ति योग की अद्भुत शक्ति। प्राप्ति साधना का फल है। प्राप्ति में आसक्ति खतरनाक।

प्राकाम्य सिद्धि

प्राकाम्य इच्छा पूर्ति की शक्ति है। प्राकाम्य से जो चाहें वह हो सकता है। प्राकाम्य संकल्प शक्ति है। प्राकाम्य संयम से प्राप्त होती है। प्राकाम्य अष्ट सिद्धियों में छठी। प्राकाम्य योग की महान शक्ति। प्राकाम्य साधना का उपोत्पाद। प्राकाम्य का सदुपयोग आवश्यक।

ईशित्व सिद्धि

ईशित्व प्रकृति पर नियंत्रण है। ईशित्व से सृष्टि को नियंत्रित कर सकते हैं। ईशित्व ईश्वर जैसी शक्ति है। ईशित्व संयम से प्राप्त होती है। ईशित्व अष्ट सिद्धियों में सातवीं। ईशित्व योग की परम शक्ति। ईशित्व साधना का फल है। ईशित्व में अहंकार का खतरा।

वशित्व सिद्धि

वशित्व सभी को वश में करने की शक्ति है। वशित्व से तत्वों पर नियंत्रण। वशित्व परम नियंत्रण है। वशित्व संयम से प्राप्त होती है। वशित्व अष्ट सिद्धियों में अंतिम। वशित्व योग की चरम शक्ति। वशित्व साधना का उपोत्पाद। वशित्व से परे जाना मोक्ष है।

कैवल्य - परम मुक्ति

कैवल्य योग सूत्र का चौथा पाद है। कैवल्य परम स्वतंत्रता है। कैवल्य में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित होती है। कैवल्य प्रकृति से पूर्ण विलगाव। कैवल्य योग का अंतिम लक्ष्य। कैवल्य में द्वंद्व नहीं रहता। कैवल्य परम शांति है। कैवल्य मोक्ष का पर्याय है।

गुण - प्रकृति के तीन गुण

तीन गुण: सत्व, रजस, तमस। गुण प्रकृति के मूल तत्व हैं। सत्व शुद्धता और प्रकाश। रजस गति और क्रिया। तमस जड़ता और अंधकार। गुण सदा परिवर्तनशील हैं। गुणों का संतुलन प्रकृति की अवस्था। गुणातीत होना मुक्ति है। गुणों को समझना योग में आवश्यक।

पुरुष और प्रकृति

पुरुष चेतना है, प्रकृति जड़ है। पुरुष द्रष्टा है, प्रकृति दृश्य। पुरुष अपरिवर्तनशील, प्रकृति परिवर्तनशील। पुरुष और प्रकृति का संयोग सृष्टि का कारण। पुरुष और प्रकृति का विवेक ज्ञान है। पुरुष और प्रकृति का पृथक्करण मुक्ति। यह द्वैत योग दर्शन का आधार। पुरुष-प्रकृति विवेक कैवल्य का मार्ग।

विवेक ख्याति - विवेक ज्ञान

विवेक ख्याति पुरुष और प्रकृति का भेद ज्ञान है। विवेक ख्याति से भ्रम दूर होता है। विवेक ख्याति योग का सार है। विवेक ख्याति से मुक्ति मिलती है। विवेक ख्याति अभ्यास से आती है। विवेक ख्याति परम ज्ञान है। विवेक ख्याति कैवल्य का मार्ग। विवेक ख्याति योग का लक्ष्य है।

🙏

भक्ति मार्ग

प्रेम और समर्पण का मार्ग

भक्ति योग का सार

भक्ति योग प्रेम का मार्ग है। भक्ति में हृदय की शुद्धता आवश्यक है। भक्ति सबसे सरल मार्ग है। भक्ति में बुद्धि से अधिक भावना महत्वपूर्ण। भक्ति सभी के लिए सुलभ है। भक्ति में जाति-पाति का भेद नहीं। भक्ति से भगवान शीघ्र मिलते हैं। भक्ति कलियुग का सर्वोत्तम साधन है।

श्रवण - प्रथम भक्ति

श्रवण भगवान की कथा सुनना है। श्रवण से मन पवित्र होता है। श्रवण श्रद्धा से करना चाहिए। श्रवण से भक्ति जागृत होती है। परीक्षित ने श्रवण से मुक्ति पाई। श्रवण सबसे सरल भक्ति है। श्रवण से ज्ञान और भक्ति दोनों मिलते हैं। श्रवण नवधा भक्ति का प्रथम अंग है।

कीर्तन - दूसरी भक्ति

कीर्तन भगवान के नाम और गुणों का गान है। कीर्तन से मन प्रसन्न होता है। कीर्तन सामूहिक रूप से अधिक प्रभावी। कीर्तन से वातावरण पवित्र होता है। नारद मुनि कीर्तन के आचार्य हैं। कीर्तन में नाच-गाना स्वाभाविक है। कीर्तन से भक्ति रस बहता है। कीर्तन आनंद का स्रोत है।

स्मरण - तीसरी भक्ति

स्मरण भगवान को निरंतर याद करना है। स्मरण हर समय हर जगह हो सकता है। स्मरण से मन भगवान में लीन रहता है। स्मरण सबसे गहरी भक्ति है। ध्रुव ने स्मरण से भगवान पाए। स्मरण से संसार भूल जाता है। स्मरण में भगवान का रूप, नाम, लीला सब आते हैं। स्मरण भक्ति का हृदय है।

पादसेवन - चौथी भक्ति

पादसेवन भगवान के चरणों की सेवा है। पादसेवन में विनम्रता निहित है। पादसेवन से अहंकार नष्ट होता है। पादसेवन समर्पण का प्रतीक है। लक्ष्मी जी सदा पादसेवन में रहती हैं। पादसेवन से भगवान प्रसन्न होते हैं। पादसेवन भक्ति का मधुर रूप। पादसेवन में प्रेम और सेवा दोनों हैं।

अर्चन - पांचवीं भक्ति

अर्चन भगवान की पूजा-अर्चना है। अर्चन में षोडशोपचार पूजा होती है। अर्चन से मन एकाग्र होता है। अर्चन में भाव महत्वपूर्ण है। अर्चन नियमित करना चाहिए। अर्चन से घर पवित्र होता है। अर्चन भक्ति का बाहरी रूप। अर्चन से आंतरिक भक्ति जागती है।

वंदन - छठी भक्ति

वंदन भगवान को प्रणाम करना है। वंदन में विनय और श्रद्धा होती है। वंदन से अहंकार दूर होता है। वंदन मन, वचन, कर्म से होना चाहिए। वंदन भगवान की महिमा स्वीकारना है। वंदन से भगवान की कृपा मिलती है। वंदन भक्ति का सुंदर अंग। वंदन में समर्पण भाव है।

दास्य - सातवीं भक्ति

दास्य भगवान का दास बनना है। दास्य में अपने को भगवान का सेवक मानना। दास्य भाव से सेवा करना। हनुमान जी दास्य भक्ति के आदर्श। दास्य में पूर्ण समर्पण होता है। दास्य से अहंकार नष्ट होता है। दास्य भक्ति का गहरा रूप। दास्य में प्रेम और सेवा का मेल।

सख्य - आठवीं भक्ति

सख्य भगवान को मित्र मानना है। सख्य में समानता का भाव होता है। सख्य भक्ति में निडरता है। अर्जुन और सुदामा सख्य भक्ति के उदाहरण। सख्य में प्रेम और विश्वास होता है। सख्य भक्ति मधुर है। सख्य में भगवान निकट लगते हैं। सख्य भक्ति का अनोखा रूप है।

आत्मनिवेदन - नवीं भक्ति

आत्मनिवेदन पूर्ण समर्पण है। आत्मनिवेदन में अपना कुछ नहीं रहता। आत्मनिवेदन सर्वोच्च भक्ति है। आत्मनिवेदन में भगवान ही सब कुछ हैं। आत्मनिवेदन से भगवान तुरंत मिलते हैं। आत्मनिवेदन में भय नहीं रहता। आत्मनिवेदन परम शरणागति है। आत्मनिवेदन भक्ति का चरम रूप।

शरणागति - पूर्ण समर्पण

शरणागति भगवान की शरण में जाना है। शरणागति में सब कुछ भगवान को सौंप देना। शरणागति से भगवान की जिम्मेदारी बन जाती है। शरणागति में भय नहीं रहता। द्रौपदी ने शरणागति से रक्षा पाई। शरणागति सबसे सरल मार्ग है। शरणागति में विश्वास आवश्यक। शरणागति भक्ति का सार है।

निष्काम भक्ति

निष्काम भक्ति बिना किसी इच्छा की भक्ति है। निष्काम भक्ति में केवल प्रेम होता है। निष्काम भक्ति सच्ची भक्ति है। निष्काम भक्ति से भगवान प्रसन्न होते हैं। निष्काम भक्ति में स्वार्थ नहीं होता। निष्काम भक्ति परम भक्ति है। निष्काम भक्ति से मुक्ति मिलती है। निष्काम भक्ति भगवान को प्रिय है।

सकाम भक्ति

सकाम भक्ति इच्छा पूर्ति के लिए भक्ति है। सकाम भक्ति भी भक्ति है। सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति की ओर बढ़ते हैं। सकाम भक्ति में भगवान कृपा करते हैं। सकाम भक्ति भक्ति का प्रारंभ है। सकाम भक्ति से धीरे-धीरे निष्काम बनें। सकाम भक्ति भी मान्य है। सकाम भक्ति से शुद्धि होती है।

प्रेम लक्षणा भक्ति

प्रेम लक्षणा भक्ति शुद्ध प्रेम है। प्रेम लक्षणा भक्ति में कोई भय नहीं। प्रेम लक्षणा भक्ति में केवल प्रेम होता है। प्रेम लक्षणा भक्ति सर्वोच्च है। गोपियों की भक्ति प्रेम लक्षणा थी। प्रेम लक्षणा भक्ति में द्वैत मिट जाता है। प्रेम लक्षणा भक्ति परम आनंद है। प्रेम लक्षणा भक्ति भगवान को प्रिय।

वैधी भक्ति

वैधी भक्ति शास्त्र विधि से भक्ति है। वैधी भक्ति में नियम पालन होता है। वैधी भक्ति भक्ति का प्रारंभ है। वैधी भक्ति से अनुशासन आता है। वैधी भक्ति से रागानुगा भक्ति की ओर बढ़ते हैं। वैधी भक्ति आवश्यक है। वैधी भक्ति नींव है। वैधी भक्ति से शुद्धि होती है।

रागानुगा भक्ति

रागानुगा भक्ति स्वाभाविक प्रेम से भक्ति है। रागानुगा भक्ति में नियम नहीं, प्रेम है। रागानुगा भक्ति उच्च कोटि की भक्ति। रागानुगा भक्ति में भगवान के प्रति राग होता है। रागानुगा भक्ति वैधी से ऊपर है। रागानुगा भक्ति में स्वतंत्रता है। रागानुगा भक्ति परम मधुर। रागानुगा भक्ति भगवान को अति प्रिय।

मीरा बाई - प्रेम की मूर्ति

मीरा बाई कृष्ण की परम भक्त थीं। मीरा ने सब कुछ त्याग दिया। मीरा के भजन अमर हैं। मीरा ने विष का प्याला पिया पर कृष्ण की भक्ति न छोड़ी। मीरा प्रेम भक्ति की प्रतीक हैं। मीरा का जीवन भक्ति का आदर्श। मीरा ने कृष्ण में लीन होकर मुक्ति पाई। मीरा भक्ति मार्ग की महान संत।

सूरदास - कृष्ण भक्त

सूरदास अंधे कवि और भक्त थे। सूरदास ने कृष्ण लीला का गान किया। सूरसागर सूरदास की रचना है। सूरदास की भक्ति वात्सल्य भाव की थी। सूरदास के पद अत्यंत मधुर हैं। सूरदास ने बाल कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। सूरदास भक्ति काव्य के शिखर हैं। सूरदास की भक्ति अमर है।

तुलसीदास - राम भक्त

तुलसीदास राम के परम भक्त थे। तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। रामचरितमानस भक्ति का महाकाव्य है। तुलसीदास ने दास्य भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया। तुलसीदास की भक्ति सरल और सुलभ। तुलसीदास ने हनुमान की भक्ति की। तुलसीदास भक्ति मार्ग के महान संत। तुलसीदास की रचनाएं अमर हैं।

कबीर - निर्गुण भक्त

कबीर निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। कबीर ने आडंबर का विरोध किया। कबीर के दोहे सीधे और सरल हैं। कबीर ने सच्ची भक्ति का उपदेश दिया। कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया। कबीर की भक्ति ज्ञान मिश्रित थी। कबीर समाज सुधारक भी थे। कबीर की वाणी आज भी प्रासंगिक है।

चैतन्य महाप्रभु - प्रेम अवतार

चैतन्य महाप्रभु कृष्ण प्रेम के अवतार थे। चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन आंदोलन चलाया। चैतन्य महाप्रभु की भक्ति प्रेम लक्षणा थी। चैतन्य महाप्रभु नाम संकीर्तन के प्रचारक। चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति को सर्वसुलभ बनाया। चैतन्य महाप्रभु का जीवन भक्ति रस में डूबा। चैतन्य महाप्रभु ने वैष्णव धर्म का प्रचार किया। चैतन्य महाप्रभु भक्ति के महान आचार्य।

नामदेव - महाराष्ट्र के संत

नामदेव विठोबा के भक्त थे। नामदेव दर्जी थे पर महान भक्त बने। नामदेव के अभंग प्रसिद्ध हैं। नामदेव की भक्ति सरल और सच्ची थी। नामदेव ने जाति-पाति का भेद नहीं माना। नामदेव की भक्ति में प्रेम और समर्पण था। नामदेव वारकरी संप्रदाय के संत। नामदेव का जीवन भक्ति का आदर्श।

तुकाराम - अभंग के संत

तुकाराम महाराष्ट्र के महान संत थे। तुकाराम के अभंग अत्यंत लोकप्रिय हैं। तुकाराम विठोबा के परम भक्त थे। तुकाराम ने सरल भाषा में भक्ति का उपदेश दिया। तुकाराम का जीवन कष्टों से भरा पर भक्ति अटूट। तुकाराम ने नाम स्मरण पर बल दिया। तुकाराम वारकरी परंपरा के शिखर। तुकाराम की भक्ति आज भी जीवित है।

रामकृष्ण परमहंस - सर्वधर्म समन्वय

रामकृष्ण परमहंस काली के उपासक थे। रामकृष्ण ने सभी धर्मों का अनुभव किया। रामकृष्ण ने कहा सभी धर्म एक हैं। रामकृष्ण की भक्ति अत्यंत गहरी थी। रामकृष्ण को माँ काली के दर्शन हुए। रामकृष्ण सरल और निश्छल थे। रामकृष्ण ने विवेकानंद को शिष्य बनाया। रामकृष्ण आधुनिक युग के महान संत।

भक्ति में विनय

भक्ति में विनय आवश्यक है। विनय से भगवान प्रसन्न होते हैं। विनय अहंकार का विरोधी है। विनय से हृदय कोमल होता है। विनय भक्ति का आभूषण है। विनय से भगवान निकट आते हैं। विनय में शक्ति है। विनय भक्त का गुण है।

भक्ति में श्रद्धा

श्रद्धा भक्ति का आधार है। श्रद्धा बिना भक्ति नहीं होती। श्रद्धा विश्वास है। श्रद्धा से भगवान मिलते हैं। श्रद्धा संदेह का विरोधी है। श्रद्धा हृदय से आती है। श्रद्धा भक्ति की नींव है। श्रद्धा से सब संभव है।

भक्ति में प्रेम

प्रेम भक्ति का प्राण है। प्रेम बिना भक्ति खोखली है। प्रेम निस्वार्थ होना चाहिए। प्रेम से भगवान बंध जाते हैं। प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है। प्रेम में भय नहीं होता। प्रेम भक्ति का सार है। प्रेम से सब मिल जाता है।

भक्ति में समर्पण

समर्पण भक्ति का चरम है। समर्पण में अपना कुछ नहीं रहता। समर्पण से भगवान की जिम्मेदारी बनती है। समर्पण में भय नहीं रहता। समर्पण पूर्ण विश्वास है। समर्पण से मुक्ति मिलती है। समर्पण भक्ति का लक्ष्य है। समर्पण परम शांति देता है।

भक्ति में धैर्य

धैर्य भक्ति में आवश्यक है। धैर्य से भगवान की प्रतीक्षा करें। धैर्य से भक्ति परिपक्व होती है। धैर्य संयम का गुण है। धैर्य से सब मिल जाता है। धैर्य भक्त की शक्ति है। धैर्य से भगवान प्रसन्न होते हैं। धैर्य भक्ति का सहायक है।

भक्ति में एकाग्रता

एकाग्रता भक्ति में महत्वपूर्ण है। एकाग्रता से भगवान में ध्यान लगता है। एकाग्रता चंचल मन को रोकती है। एकाग्रता से भक्ति गहरी होती है। एकाग्रता अभ्यास से आती है। एकाग्रता भक्ति का साधन है। एकाग्रता से भगवान मिलते हैं। एकाग्रता भक्त का गुण है।

भक्ति में निरंतरता

निरंतरता भक्ति में आवश्यक है। निरंतर भक्ति करते रहना चाहिए। निरंतरता से भक्ति सिद्ध होती है। निरंतरता धैर्य मांगती है। निरंतरता से भगवान प्रसन्न होते हैं। निरंतरता भक्ति का नियम है। निरंतरता से सफलता मिलती है। निरंतरता भक्त की पहचान है।

भक्ति में पवित्रता

पवित्रता भक्ति का आधार है। पवित्रता मन, वचन, कर्म से होनी चाहिए। पवित्रता से भगवान प्रसन्न होते हैं। पवित्रता आंतरिक और बाहरी दोनों। पवित्रता से भक्ति शुद्ध होती है। पवित्रता भक्ति का गुण है। पवित्रता से भगवान निकट आते हैं। पवित्रता भक्त का आभूषण है।

भक्ति संगीत - भजन कीर्तन

भजन कीर्तन भक्ति का माध्यम है। संगीत से भक्ति रस बहता है। भजन से मन प्रसन्न होता है। कीर्तन सामूहिक भक्ति है। संगीत भगवान को प्रिय है। भजन से वातावरण पवित्र होता है। कीर्तन से भक्ति जागृत होती है। भक्ति संगीत आनंद का स्रोत है।

भक्ति साहित्य

भक्ति साहित्य अमूल्य धरोहर है। भक्ति साहित्य में भक्तों के अनुभव हैं। रामचरितमानस, सूरसागर भक्ति साहित्य के उदाहरण। भक्ति साहित्य प्रेरणा देता है। भक्ति साहित्य सरल भाषा में है। भक्ति साहित्य जन-जन तक पहुंचा। भक्ति साहित्य आज भी प्रासंगिक। भक्ति साहित्य भारत की संपदा है।

भक्ति और कर्म

भक्ति और कर्म विरोधी नहीं हैं। भक्त को कर्म भी करना चाहिए। कर्म को भगवान को समर्पित करें। भक्ति से कर्म निष्काम होता है। कर्म भक्ति का अंग है। भक्ति और कर्म का समन्वय आदर्श। कर्म में भक्ति भाव रखें। भक्ति से कर्म पूजा बन जाता है।

भक्ति और ज्ञान

भक्ति और ज्ञान पूरक हैं। भक्ति से ज्ञान मिलता है। ज्ञान से भक्ति गहरी होती है। भक्ति हृदय का मार्ग, ज्ञान बुद्धि का। भक्ति और ज्ञान दोनों आवश्यक। भक्ति से परम ज्ञान मिलता है। ज्ञान भक्ति को दिशा देता है। भक्ति और ज्ञान का मेल परम है।

भक्ति में गुरु का महत्व

गुरु भक्ति मार्ग में आवश्यक हैं। गुरु मार्गदर्शक हैं। गुरु से भक्ति की दीक्षा मिलती है। गुरु भगवान का रूप हैं। गुरु बिना भक्ति अधूरी है। गुरु शिष्य को भगवान तक ले जाते हैं। गुरु की कृपा से सब मिलता है। गुरु भक्ति का आधार हैं।

भक्ति में सत्संग

सत्संग भक्ति में महत्वपूर्ण है। सत्संग से भक्ति बढ़ती है। सत्संग में भक्तों की संगति होती है। सत्संग से प्रेरणा मिलती है। सत्संग में भगवान की चर्चा होती है। सत्संग से मन शुद्ध होता है। सत्संग भक्ति का साधन है। सत्संग से भक्ति जागृत होती है।

भक्ति का फल - मोक्ष

भक्ति का अंतिम फल मोक्ष है। भक्ति से भगवान मिलते हैं। भक्ति से जन्म-मृत्यु का चक्र टूटता है। भक्ति से परम शांति मिलती है। भक्ति से आत्मा मुक्त होती है। भक्ति मोक्ष का सरल मार्ग है। भक्ति से भगवान के धाम में स्थान मिलता है। भक्ति परम पुरुषार्थ है।

भक्ति - सर्वसुलभ मार्ग

भक्ति सबके लिए सुलभ है। भक्ति में जाति-पाति का भेद नहीं। भक्ति में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं। भक्ति सरल और सहज है। भक्ति में केवल प्रेम चाहिए। भक्ति कलियुग का सर्वोत्तम मार्ग। भक्ति से भगवान शीघ्र मिलते हैं। भक्ति सबका अधिकार है।

कर्म ज्ञान

कर्म का विज्ञान और दर्शन

कर्म योग का सार

कर्म योग कर्म का मार्ग है। कर्म योग में कर्तव्य पालन प्रमुख है। कर्म योग फल की आसक्ति से मुक्त करता है। कर्म योग गृहस्थों के लिए उत्तम मार्ग। कर्म योग में कर्म पूजा बन जाता है। कर्म योग से मन शुद्ध होता है। कर्म योग भगवद गीता का मूल संदेश। कर्म योग जीवन जीने की कला है।

गीता का कर्म संदेश

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - यह गीता का मूल मंत्र है। तुम्हारा अधिकार केवल कर्म में है, फल में नहीं। फल की इच्छा से कर्म मत करो। कर्म करना तुम्हारा धर्म है। फल भगवान के हाथ में है। कर्म में ही तुम्हारी मुक्ति है। यह संदेश सार्वभौमिक और सार्वकालिक है। यह जीवन का महान सूत्र है।

निष्काम कर्म - श्रेष्ठ कर्म

निष्काम कर्म फल की इच्छा बिना कर्म है। निष्काम कर्म में आसक्ति नहीं होती। निष्काम कर्म से बंधन नहीं होता। निष्काम कर्म सर्वोत्तम कर्म है। निष्काम कर्म से मन शुद्ध होता है। निष्काम कर्म योगी का लक्षण है। निष्काम कर्म से मोक्ष मिलता है। निष्काम कर्म कर्म योग का आदर्श है।

सकाम कर्म - फल की इच्छा

सकाम कर्म फल की इच्छा से किया जाता है। सकाम कर्म में आसक्ति होती है। सकाम कर्म बंधन का कारण है। सकाम कर्म से पुण्य-पाप मिलता है। सकाम कर्म सामान्य मनुष्य का कर्म। सकाम कर्म से निष्काम की ओर बढ़ना चाहिए। सकाम कर्म भी आवश्यक है। सकाम कर्म से धीरे-धीरे निष्काम बनें।

विकर्म - निषिद्ध कर्म

विकर्म वर्जित कर्म है। विकर्म अधर्म है। विकर्म से पाप लगता है। विकर्म से पतन होता है। विकर्म से बचना चाहिए। विकर्म हिंसा, चोरी, झूठ आदि। विकर्म समाज के लिए हानिकारक। विकर्म से दुख मिलता है।

अकर्म - कर्म में अकर्म

अकर्म कर्म न करना नहीं है। अकर्म कर्म करते हुए अकर्ता भाव है। अकर्म में कर्तापन नहीं होता। अकर्म योगी का लक्षण है। अकर्म कर्म से परे है। अकर्म में आसक्ति नहीं होती। अकर्म परम स्थिति है। अकर्म को समझना कठिन है।

कर्म का बंधन

कर्म से बंधन होता है। आसक्ति से कर्म बंधन बनता है। फल की इच्छा बंधन का कारण। कर्तापन का भाव बंधन है। कर्म बंधन जन्म-मृत्यु का कारण। कर्म बंधन से मुक्ति चाहिए। निष्काम कर्म से बंधन नहीं होता। ज्ञान से कर्म बंधन टूटता है।

कर्म की अनिवार्यता

कर्म करना अनिवार्य है। कोई भी कर्म बिना नहीं रह सकता। प्रकृति सबको कर्म करवाती है। कर्म से बचा नहीं जा सकता। श्वास लेना भी कर्म है। जीवन और कर्म अभिन्न हैं। कर्म त्यागना संभव नहीं। कर्म में ही जीवन है।

कर्तव्य कर्म - स्वधर्म

कर्तव्य कर्म करना आवश्यक है। अपना धर्म पालन करना कर्तव्य। स्वधर्म पालन श्रेयस्कर है। परधर्म भयावह है। कर्तव्य से विमुख न हों। कर्तव्य पालन में ही कल्याण। कर्तव्य कर्म बंधन नहीं बनाता। कर्तव्य निभाना धर्म है।

कर्मफल का नियम

हर कर्म का फल अवश्य मिलता है। कर्मफल से कोई बच नहीं सकता। जैसा कर्म वैसा फल मिलता है। कर्मफल तुरंत या बाद में मिलता है। कर्मफल का नियम अटल है। अच्छे कर्म से सुख, बुरे से दुख। कर्मफल ईश्वर का न्याय है। कर्मफल से डरना नहीं, सीखना चाहिए।

संचित कर्म - संचित फल

संचित कर्म पिछले जन्मों के कर्म हैं। संचित कर्म का भंडार है। संचित कर्म का फल भोगना पड़ता है। संचित कर्म प्रारब्ध बनता है। संचित कर्म अनंत हो सकते हैं। ज्ञान से संचित कर्म नष्ट होते हैं। संचित कर्म जन्म का कारण। संचित कर्म कर्म का खाता है।

प्रारब्ध कर्म - वर्तमान फल

प्रारब्ध इस जन्म में भोगने वाला कर्मफल है। प्रारब्ध संचित कर्म का अंश है। प्रारब्ध को भोगना अनिवार्य है। प्रारब्ध से बचा नहीं जा सकता। प्रारब्ध भाग्य कहलाता है। प्रारब्ध को स्वीकार करें। प्रारब्ध में ईश्वर की इच्छा है। प्रारब्ध भोगते हुए नया कर्म करें।

क्रियमाण कर्म - वर्तमान कर्म

क्रियमाण वर्तमान में किए जा रहे कर्म हैं। क्रियमाण कर्म हमारे हाथ में है। क्रियमाण कर्म भविष्य बनाता है। क्रियमाण कर्म सावधानी से करें। क्रियमाण कर्म निष्काम होना चाहिए। क्रियमाण कर्म से संचित बनता है। क्रियमाण कर्म हमारी जिम्मेदारी। क्रियमाण कर्म में सुधार संभव।

कर्म और पुनर्जन्म

कर्म पुनर्जन्म का कारण है। अधूरे कर्म फिर जन्म देते हैं। कर्म बंधन से पुनर्जन्म होता है। निष्काम कर्म से पुनर्जन्म नहीं। कर्म का लेखा-जोखा चलता रहता है। पुनर्जन्म कर्मफल भोगने के लिए। कर्म से मुक्ति तो पुनर्जन्म से मुक्ति। कर्म और पुनर्जन्म का चक्र।

कर्म योग और गृहस्थ

कर्म योग गृहस्थों के लिए आदर्श मार्ग। गृहस्थ कर्म से बच नहीं सकते। गृहस्थ जीवन में कर्म अनिवार्य। कर्म योग से गृहस्थ मुक्त हो सकते हैं। गृहस्थ धर्म पालन कर्म योग है। परिवार पालन भी कर्म योग। कर्म योग संन्यास से श्रेष्ठ हो सकता है। गृहस्थ कर्म योगी बन सकते हैं।

कर्म में समत्व - योग

"समत्वं योग उच्यते" - समत्व ही योग है। सुख-दुख में समान रहना योग। सफलता-असफलता में समभाव। समत्व से कर्म बंधन नहीं बनता। समत्व योगी का लक्षण है। समत्व से मन शांत रहता है। समत्व कर्म योग का सार। समत्व परम स्थिति है।

कर्म में कुशलता

"योगः कर्मसु कौशलम्" - योग कर्म में कुशलता है। कुशलता से कर्म करना योग। कुशलता में बुद्धि का प्रयोग। कुशलता से कर्म सिद्ध होता है। कुशलता आसक्ति से मुक्त करती है। कुशलता से कर्म सुंदर बनता है। कुशलता योगी का गुण। कुशलता अभ्यास से आती है।

लोकसंग्रह - समाज कल्याण

लोकसंग्रह समाज कल्याण है। महापुरुष लोकसंग्रह के लिए कर्म करते हैं। लोकसंग्रह निष्काम कर्म का उदाहरण। लोकसंग्रह से समाज का हित। लोकसंग्रह नेता का कर्तव्य। लोकसंग्रह में स्वार्थ नहीं होता। लोकसंग्रह आदर्श प्रस्तुत करना। लोकसंग्रह कर्म योग का उच्च रूप।

यज्ञ कर्म - पवित्र कर्म

यज्ञ के लिए किया कर्म यज्ञ कर्म है। यज्ञ कर्म बंधन नहीं बनाता। यज्ञ कर्म समर्पित कर्म है। यज्ञ कर्म से देवता प्रसन्न होते हैं। यज्ञ कर्म समाज के लिए होता है। यज्ञ कर्म निष्काम होता है। यज्ञ कर्म पवित्र कर्म है। यज्ञ कर्म से कल्याण होता है।

कर्म और धर्म

धर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए। धर्म कर्म का मार्गदर्शक है। धर्म युक्त कर्म श्रेष्ठ है। धर्म विरुद्ध कर्म पाप है। धर्म पालन सबसे बड़ा कर्म। धर्म से कर्म पवित्र होता है। धर्म और कर्म अभिन्न हैं। धर्म कर्म का आधार है।

कर्म और अहंकार

अहंकार कर्म को बंधन बनाता है। "मैं कर्ता हूं" यह अहंकार है। अहंकार से कर्मफल की आसक्ति। अहंकार त्यागकर कर्म करें। अहंकार रहित कर्म निष्काम है। अहंकार से मुक्ति आवश्यक। अहंकार कर्म योग का शत्रु। अहंकार त्याग से कर्म मुक्त करता है।

कर्म और बुद्धि योग

बुद्धि से कर्म करना बुद्धि योग। बुद्धि योग कर्म को निर्देशित करता। बुद्धि से कर्म में कुशलता आती है। बुद्धि योग विवेक देता है। बुद्धि योग से आसक्ति दूर होती। बुद्धि योग कर्म योग का साथी। बुद्धि योग से कर्म शुद्ध होता। बुद्धि योग कर्म का मार्गदर्शक।

कर्म का त्याग - संन्यास

कर्म फल का त्याग संन्यास है। कर्म का त्याग संभव नहीं। फल त्याग कर कर्म करना संन्यास। संन्यास आंतरिक त्याग है। संन्यास कर्म से पलायन नहीं। संन्यास निष्काम कर्म है। संन्यास योगी का मार्ग। संन्यास और कर्म योग एक हैं।

कर्म और प्रकृति

प्रकृति सभी कर्म करवाती है। प्रकृति के गुण कर्म करते हैं। आत्मा अकर्ता है, प्रकृति कर्ता। प्रकृति का नियम कर्म है। प्रकृति से कोई बच नहीं सकता। प्रकृति सबको कर्म में लगाती है। प्रकृति और कर्म अभिन्न। प्रकृति को समझना कर्म समझना है।

त्रिगुण और कर्म

सत्व, रजस, तमस तीन गुण हैं। गुण के अनुसार कर्म होता है। सात्विक कर्म श्रेष्ठ है। राजसिक कर्म फल की इच्छा से। तामसिक कर्म अज्ञान से होता। गुणों से परे होना चाहिए। गुण कर्म को प्रभावित करते हैं। गुणातीत होना मुक्ति है।

सात्विक कर्म

सात्विक कर्म शुद्ध और पवित्र है। सात्विक कर्म कर्तव्य से होता है। सात्विक कर्म में आसक्ति नहीं। सात्विक कर्म फल की इच्छा बिना। सात्विक कर्म शांति देता है। सात्विक कर्म ज्ञान वर्धक। सात्विक कर्म मोक्ष का मार्ग। सात्विक कर्म सर्वोत्तम है।

राजसिक कर्म

राजसिक कर्म फल की इच्छा से होता है। राजसिक कर्म में आसक्ति होती है। राजसिक कर्म अहंकार से युक्त। राजसिक कर्म परिश्रम साध्य। राजसिक कर्म बंधन बनाता है। राजसिक कर्म सामान्य मनुष्य का। राजसिक कर्म से दुख मिलता है। राजसिक कर्म से सात्विक की ओर बढ़ें।

तामसिक कर्म

तामसिक कर्म अज्ञान से होता है। तामसिक कर्म हानिकारक है। तामसिक कर्म आलस्य से युक्त। तामसिक कर्म परिणाम नहीं सोचता। तामसिक कर्म पाप का कारण। तामसिक कर्म से पतन होता। तामसिक कर्म से बचना चाहिए। तामसिक कर्म अधोगति देता है।

कर्म और वर्ण धर्म

वर्ण धर्म कर्म आधारित है। ब्राह्मण का कर्म ज्ञान और शिक्षा। क्षत्रिय का कर्म रक्षा और शासन। वैश्य का कर्म व्यापार और कृषि। शूद्र का कर्म सेवा। अपने वर्ण धर्म का पालन श्रेयस्कर। वर्ण धर्म समाज व्यवस्था है। वर्ण धर्म कर्म विभाजन है।

कर्म और आश्रम धर्म

चार आश्रम - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास। हर आश्रम के अपने कर्म हैं। ब्रह्मचर्य में अध्ययन कर्म। गृहस्थ में परिवार पालन कर्म। वानप्रस्थ में त्याग और तप। संन्यास में ज्ञान और मोक्ष साधना। आश्रम धर्म पालन आवश्यक। आश्रम धर्म जीवन का क्रम। आश्रम धर्म कर्म का मार्गदर्शन।

कर्म और यज्ञ चक्र

यज्ञ से वर्षा, वर्षा से अन्न। अन्न से प्राणी, प्राणी से कर्म। कर्म से यज्ञ, यह चक्र चलता है। यज्ञ चक्र सृष्टि का नियम। यज्ञ चक्र में सहयोग है। यज्ञ चक्र तोड़ना पाप है। यज्ञ चक्र में जीवन चलता है। यज्ञ चक्र कर्म का आधार।

कर्म और त्याग

त्याग कर्म फल का होना चाहिए। कर्म का त्याग नहीं, फल का त्याग। त्याग से कर्म निष्काम होता है। त्याग अहंकार का होना चाहिए। त्याग आसक्ति का होना चाहिए। त्याग से कर्म मुक्त करता है। त्याग कर्म योग का अंग। त्याग से मोक्ष मिलता है।

कर्म की प्रेरणा

कर्म की प्रेरणा कर्तव्य होनी चाहिए। कर्म की प्रेरणा धर्म होनी चाहिए। स्वार्थ से प्रेरित कर्म बंधन बनता। लोक कल्याण से प्रेरित कर्म श्रेष्ठ। प्रेरणा शुद्ध होनी चाहिए। प्रेरणा कर्म को दिशा देती है। प्रेरणा से कर्म का फल तय होता। प्रेरणा कर्म का मूल है।

कर्म और विवेक

विवेक से कर्म करना चाहिए। विवेक सही-गलत का ज्ञान देता। विवेक से कर्म शुद्ध होता है। विवेक कर्म को दिशा देता है। विवेक से आसक्ति दूर होती। विवेक कर्म योगी का गुण। विवेक से कर्म बंधन नहीं बनता। विवेक कर्म का मार्गदर्शक है।

कर्म और वैराग्य

वैराग्य आसक्ति से मुक्ति है। वैराग्य से कर्म निष्काम होता। वैराग्य कर्म त्याग नहीं है। वैराग्य फल त्याग है। वैराग्य से मन शांत रहता। वैराग्य कर्म योगी का गुण। वैराग्य से कर्म बंधन नहीं। वैराग्य मोक्ष का मार्ग है।

कर्म और समर्पण

कर्म को भगवान को समर्पित करें। समर्पण से कर्म पूजा बन जाता। समर्पण से कर्म बंधन नहीं बनता। समर्पण निष्काम कर्म का रूप। समर्पण से भगवान प्रसन्न होते हैं। समर्पण कर्म योग का सार। समर्पण से मन शुद्ध होता। समर्पण से मोक्ष मिलता है।

कर्म और श्रद्धा

श्रद्धा से कर्म करना चाहिए। श्रद्धा कर्म को शक्ति देती है। श्रद्धा बिना कर्म फलदायी नहीं। श्रद्धा से कर्म पूर्ण होता है। श्रद्धा कर्म में विश्वास है। श्रद्धा से कर्म सुंदर बनता। श्रद्धा कर्म योगी का गुण। श्रद्धा से कर्म सिद्ध होता है।

कर्म और संकल्प

संकल्प से कर्म प्रारंभ होता है। संकल्प कर्म को दिशा देता है। दृढ़ संकल्प से कर्म सिद्ध होता। संकल्प में शक्ति होती है। संकल्प शुद्ध होना चाहिए। संकल्प से कर्म में दृढ़ता आती। संकल्प कर्म का बीज है। संकल्प से कर्म फलदायी होता।

कर्म और धैर्य

धैर्य से कर्म करना चाहिए। धैर्य कर्म को पूर्ण करता है। धैर्य बिना कर्म अधूरा रहता। धैर्य से कर्म फल मिलता है। धैर्य कर्म योगी का गुण। धैर्य से कठिन कर्म भी संभव। धैर्य कर्म में स्थिरता देता। धैर्य से कर्म सिद्ध होता है।

कर्म और उत्साह

उत्साह से कर्म करना चाहिए। उत्साह कर्म में ऊर्जा देता है। उत्साह से कर्म सुंदर बनता। उत्साह बिना कर्म बोझ लगता। उत्साह कर्म को आनंददायक बनाता। उत्साह से कर्म शीघ्र पूर्ण होता। उत्साह कर्म योगी का गुण। उत्साह से कर्म में सफलता मिलती।

कर्म का फल - मोक्ष

निष्काम कर्म से मोक्ष मिलता है। कर्म योग मोक्ष का मार्ग है। कर्म से मुक्ति संभव है। कर्म त्याग नहीं, फल त्याग से मोक्ष। कर्म योग सरल मोक्ष मार्ग। कर्म योग गृहस्थों के लिए उत्तम। कर्म योग से जीवन मुक्त होता। कर्म योग परम पुरुषार्थ है।

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ध्यान

ध्यान की कला और विज्ञान

ध्यान योग का परिचय

ध्यान योग मन को साधने का मार्ग है। ध्यान योग आत्म साक्षात्कार का साधन। ध्यान योग अष्टांग योग का अंग। ध्यान योग से मन एकाग्र होता है। ध्यान योग शांति का मार्ग है। ध्यान योग सभी के लिए उपयोगी। ध्यान योग जीवन बदल देता है। ध्यान योग परम आनंद का द्वार।

ध्यान का अर्थ

ध्यान चित्त की एकाग्रता है। ध्यान में मन एक विषय पर स्थिर होता। ध्यान निरंतर चिंतन है। ध्यान में विचार शांत होते हैं। ध्यान आत्मा में स्थिति है। ध्यान वर्तमान में जीना है। ध्यान साक्षी भाव है। ध्यान परम चेतना से जुड़ना।

ध्यान की आवश्यकता

आधुनिक जीवन में तनाव बहुत है। मन अशांत और भटका रहता है। ध्यान से मन को शांति मिलती। ध्यान स्वास्थ्य के लिए आवश्यक। ध्यान आध्यात्मिक विकास के लिए जरूरी। ध्यान से जीवन में संतुलन आता। ध्यान आत्म ज्ञान का मार्ग। ध्यान सभी को करना चाहिए।

ध्यान का स्थान

ध्यान के लिए शांत स्थान चुनें। स्थान स्वच्छ और पवित्र हो। वहां शोर न हो। प्रकाश मध्यम हो। तापमान सुखद हो। स्थान नियमित एक ही रखें। स्थान में सकारात्मक ऊर्जा हो। स्थान ध्यान के लिए समर्पित करें।

ध्यान का समय

प्रातःकाल ध्यान का सर्वोत्तम समय। ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान श्रेष्ठ। सूर्योदय से पहले ध्यान करें। संध्या समय भी उत्तम है। नियमित समय पर ध्यान करें। प्रतिदिन एक ही समय रखें। समय की पाबंदी रखें। धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

ध्यान की अवधि

प्रारंभ में 5-10 मिनट ध्यान करें। धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। 20-30 मिनट उत्तम अवधि है। अनुभवी साधक घंटों ध्यान करते हैं। गुणवत्ता समय से महत्वपूर्ण। नियमितता अवधि से जरूरी। जबरदस्ती न करें। स्वाभाविक रूप से बढ़ने दें।

ध्यान का आसन

पद्मासन ध्यान के लिए श्रेष्ठ। सिद्धासन भी उत्तम है। सुखासन में भी बैठ सकते हैं। रीढ़ सीधी रखें। सिर, गर्दन, रीढ़ एक सीध में। शरीर स्थिर और आरामदायक हो। हाथ ज्ञान मुद्रा में रखें। आसन स्थिर होना चाहिए।

ध्यान और श्वास

श्वास ध्यान का आधार है। श्वास पर ध्यान केंद्रित करें। श्वास को देखें, बदलें नहीं। श्वास स्वाभाविक रहने दें। श्वास की गति पर ध्यान दें। श्वास से मन शांत होता है। श्वास वर्तमान में लाता है। श्वास ध्यान सरलतम विधि।

प्राणायाम और ध्यान

प्राणायाम ध्यान की तैयारी है। प्राणायाम से मन शुद्ध होता। प्राणायाम ऊर्जा बढ़ाता है। अनुलोम-विलोम उत्तम प्राणायाम। भ्रामरी प्राणायाम मन शांत करता। कपालभाति मन को जागृत करता। प्राणायाम के बाद ध्यान करें। प्राणायाम ध्यान को गहरा बनाता।

ध्यान में मंत्र

मंत्र ध्यान को सहायता देता है। ओम सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। गुरु मंत्र भी उत्तम है। मंत्र मन को एकाग्र करता। मंत्र जाप से ध्यान गहरा होता। मंत्र की ध्वनि पर ध्यान दें। मंत्र मानसिक जप करें। मंत्र से मन शुद्ध होता।

ओम का ध्यान

ओम ब्रह्म का प्रतीक है। ओम सर्वोच्च मंत्र है। ओम में तीन ध्वनियां - अ, उ, म। ओम का उच्चारण करें। ओम की गूंज पर ध्यान दें। ओम से चक्र जागृत होते हैं। ओम ध्यान परम शक्तिशाली। ओम से परमात्मा से जुड़ाव।

त्राटक - एकटक देखना

त्राटक एकाग्रता की विधि है। दीपक की लौ पर एकटक देखें। पलक न झपकाएं। आंखों में पानी आने तक देखें। फिर आंखें बंद कर प्रतिबिंब देखें। त्राटक से एकाग्रता बढ़ती है। त्राटक नेत्र ज्योति बढ़ाता। त्राटक ध्यान की तैयारी है।

चक्र ध्यान

शरीर में सात मुख्य चक्र हैं। चक्र ऊर्जा केंद्र हैं। चक्रों पर ध्यान करें। मूलाधार से सहस्रार तक जाएं। हर चक्र का रंग और बीज मंत्र है। चक्र ध्यान से कुंडलिनी जागृत होती। चक्र ध्यान शक्तिशाली विधि। चक्र ध्यान गुरु मार्गदर्शन में करें।

आज्ञा चक्र ध्यान

आज्ञा चक्र भ्रूमध्य में है। आज्ञा चक्र तीसरी आंख है। आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करें। आज्ञा चक्र ज्ञान का केंद्र। आज्ञा चक्र से अंतर्दृष्टि मिलती। आज्ञा चक्र ध्यान सरल और प्रभावी। आज्ञा चक्र गुरु का स्थान। आज्ञा चक्र से समाधि मिलती।

हृदय ध्यान

हृदय में आत्मा का निवास है। हृदय पर ध्यान केंद्रित करें। हृदय में प्रेम और शांति अनुभव करें। हृदय ध्यान भक्ति का मार्ग। हृदय में भगवान को देखें। हृदय ध्यान सरल और मधुर। हृदय ध्यान से प्रेम जागता। हृदय ध्यान परम आनंददायक।

विपश्यना ध्यान

विपश्यना बुद्ध की विधि है। विपश्यना में संवेदनाओं को देखें। शरीर की अनुभूतियों पर ध्यान दें। बिना प्रतिक्रिया के देखें। विपश्यना साक्षी भाव सिखाता। विपश्यना से आत्म ज्ञान होता। विपश्यना मन को शुद्ध करता। विपश्यना गहन ध्यान विधि।

साक्षी ध्यान

साक्षी भाव ध्यान का सार है। विचारों को देखें, उनमें न उलझें। साक्षी बनकर मन को देखें। साक्षी निर्लिप्त रहता है। साक्षी भाव से मन शांत होता। साक्षी आत्मा का स्वभाव है। साक्षी ध्यान उच्च स्तर की विधि। साक्षी भाव से मुक्ति मिलती।

ध्यान में बाधाएं

मन का भटकना सबसे बड़ी बाधा। शारीरिक बेचैनी बाधा बनती। नींद आना सामान्य समस्या। विचारों का तूफान उठता है। अधीरता बाधा बनती है। अपेक्षाएं बाधा हैं। शंकाएं मन में आती हैं। धैर्य से बाधाओं को पार करें।

मन को एकाग्र करना

मन स्वभाव से चंचल है। मन को धीरे-धीरे साधें। एक विषय पर मन को लगाएं। मन भटके तो वापस लाएं। जबरदस्ती न करें। धैर्य रखें। नियमित अभ्यास करें। धीरे-धीरे मन वश में होगा।

विचारों से मुक्ति

विचार मन का स्वभाव हैं। विचारों को रोकने की कोशिश न करें। विचारों को देखें, साक्षी बनें। विचारों में न उलझें। विचार आएं और चले जाएं। विचारों से तादात्म्य तोड़ें। विचार शून्यता ध्यान का लक्ष्य। विचार शून्यता में शांति है।

ध्यान में नींद

ध्यान में नींद आना सामान्य है। थकान होने पर नींद आती है। रात्रि में पूरी नींद लें। प्रातःकाल ध्यान करें। आंखें थोड़ी खुली रखें। रीढ़ सीधी रखें। गहरी श्वास लें। धीरे-धीरे नींद की समस्या दूर होगी।

ध्यान में अनुभव

ध्यान में विभिन्न अनुभव होते हैं। प्रकाश दिखाई दे सकता है। ध्वनियां सुनाई दे सकती हैं। शरीर हल्का लग सकता है। आनंद की अनुभूति हो सकती। शांति का अनुभव होता है। अनुभवों में न उलझें। अनुभव आते-जाते रहते हैं।

ध्यान की गहराई

ध्यान धीरे-धीरे गहरा होता है। प्रारंभ में मन भटकता है। अभ्यास से एकाग्रता बढ़ती है। गहरे ध्यान में समय का पता नहीं। शरीर की सुध नहीं रहती। परम शांति का अनुभव होता। गहरा ध्यान समाधि की ओर ले जाता। गहराई धैर्य से आती है।

धारणा - ध्यान की पूर्व अवस्था

धारणा मन को एक स्थान पर रोकना। धारणा ध्यान की तैयारी है। धारणा में मन बार-बार भटकता। धारणा में प्रयास करना पड़ता। धारणा से एकाग्रता बढ़ती। धारणा अभ्यास से ध्यान बनती। धारणा प्रारंभिक अवस्था है। धारणा से ध्यान की ओर बढ़ें।

ध्यान - निरंतर प्रवाह

ध्यान धारणा का विकसित रूप है। ध्यान में मन स्थिर रहता है। ध्यान में चेतना का निरंतर प्रवाह। ध्यान में प्रयास कम होता है। ध्यान स्वाभाविक हो जाता है। ध्यान में गहरी शांति होती। ध्यान समाधि की ओर ले जाता। ध्यान आत्म साक्षात्कार का मार्ग।

समाधि - ध्यान का चरम

समाधि ध्यान की परम अवस्था है। समाधि में द्वैत समाप्त हो जाता। समाधि में आत्मा-परमात्मा एक हो जाते। समाधि परम आनंद की अवस्था। समाधि में समय-स्थान का बोध नहीं। समाधि मोक्ष का द्वार है। समाधि योग का लक्ष्य। समाधि परम उपलब्धि है।

सविकल्प समाधि

सविकल्प समाधि में विषय रहता है। सविकल्प में द्वैत थोड़ा रहता। सविकल्प में साधक-साध्य का भेद। सविकल्प समाधि प्रारंभिक अवस्था। सविकल्प में आनंद होता है। सविकल्प से निर्विकल्प की ओर बढ़ें। सविकल्प समाधि भी दुर्लभ। सविकल्प समाधि महान उपलब्धि।

निर्विकल्प समाधि

निर्विकल्प समाधि परम अवस्था है। निर्विकल्प में कोई विषय नहीं। निर्विकल्प में पूर्ण एकता। निर्विकल्प में द्वैत समाप्त। निर्विकल्प में केवल सत्-चित्-आनंद। निर्विकल्प से वापसी कठिन। निर्विकल्प समाधि मोक्ष है। निर्विकल्प परम लक्ष्य है।

ध्यान के शारीरिक लाभ

ध्यान से रक्तचाप नियंत्रित होता। ध्यान हृदय को स्वस्थ रखता। ध्यान से तनाव दूर होता। ध्यान रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता। ध्यान से नींद अच्छी आती। ध्यान दर्द कम करता है। ध्यान शरीर को ऊर्जा देता। ध्यान दीर्घायु देता है।

ध्यान के मानसिक लाभ

ध्यान से मन शांत होता है। ध्यान एकाग्रता बढ़ाता है। ध्यान स्मरण शक्ति सुधारता। ध्यान रचनात्मकता बढ़ाता। ध्यान निर्णय क्षमता सुधारता। ध्यान आत्मविश्वास देता। ध्यान अवसाद दूर करता। ध्यान मन को संतुलित करता।

ध्यान के भावनात्मक लाभ

ध्यान से भावनाएं संतुलित होती हैं। ध्यान क्रोध कम करता है। ध्यान धैर्य बढ़ाता है। ध्यान प्रेम और करुणा जगाता। ध्यान भय दूर करता है। ध्यान चिंता मुक्त करता। ध्यान सकारात्मकता लाता। ध्यान आंतरिक शांति देता।

ध्यान के आध्यात्मिक लाभ

ध्यान से आत्म ज्ञान होता है। ध्यान आत्मा से जोड़ता है। ध्यान चेतना का विस्तार करता। ध्यान अंतर्दृष्टि देता है। ध्यान से कुंडलिनी जागृत होती। ध्यान समाधि की ओर ले जाता। ध्यान मोक्ष का मार्ग है। ध्यान परम लक्ष्य तक पहुंचाता।

ध्यान और दैनिक जीवन

ध्यान को जीवन में उतारें। ध्यान केवल बैठने तक सीमित नहीं। हर कार्य में ध्यानपूर्वक रहें। वर्तमान में जीना ध्यान है। साक्षी भाव से जीना ध्यान। ध्यान जीवन शैली बने। ध्यान से जीवन बदल जाता। ध्यान जीवन को सुंदर बनाता।

चलते हुए ध्यान

चलते समय भी ध्यान कर सकते हैं। कदमों पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे सजगता से चलें। श्वास पर ध्यान रखें। चलना ध्यान बन सकता है। चलते ध्यान सक्रिय विधि है। चलते ध्यान शरीर और मन दोनों को साधता। चलते ध्यान दैनिक जीवन में उपयोगी।

कर्म में ध्यान

हर कर्म ध्यानपूर्वक करें। कर्म करते समय पूर्ण उपस्थित रहें। कर्म में एकाग्र रहें। कर्म को पूजा समझें। कर्म में ध्यान कर्म योग है। कर्म में ध्यान गृहस्थों के लिए उत्तम। कर्म में ध्यान से कर्म सुंदर बनता। कर्म में ध्यान जीवन को बदलता।

ध्यान और गुरु

गुरु ध्यान में मार्गदर्शक हैं। गुरु ध्यान की गहराइयां सिखाते। गुरु बाधाओं से पार करवाते। गुरु की कृपा से ध्यान सिद्ध होता। गुरु का ध्यान करना शक्तिशाली। गुरु के बिना ध्यान कठिन। गुरु ध्यान में सहारा हैं। गुरु ध्यान को परिपूर्ण बनाते।

ध्यान में धैर्य

ध्यान में धैर्य अत्यंत आवश्यक। तुरंत परिणाम की अपेक्षा न करें। ध्यान धीरे-धीरे फलदायी होता। नियमित अभ्यास जारी रखें। असफलता से निराश न हों। धैर्य से सब सिद्ध होता है। धैर्य ध्यान का मूल है। धैर्य से ध्यान गहरा होता।

ध्यान में नियमितता

नियमितता ध्यान की कुंजी है। प्रतिदिन ध्यान करें। एक भी दिन न छोड़ें। नियमित समय पर ध्यान करें। नियमितता से आदत बनती है। नियमितता से प्रगति होती। नियमितता अनुशासन सिखाती। नियमितता से ध्यान सिद्ध होता।

ध्यान और आहार

सात्विक आहार ध्यान में सहायक। हल्का और पौष्टिक भोजन करें। ध्यान से पहले भारी भोजन न करें। शुद्ध शाकाहारी भोजन उत्तम। मादक पदार्थों से बचें। ताजा और सादा भोजन लें। आहार शुद्धि से मन शुद्ध होता। सात्विक आहार ध्यान को गहरा करता।

ध्यान और निद्रा

पर्याप्त नींद ध्यान के लिए जरूरी। रात्रि में 7-8 घंटे सोएं। नींद पूरी न हो तो ध्यान में नींद आती। नियमित समय पर सोएं। जल्दी सोएं, जल्दी उठें। गहरी नींद से मन तरोताजा रहता। अच्छी नींद ध्यान को सुगम बनाती। नींद और ध्यान दोनों आवश्यक।

ध्यान का लक्ष्य

ध्यान का लक्ष्य आत्म साक्षात्कार है। ध्यान का लक्ष्य समाधि है। ध्यान का लक्ष्य मोक्ष है। ध्यान का लक्ष्य परम शांति। ध्यान का लक्ष्य आत्मा-परमात्मा का मिलन। लक्ष्य को ध्यान में रखें। लक्ष्य से प्रेरणा मिलती है। लक्ष्य की ओर धीरे-धीरे बढ़ें।

ध्यान - जीवन का सार

ध्यान जीवन जीने की कला है। ध्यान से जीवन सुंदर बनता। ध्यान आनंद का स्रोत है। ध्यान शांति का मार्ग है। ध्यान मुक्ति का साधन है। ध्यान सभी योगों का सार। ध्यान परम पुरुषार्थ है। ध्यान जीवन का परम लक्ष्य।

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गुरु शिक्षा

गुरु का महत्व और शिक्षाएं

गुरु का अर्थ

गुरु शब्द 'गु' और 'रु' से बना है। 'गु' का अर्थ अंधकार है। 'रु' का अर्थ प्रकाश है। गुरु अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। गुरु अज्ञान को मिटाते हैं। गुरु ज्ञान का प्रकाश देते हैं। गुरु मार्गदर्शक हैं। गुरु जीवन को दिशा देते हैं।

गुरु की आवश्यकता

आध्यात्मिक मार्ग कठिन और जटिल है। बिना गुरु के मार्ग भटकाने वाला। गुरु अनुभव से मार्ग दिखाते हैं। गुरु बाधाओं से बचाते हैं। गुरु शीघ्र प्रगति करवाते हैं। गुरु के बिना साधना अधूरी। गुरु आध्यात्मिक यात्रा में अनिवार्य। गुरु के बिना मोक्ष दुर्लभ।

सद्गुरु की पहचान

सद्गुरु आत्म साक्षात्कारी होते हैं। सद्गुरु निःस्वार्थ होते हैं। सद्गुरु में करुणा होती है। सद्गुरु शास्त्र ज्ञानी होते हैं। सद्गुरु का जीवन आदर्श होता। सद्गुरु शिष्य को समझते हैं। सद्गुरु धैर्यवान होते हैं। सद्गुरु मिलना परम सौभाग्य।

गुरु की खोज

शिष्य तैयार हो तो गुरु मिल जाते हैं। गुरु की खोज भीतर से शुरू होती। गुरु के प्रति श्रद्धा रखें। गुरु को परखें, अंधविश्वास न करें। सच्चे गुरु स्वयं प्रकट होते हैं। गुरु की खोज में धैर्य रखें। गुरु मिलना ईश्वर की कृपा। गुरु मिलने पर समर्पण करें।

गुरु-शिष्य का संबंध

गुरु-शिष्य संबंध पवित्रतम है। यह संबंध प्रेम पर आधारित। यह संबंध श्रद्धा पर टिका। गुरु पिता से बढ़कर हैं। शिष्य पुत्र से प्रिय है। यह संबंध जन्मों का है। यह संबंध आत्मिक है। यह संबंध मोक्ष तक ले जाता।

शिष्य के गुण

शिष्य में श्रद्धा होनी चाहिए। शिष्य विनम्र होना चाहिए। शिष्य में जिज्ञासा हो। शिष्य आज्ञाकारी हो। शिष्य सेवाभावी हो। शिष्य धैर्यवान हो। शिष्य समर्पित हो। शिष्य साधना में तत्पर हो।

गुरु सेवा

गुरु सेवा सर्वोत्तम साधना है। गुरु सेवा से अहंकार मिटता। गुरु सेवा प्रेम से करें। गुरु सेवा में कोई अपेक्षा नहीं। गुरु सेवा तन-मन से करें। गुरु सेवा से कृपा मिलती। गुरु सेवा शिष्य को तैयार करती। गुरु सेवा मोक्ष का मार्ग।

गुरु दीक्षा

दीक्षा गुरु का आशीर्वाद है। दीक्षा से आध्यात्मिक यात्रा शुरू होती। दीक्षा में गुरु मंत्र देते हैं। दीक्षा से शक्ति का संचार होता। दीक्षा गुरु-शिष्य को जोड़ती। दीक्षा पवित्र संस्कार है। दीक्षा जीवन बदल देती। दीक्षा परम सौभाग्य है।

गुरु मंत्र

गुरु मंत्र अत्यंत शक्तिशाली होता। गुरु मंत्र में गुरु की शक्ति होती। गुरु मंत्र गोपनीय रखें। गुरु मंत्र का नियमित जाप करें। गुरु मंत्र से कुंडलिनी जागती। गुरु मंत्र रक्षा करता है। गुरु मंत्र साधना का आधार। गुरु मंत्र मोक्ष दिलाता।

गुरु की कृपा

गुरु की कृपा सर्वोपरि है। गुरु कृपा से सब संभव। गुरु कृपा से बाधाएं दूर होतीं। गुरु कृपा से साधना सिद्ध होती। गुरु कृपा से ज्ञान मिलता। गुरु कृपा से समाधि लगती। गुरु कृपा से मोक्ष मिलता। गुरु कृपा परम आवश्यक।

गुरु की शिक्षा पद्धति

गुरु हर शिष्य को अलग सिखाते। गुरु शिष्य की क्षमता समझते हैं। गुरु धीरे-धीरे ज्ञान देते हैं। गुरु अनुभव से सिखाते हैं। गुरु कभी कठोर, कभी कोमल। गुरु परीक्षा भी लेते हैं। गुरु की शिक्षा जीवन भर चलती। गुरु शिष्य को परिपूर्ण बनाते।

गुरु का आशीर्वाद

गुरु का आशीर्वाद अमूल्य है। गुरु आशीर्वाद से जीवन सफल होता। गुरु आशीर्वाद रक्षा कवच है। गुरु आशीर्वाद बाधाएं दूर करता। गुरु आशीर्वाद शक्ति देता। गुरु आशीर्वाद मार्ग सुगम बनाता। गुरु आशीर्वाद सदा साथ रहता। गुरु आशीर्वाद परम धन।

गुरु और ईश्वर

गुरु ईश्वर का साकार रूप हैं। गुरु ईश्वर से मिलाते हैं। गुरु ईश्वर की कृपा हैं। गुरु के बिना ईश्वर दूर हैं। गुरु ईश्वर का प्रतिनिधि हैं। गुरु में ईश्वर को देखें। गुरु की पूजा ईश्वर पूजा है। गुरु और ईश्वर एक हैं।

गुरु वंदना

प्रतिदिन गुरु को प्रणाम करें। गुरु का स्मरण करें। गुरु की फोटो पर फूल चढ़ाएं। गुरु मंत्र का जाप करें। गुरु के लिए प्रार्थना करें। गुरु की शिक्षाओं का पालन करें। गुरु वंदना से दिन शुभ होता। गुरु वंदना नित्य कर्म है।

गुरु पूर्णिमा का महत्व

गुरु पूर्णिमा व्यास जयंती है। इस दिन गुरु पूजा विशेष फलदायी। इस दिन गुरु को भेंट चढ़ाएं। इस दिन गुरु सेवा करें। इस दिन गुरु से आशीर्वाद लें। इस दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करें। गुरु पूर्णिमा पवित्र पर्व। गुरु पूर्णिमा भक्ति का दिन।

गुरु पूर्णिमा की विधि

प्रातः स्नान कर शुद्ध हों। गुरु की पूजा करें। गुरु को फल-फूल अर्पित करें। गुरु चरणों में प्रणाम करें। गुरु से आशीर्वाद लें। गुरु की शिक्षाओं का स्मरण करें। गुरु के लिए व्रत रखें। संध्या में गुरु आरती करें।

गुरु दक्षिणा

गुरु दक्षिणा कृतज्ञता का प्रतीक। गुरु जो मांगें वही दें। गुरु दक्षिणा श्रद्धा से दें। गुरु दक्षिणा में कंजूसी नहीं। गुरु दक्षिणा सेवा भी हो सकती। गुरु दक्षिणा समर्पण भी है। गुरु दक्षिणा परीक्षा भी है। गुरु दक्षिणा देना सौभाग्य।

गुरु की परीक्षा

गुरु शिष्य की परीक्षा लेते हैं। परीक्षा से शिष्य मजबूत बनता। परीक्षा में धैर्य रखें। परीक्षा में विश्वास न खोएं। परीक्षा गुरु का प्रेम है। परीक्षा से अहंकार टूटता। परीक्षा से शिष्य तैयार होता। परीक्षा उत्तीर्ण करें समर्पण से।

गुरु का मार्गदर्शन

गुरु हर कदम पर मार्गदर्शन देते। गुरु सही समय पर सलाह देते। गुरु भटकने नहीं देते। गुरु गलतियों से बचाते। गुरु मार्ग सुगम बनाते। गुरु का मार्गदर्शन अमूल्य। गुरु मार्गदर्शन पर विश्वास रखें। गुरु मार्गदर्शन से लक्ष्य मिलता।

गुरु की करुणा

गुरु की करुणा असीम है। गुरु शिष्य को पुत्र समान मानते। गुरु शिष्य के दुःख दूर करते। गुरु शिष्य की रक्षा करते। गुरु शिष्य को क्षमा करते। गुरु करुणा से शिष्य को उठाते। गुरु करुणा बिना शर्त है। गुरु करुणा मोक्ष दिलाती।

गुरु का अनुशासन

गुरु अनुशासन सिखाते हैं। गुरु नियम बनाते हैं। गुरु समय का पालन करवाते। गुरु अनुशासन प्रेम से देते। गुरु अनुशासन शिष्य के हित में। अनुशासन से शिष्य मजबूत बनता। अनुशासन साधना का आधार। गुरु अनुशासन मानें खुशी से।

गुरु का ज्ञान

गुरु का ज्ञान अनुभव से आता। गुरु शास्त्र और अनुभव दोनों जानते। गुरु ज्ञान धीरे-धीरे देते हैं। गुरु ज्ञान शिष्य की क्षमता अनुसार। गुरु ज्ञान जीवन बदल देता। गुरु ज्ञान अमृत समान। गुरु ज्ञान को जीवन में उतारें। गुरु ज्ञान परम धन है।

गुरु का त्याग

गुरु निःस्वार्थ होते हैं। गुरु शिष्य के लिए सब त्यागते। गुरु अपना समय देते हैं। गुरु अपनी ऊर्जा देते हैं। गुरु बदले में कुछ नहीं चाहते। गुरु का त्याग अतुलनीय। गुरु त्याग से प्रेरणा लें। गुरु त्याग के ऋणी रहें।

गुरु का धैर्य

गुरु अत्यंत धैर्यवान होते हैं। गुरु शिष्य की गलतियां सहते हैं। गुरु बार-बार समझाते हैं। गुरु कभी निराश नहीं होते। गुरु शिष्य पर विश्वास रखते। गुरु धैर्य से सिखाते हैं। गुरु धैर्य से प्रेरणा लें। गुरु धैर्य अनुकरणीय है।

गुरु की शक्ति

गुरु में दिव्य शक्ति होती है। गुरु शक्ति से शिष्य को जगाते। गुरु शक्ति संचार करते हैं। गुरु शक्ति से बाधाएं दूर होतीं। गुरु शक्ति से कुंडलिनी जागती। गुरु शक्ति अपार है। गुरु शक्ति का अनुभव करें। गुरु शक्ति मोक्ष दिलाती।

गुरु का प्रेम

गुरु का प्रेम निःस्वार्थ होता। गुरु प्रेम माता-पिता से बढ़कर। गुरु प्रेम बिना शर्त है। गुरु प्रेम शिष्य को बदल देता। गुरु प्रेम में कठोरता भी है। गुरु प्रेम शिष्य के हित में। गुरु प्रेम दिव्य है। गुरु प्रेम में समर्पण करें।

गुरु के प्रति श्रद्धा

श्रद्धा गुरु-शिष्य संबंध का आधार। श्रद्धा से गुरु कृपा मिलती। श्रद्धा से ज्ञान ग्रहण होता। श्रद्धा से साधना सिद्ध होती। श्रद्धा अंधविश्वास नहीं। श्रद्धा विवेकपूर्ण विश्वास है। श्रद्धा से गुरु प्रसन्न होते। श्रद्धा परम आवश्यक है।

गुरु के प्रति समर्पण

समर्पण गुरु भक्ति का चरम। समर्पण में अहंकार नहीं। समर्पण पूर्ण विश्वास है। समर्पण से गुरु कृपा बरसती। समर्पण से शीघ्र प्रगति होती। समर्पण कठिन लेकिन आवश्यक। समर्पण से मोक्ष मिलता। समर्पण परम साधना है।

गुरु आज्ञा का पालन

गुरु आज्ञा सर्वोपरि है। गुरु आज्ञा बिना प्रश्न मानें। गुरु आज्ञा में शिष्य का हित। गुरु आज्ञा से साधना सिद्ध होती। गुरु आज्ञा पालन से कृपा मिलती। गुरु आज्ञा तोड़ना पाप है। गुरु आज्ञा में शक्ति है। गुरु आज्ञा पालन परम धर्म।

गुरु के बिना भटकाव

बिना गुरु मार्ग अंधकारमय है। बिना गुरु भटकाव निश्चित। बिना गुरु प्रगति धीमी। बिना गुरु बाधाएं अधिक। बिना गुरु समय व्यर्थ होता। बिना गुरु लक्ष्य दूर रहता। बिना गुरु मोक्ष कठिन। गुरु अवश्य खोजें।

गुरु का संरक्षण

गुरु शिष्य की रक्षा करते हैं। गुरु बाधाओं से बचाते हैं। गुरु संकट में साथ देते हैं। गुरु सूक्ष्म रूप से रक्षा करते। गुरु का संरक्षण सदा साथ। गुरु संरक्षण अदृश्य कवच। गुरु संरक्षण में निश्चिंत रहें। गुरु संरक्षण परम सुरक्षा।

गुरु की उपस्थिति

गुरु सदा शिष्य के साथ हैं। गुरु दूर होकर भी पास हैं। गुरु सूक्ष्म रूप में उपस्थित। गुरु हृदय में विराजते हैं। गुरु की उपस्थिति अनुभव करें। गुरु उपस्थिति शक्ति देती। गुरु उपस्थिति में ध्यान करें। गुरु उपस्थिति सदा अनुभव होती।

गुरु का आदर

गुरु का सदा आदर करें। गुरु के सामने विनम्र रहें। गुरु से ऊंची आवाज में न बोलें। गुरु के आसन पर न बैठें। गुरु को सदा प्रणाम करें। गुरु आदर से प्रसन्न होते। गुरु आदर शिष्य का धर्म। गुरु आदर कृपा का द्वार।

गुरु का सान्निध्य

गुरु सान्निध्य परम सौभाग्य। गुरु सान्निध्य में रहने का प्रयास करें। गुरु सान्निध्य शीघ्र प्रगति देता। गुरु सान्निध्य में ऊर्जा मिलती। गुरु सान्निध्य शुद्धि करता। गुरु सान्निध्य तीर्थ समान। गुरु सान्निध्य का लाभ उठाएं। गुरु सान्निध्य अमूल्य है।

गुरु के चरण

गुरु चरण परम पवित्र हैं। गुरु चरणों में प्रणाम करें। गुरु चरण स्पर्श से पुण्य मिलता। गुरु चरणों में समर्पण करें। गुरु चरण धूलि माथे लगाएं। गुरु चरणों की सेवा करें। गुरु चरण शरणागति है। गुरु चरण मोक्ष का द्वार।

गुरु वाणी

गुरु वाणी अमृत समान है। गुरु वाणी को ध्यान से सुनें। गुरु वाणी में गहरा अर्थ होता। गुरु वाणी पर मनन करें। गुरु वाणी जीवन में उतारें। गुरु वाणी शक्तिशाली होती। गुरु वाणी का पालन करें। गुरु वाणी मार्गदर्शक है।

गुरु का स्मरण

सदा गुरु का स्मरण रखें। प्रातः उठते ही गुरु स्मरण करें। हर कार्य में गुरु स्मरण करें। संकट में गुरु स्मरण करें। गुरु स्मरण से शक्ति मिलती। गुरु स्मरण रक्षा करता। गुरु स्मरण मन शांत करता। गुरु स्मरण नित्य कर्म बनाएं।

गुरु कृपा प्राप्ति

गुरु कृपा सेवा से मिलती। गुरु कृपा श्रद्धा से मिलती। गुरु कृपा समर्पण से मिलती। गुरु कृपा आज्ञा पालन से मिलती। गुरु कृपा विनम्रता से मिलती। गुरु कृपा साधना से मिलती। गुरु कृपा प्रार्थना से मिलती। गुरु कृपा सब कुछ है।

गुरु - मोक्ष के द्वार

गुरु मोक्ष का मार्ग दिखाते। गुरु बंधनों से मुक्त करते। गुरु आत्म ज्ञान देते हैं। गुरु समाधि में ले जाते। गुरु परमात्मा से मिलाते। गुरु के बिना मोक्ष असंभव। गुरु मोक्ष के द्वार हैं। गुरु शरण में मोक्ष निश्चित।

गुरु महिमा अपार

गुरु महिमा शब्दों में अवर्णनीय। गुरु महिमा अनंत है। गुरु महिमा का गान करें। गुरु महिमा पर ध्यान करें। गुरु महिमा अनुभव से जानें। गुरु महिमा जीवन बदल देती। गुरु महिमा परम सत्य। गुरु महिमा को नमन।

दिव्य ज्ञान

आध्यात्मिक और दिव्य ज्ञान

आत्मा का स्वरूप

आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है। आत्मा न जन्म लेती न मरती। आत्मा शुद्ध चेतना है। आत्मा सर्वव्यापी है। आत्मा परमात्मा का अंश। आत्मा शरीर से भिन्न है। आत्मा ज्ञान का स्रोत। आत्मा को जानना ही मोक्ष।

परमात्मा का स्वरूप

परमात्मा सर्वशक्तिमान है। परमात्मा सर्वव्यापी है। परमात्मा निराकार और साकार दोनों। परमात्मा सृष्टि का कारण। परमात्मा अनंत है। परमात्मा प्रेम स्वरूप। परमात्मा सत्य-चित्-आनंद। परमात्मा परम लक्ष्य है।

जीव और ब्रह्म

जीव माया से आवृत आत्मा है। जीव अज्ञान में बंधा है। जीव और ब्रह्म मूलतः एक। अज्ञान से जीव भिन्न दिखता। ज्ञान से एकत्व का बोध होता। जीव ब्रह्म बनने की यात्रा पर। यही आध्यात्मिक साधना है। एकत्व बोध ही मुक्ति।

अद्वैत का सिद्धांत

अद्वैत का अर्थ - द्वैत नहीं। केवल एक ब्रह्म ही सत्य। सब कुछ ब्रह्म का प्रकाश। द्वैत माया का भ्रम है। आत्मा-परमात्मा एक हैं। भेद केवल अज्ञान से। ज्ञान से अद्वैत का बोध। अद्वैत परम सत्य है।

माया की तीन शक्तियां

माया की तीन शक्तियां - आवरण, विक्षेप, प्रक्षेप। आवरण सत्य को ढकती है। विक्षेप मन को भटकाती। प्रक्षेप असत्य को सत्य दिखाती। माया से जगत की उत्पत्ति। माया ईश्वर की शक्ति है। माया से मुक्ति ही लक्ष्य। ज्ञान माया को नष्ट करता।

त्रिगुण - सत्व, रजस, तमस

प्रकृति तीन गुणों से बनी। सत्व - शुद्धता, ज्ञान, प्रकाश। रजस - क्रिया, इच्छा, गति। तमस - अज्ञान, आलस्य, अंधकार। सभी में तीनों गुण हैं। गुणों का संतुलन आवश्यक। सत्व गुण बढ़ाना लक्ष्य। गुणातीत होना परम अवस्था।

पंच कोश

अन्नमय कोश - स्थूल शरीर। प्राणमय कोश - प्राण शक्ति। मनोमय कोश - मन और इंद्रियां। विज्ञानमय कोश - बुद्धि और अहंकार। आनंदमय कोश - आनंद की परत। आत्मा इन सबसे परे। कोशों को पार करना साधना। आत्मा तक पहुंचना लक्ष्य।

मूलाधार चक्र

मूलाधार रीढ़ के आधार पर। रंग लाल, तत्व पृथ्वी। कुंडलिनी यहां सुप्त रहती। चार पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'लं'। स्थिरता और सुरक्षा का केंद्र। मूलाधार जागरण से भय दूर होता। यहां से आध्यात्मिक यात्रा शुरू। मूलाधार साधना का आधार।

स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान नाभि के नीचे। रंग नारंगी, तत्व जल। छह पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'वं'। रचनात्मकता का केंद्र। भावनाओं का स्थान। स्वाधिष्ठान जागरण से आनंद। इच्छा शक्ति यहां निवास करती। स्वाधिष्ठान संतुलन आवश्यक।

मणिपुर चक्र

मणिपुर नाभि पर स्थित। रंग पीला, तत्व अग्नि। दस पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'रं'। शक्ति और इच्छा का केंद्र। पाचन शक्ति यहां है। मणिपुर से आत्मविश्वास बढ़ता। यहां प्राण शक्ति संचित होती। मणिपुर जागरण से तेज आता।

अनाहत चक्र

अनाहत हृदय में स्थित। रंग हरा, तत्व वायु। बारह पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'यं'। प्रेम और करुणा का केंद्र। भक्ति यहां से जागती। अनाहत में दिव्य ध्वनि सुनाई देती। हृदय खुलने से प्रेम बढ़ता। अनाहत आध्यात्मिक हृदय है।

विशुद्ध चक्र

विशुद्ध कंठ में स्थित। रंग नीला, तत्व आकाश। सोलह पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'हं'। संचार और अभिव्यक्ति का केंद्र। शुद्धि का स्थान। विशुद्ध से वाणी शक्ति बढ़ती। सत्य बोलने की शक्ति यहां। विशुद्ध जागरण से दिव्य वाणी।

आज्ञा चक्र

आज्ञा भ्रूमध्य में स्थित। रंग नीला-बैंगनी, तीसरी आंख। दो पंखुड़ियां, बीज मंत्र 'ॐ'। ज्ञान और अंतर्दृष्टि का केंद्र। गुरु आज्ञा यहां मिलती। आज्ञा जागरण से दिव्य दृष्टि। अंतर्ज्ञान यहां से आता। आज्ञा चक्र अत्यंत महत्वपूर्ण।

सहस्रार चक्र

सहस्रार मस्तिष्क के शिखर पर। रंग बैंगनी या सफेद। हजार पंखुड़ियां, परम चेतना। कुंडलिनी का अंतिम गंतव्य। सहस्रार में समाधि लगती। यहां शिव-शक्ति मिलन होता। सहस्रार जागरण परम अनुभव। सहस्रार में मोक्ष मिलता।

कुंडलिनी जागरण

कुंडलिनी सर्प शक्ति है। मूलाधार में साढ़े तीन लपेट में सुप्त। योग साधना से जागती है। चक्रों को भेदती ऊपर जाती। प्रत्येक चक्र पर दिव्य अनुभव। सहस्रार में शिव से मिलन। कुंडलिनी जागरण परम अनुभव। गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य है।

नाड़ी तंत्र

शरीर में 72,000 नाड़ियां। इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना मुख्य। इड़ा चंद्र नाड़ी, बाईं ओर। पिंगला सूर्य नाड़ी, दाहिनी ओर। सुषुम्ना मध्य में, कुंडलिनी का मार्ग। नाड़ी शुद्धि आवश्यक है। प्राणायाम से नाड़ी शुद्धि होती। नाड़ी शुद्धि से प्राण प्रवाह सुगम।

प्राण और उसके प्रकार

प्राण जीवन शक्ति है। पांच मुख्य प्राण - प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान। प्राण हृदय में, श्वास का नियंत्रण। अपान नीचे, उत्सर्जन का कार्य। समान नाभि में, पाचन करता। उदान कंठ में, ऊर्ध्व गति। व्यान पूरे शरीर में व्याप्त। प्राण नियंत्रण से सिद्धि मिलती।

ॐ का रहस्य

ॐ प्रणव मंत्र है। ॐ ब्रह्म का प्रतीक। अ-उ-म तीन ध्वनियां। अ - जागृत अवस्था, ब्रह्मा। उ - स्वप्न अवस्था, विष्णु। म - सुषुप्ति अवस्था, शिव। ॐ तुरीय अवस्था का प्रतीक। ॐ जाप से चित्त शुद्ध होता। ॐ सर्वोच्च मंत्र है।

मंत्र विज्ञान

मंत्र ध्वनि की शक्ति है। मंत्र में दिव्य कंपन होता। मंत्र जाप से चित्त शुद्ध होता। मंत्र गुरु से प्राप्त करें। मंत्र का नियमित जाप करें। मंत्र गोपनीय रखें। मंत्र सिद्धि से शक्ति मिलती। मंत्र साधना का महत्वपूर्ण अंग।

यंत्र विज्ञान

यंत्र ज्यामितीय आकृति है। यंत्र देवता का प्रतीक। यंत्र में दिव्य शक्ति होती। श्री यंत्र सर्वोच्च यंत्र। यंत्र पर ध्यान करें। यंत्र पूजा शक्तिशाली है। यंत्र साधना से सिद्धि मिलती। यंत्र तंत्र का महत्वपूर्ण अंग।

तंत्र का रहस्य

तंत्र शक्ति उपासना है। तंत्र में शिव-शक्ति पूजा। तंत्र गुप्त विद्या है। तंत्र में मंत्र, यंत्र, साधना। तंत्र शीघ्र फल देता। तंत्र में गुरु अनिवार्य। तंत्र का दुरुपयोग खतरनाक। सही तंत्र साधना मोक्षदायी।

समाधि की अवस्थाएं

समाधि ध्यान की चरम अवस्था। सविकल्प समाधि - विचार के साथ। निर्विकल्प समाधि - विचार रहित। सहज समाधि - सदा की अवस्था। समाधि में आत्म साक्षात्कार। समाधि में परमानंद अनुभव। समाधि योग का लक्ष्य। समाधि से मुक्ति मिलती।

तुरीय अवस्था

तीन अवस्थाएं - जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति। तुरीय चौथी अवस्था है। तुरीय में शुद्ध चेतना। तुरीय में द्वैत नहीं। तुरीय में आत्मा का अनुभव। तुरीय समाधि की अवस्था। तुरीय में परम शांति। तुरीय परम लक्ष्य है।

सत्-चित्-आनंद

ब्रह्म का स्वरूप सत्-चित्-आनंद। सत् - शाश्वत सत्य, अस्तित्व। चित् - चेतना, ज्ञान। आनंद - परम आनंद, प्रेम। यह ब्रह्म की परिभाषा। यह आत्मा का स्वभाव। यह परम अनुभव है। यह मोक्ष की अवस्था।

अहं ब्रह्मास्मि

"अहं ब्रह्मास्मि" - मैं ब्रह्म हूं। यह महावाक्य है। यह आत्म साक्षात्कार का सूत्र। यह अद्वैत का सार। इस पर ध्यान करें। इसका अनुभव करें। यह परम सत्य है। यह मुक्ति का मार्ग।

तत्त्वमसि

"तत्त्वमसि" - तू वह है। यह महावाक्य है। तू (जीव) वह (ब्रह्म) है। जीव और ब्रह्म एक हैं। यह गुरु का उपदेश। यह आत्म ज्ञान का सूत्र। इस पर मनन करें। यह मुक्ति दिलाता।

प्रज्ञानं ब्रह्म

"प्रज्ञानं ब्रह्म" - चेतना ब्रह्म है। यह महावाक्य है। शुद्ध चेतना ही ब्रह्म। चेतना सर्वव्यापी है। चेतना अविनाशी है। चेतना आत्मा का स्वरूप। इसका अनुभव करें। यह परम ज्ञान है।

अयमात्मा ब्रह्म

"अयमात्मा ब्रह्म" - यह आत्मा ब्रह्म है। यह महावाक्य है। आत्मा और ब्रह्म अभिन्न। यह वेदांत का सार। इस पर ध्यान करें। इसका साक्षात्कार करें। यह मोक्ष का मार्ग। यह परम सत्य है।

नेति नेति

"नेति नेति" - यह नहीं, यह नहीं। यह ब्रह्म जानने की विधि। ब्रह्म शब्दों से परे। ब्रह्म मन से परे। सब नकारकर ब्रह्म तक पहुंचें। यह विवेक की साधना। यह ज्ञान का मार्ग। नेति नेति से ब्रह्म मिलता।

साक्षी भाव

साक्षी द्रष्टा है, कर्ता नहीं। साक्षी सब देखता, अप्रभावित रहता। साक्षी आत्मा का स्वभाव। साक्षी भाव से विरक्ति आती। साक्षी भाव ध्यान में सहायक। साक्षी भाव से शांति मिलती। साक्षी भाव साधना है। साक्षी भाव मुक्ति दिलाता।

विवेक और वैराग्य

विवेक - नित्य-अनित्य का भेद। वैराग्य - अनित्य से विरक्ति। विवेक ज्ञान का आधार। वैराग्य मुक्ति का मार्ग। विवेक से सत्य दिखता। वैराग्य से आसक्ति छूटती। दोनों साधना में आवश्यक। दोनों से मोक्ष मिलता।

मुमुक्षुत्व

मुमुक्षुत्व - मोक्ष की तीव्र इच्छा। यह साधना का प्रथम चरण। मुमुक्षु साधक कहलाता। मुमुक्षुत्व से साधना में तीव्रता। मुमुक्षुत्व से विघ्न दूर होते। मुमुक्षुत्व गुरु को आकर्षित करता। मुमुक्षुत्व आवश्यक है। मुमुक्षुत्व से मोक्ष मिलता।

षट्संपत्ति

शम - मन का नियंत्रण। दम - इंद्रियों का नियंत्रण। उपरति - कर्तव्य पालन। तितिक्षा - सहनशीलता। श्रद्धा - विश्वास। समाधान - एकाग्रता। ये छह गुण साधक में होने चाहिए। षट्संपत्ति से साधना सिद्ध होती।

श्रवण, मनन, निदिध्यासन

श्रवण - गुरु से ज्ञान सुनना। मनन - ज्ञान पर चिंतन करना। निदिध्यासन - ज्ञान पर गहन ध्यान। यह ज्ञान योग की विधि। तीनों क्रमशः करें। श्रवण से समझ आती। मनन से दृढ़ता आती। निदिध्यासन से साक्षात्कार होता।

आत्म विचार

"मैं कौन हूं?" - यह प्रश्न पूछें। शरीर मैं नहीं हूं। मन मैं नहीं हूं। बुद्धि मैं नहीं हूं। मैं साक्षी चेतना हूं। मैं शुद्ध आत्मा हूं। आत्म विचार से ज्ञान होता। आत्म विचार मुक्ति दिलाता।

जीवन मुक्ति

जीवन मुक्त जीते जी मुक्त। जीवन मुक्त को द्वैत नहीं दिखता। जीवन मुक्त सदा आनंद में। जीवन मुक्त कर्म करता पर बंधता नहीं। जीवन मुक्त साक्षी भाव में रहता। जीवन मुक्त परम शांत। जीवन मुक्ति योग का लक्ष्य। जीवन मुक्त दूसरों को प्रेरित करता।

विदेह मुक्ति

विदेह मुक्ति शरीर त्याग के बाद। विदेह मुक्त पुनर्जन्म नहीं लेता। विदेह मुक्त ब्रह्म में लीन होता। विदेह मुक्ति परम मुक्ति। विदेह मुक्ति कैवल्य है। विदेह मुक्ति अंतिम लक्ष्य। विदेह मुक्ति से चक्र समाप्त। विदेह मुक्ति परम शांति।

कर्म का रहस्य

कर्म तीन प्रकार - संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण। संचित - संचित कर्म फल। प्रारब्ध - इस जन्म का भाग्य। क्रियमाण - वर्तमान कर्म। ज्ञान से संचित नष्ट होता। प्रारब्ध भोगना पड़ता। सत्कर्म से क्रियमाण शुद्ध होता। कर्म योग से मुक्ति मिलती।

पुनर्जन्म का सिद्धांत

आत्मा अमर है, शरीर नश्वर। मृत्यु के बाद नया जन्म। कर्म फल भोगने पुनर्जन्म। पिछले जन्म के संस्कार साथ आते। पुनर्जन्म विकास की यात्रा। पुनर्जन्म से न्याय मिलता। मोक्ष से पुनर्जन्म समाप्त। पुनर्जन्म सत्य है।

दिव्य दृष्टि

दिव्य दृष्टि तीसरी आंख से। दिव्य दृष्टि से सूक्ष्म दिखता। दिव्य दृष्टि से भूत-भविष्य दिखता। दिव्य दृष्टि से आभा मंडल दिखता। दिव्य दृष्टि साधना से मिलती। दिव्य दृष्टि सिद्धि है। दिव्य दृष्टि का दुरुपयोग न करें। दिव्य दृष्टि आध्यात्मिक उपहार।

दिव्य श्रवण

दिव्य श्रवण सूक्ष्म ध्वनि सुनना। अनाहत नाद सुनाई देता। ॐ की ध्वनि सुनाई देती। दिव्य संगीत सुनाई देता। दिव्य श्रवण ध्यान में मिलता। दिव्य श्रवण से समाधि लगती। दिव्य श्रवण नाद योग है। दिव्य श्रवण परम अनुभव।

दिव्य ज्ञान की प्राप्ति

दिव्य ज्ञान गुरु से मिलता। दिव्य ज्ञान साधना से मिलता। दिव्य ज्ञान ध्यान से मिलता। दिव्य ज्ञान अनुभव से आता। दिव्य ज्ञान जीवन बदल देता। दिव्य ज्ञान मुक्ति दिलाता। दिव्य ज्ञान परम लक्ष्य। दिव्य ज्ञान को जीवन में उतारें।

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आत्म ज्ञान

आत्मा का ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार

आत्मा की पांच विशेषताएं

आत्मा सत् है - सदा विद्यमान। आत्मा चित् है - चेतन स्वरूप। आत्मा आनंद है - आनंद स्वरूप। आत्मा निर्विकार है - परिवर्तन रहित। आत्मा निर्गुण है - गुणों से परे। ये पांच आत्मा के मूल लक्षण हैं।

आत्मा और मन का भेद

मन परिवर्तनशील है, आत्मा स्थिर। मन विचारों का समूह, आत्मा साक्षी। मन उपकरण है, आत्मा उपयोगकर्ता। मन नश्वर, आत्मा अविनाशी। मन को आत्मा से अलग जानें। यह विवेक ज्ञान का आधार है।

आत्मा और बुद्धि

बुद्धि निर्णय करती है, आत्मा द्रष्टा है। बुद्धि आत्मा का प्रतिबिंब है। बुद्धि में चेतना आत्मा से आती। बुद्धि उपकरण, आत्मा स्रोत। शुद्ध बुद्धि आत्मा को प्रतिबिंबित करती। बुद्धि शुद्धि से आत्म ज्ञान होता।

आत्मा और अहंकार

अहंकार "मैं" का भाव है। अहंकार आत्मा को देह मानता। अहंकार अज्ञान का परिणाम। अहंकार बंधन का कारण। आत्मा अहंकार से परे है। अहंकार विसर्जन से आत्मा प्रकट होती। अहंकार त्याग आवश्यक है।

आत्मा का आकार

आत्मा निराकार है, आकार रहित। आत्मा सर्वव्यापी है, सब में व्याप्त। आत्मा अणु से भी सूक्ष्म। आत्मा ब्रह्मांड से भी विशाल। आत्मा स्थान-काल से परे। आत्मा अनंत है। आत्मा का कोई परिमाण नहीं।

आत्मा और प्रकाश

आत्मा स्वयं प्रकाशित है। आत्मा को प्रकाश की आवश्यकता नहीं। आत्मा सब को प्रकाशित करती। सूर्य भी आत्मा से प्रकाशित। आत्मा ज्ञान का प्रकाश है। आत्मा अंधकार को दूर करती। आत्मा परम ज्योति है।

आत्मा की शुद्धता

आत्मा सदा शुद्ध है। आत्मा को मल नहीं लगता। पाप-पुण्य आत्मा को छूते नहीं। आत्मा निर्मल दर्पण जैसी। अज्ञान से आत्मा ढकी दिखती। ज्ञान से शुद्धता प्रकट होती। आत्मा की शुद्धता शाश्वत है।

आत्मा और चेतना

आत्मा शुद्ध चेतना है। चेतना आत्मा का स्वभाव। आत्मा सदा जागरूक है। आत्मा स्वयं चैतन्य है। चेतना से सब जीवित है। चेतना सर्वव्यापी है। आत्मा और चेतना अभिन्न। चेतना ही परम सत्य है।

आत्मा का अनुभव

आत्मा अनुभव से जानी जाती। आत्मा शब्दों से परे है। आत्मा मन से परे है। आत्मा प्रत्यक्ष अनुभव है। ध्यान में आत्मा का अनुभव होता। समाधि में आत्मा प्रकट होती। आत्मानुभव परम आनंद है। आत्मानुभव ही सत्य ज्ञान।

आत्मा और ब्रह्म का संबंध

आत्मा ब्रह्म का अंश है। आत्मा और ब्रह्म एक हैं। बूंद और समुद्र का संबंध। लहर और सागर का संबंध। आत्मा व्यष्टि, ब्रह्म समष्टि। मूलतः दोनों अभिन्न। यह अद्वैत का सार है।

आत्मा की स्वतंत्रता

आत्मा मूलतः स्वतंत्र है। आत्मा किसी से बंधी नहीं। बंधन केवल अज्ञान से। आत्मा सदा मुक्त है। ज्ञान से स्वतंत्रता का बोध। आत्मा की स्वतंत्रता शाश्वत। मुक्ति आत्मा का स्वभाव है।

आत्मा और कर्म

आत्मा कर्ता नहीं, साक्षी है। कर्म शरीर और मन से होते। आत्मा अकर्ता है। आत्मा कर्म फल से अप्रभावित। अज्ञान से आत्मा कर्ता लगती। ज्ञान से अकर्तृत्व का बोध। आत्मा सदा निर्लिप्त है।

आत्मा और भोक्ता

आत्मा भोक्ता नहीं है। सुख-दुःख मन के हैं। आत्मा सदा आनंद में है। आत्मा अप्रभावित रहती है। अज्ञान से आत्मा भोक्ता लगती। ज्ञान से अभोक्तृत्व का बोध। आत्मा सदा साक्षी भाव में।

आत्मा की एकता

सब में एक ही आत्मा है। आत्मा अद्वितीय है। बहुत शरीर, एक आत्मा। जैसे एक सूर्य, अनेक प्रतिबिंब। आत्मा की एकता परम सत्य। एकत्व बोध से प्रेम जागता। सब में आत्मा देखें। यही परम ज्ञान है।

आत्मा और प्रेम

आत्मा प्रेम स्वरूप है। सच्चा प्रेम आत्मा से आता। आत्मा सबसे प्रेम करती। आत्मा में द्वेष नहीं। आत्मा प्रेम का स्रोत। आत्म प्रेम परम प्रेम। आत्मा में सब प्रेमी हैं। प्रेम आत्मा का स्वभाव।

आत्मा और शांति

आत्मा परम शांति है। आत्मा में कोई विक्षोभ नहीं। आत्मा सदा स्थिर है। बाहरी शांति अस्थायी, आत्म शांति शाश्वत। आत्मा में विश्राम मिलता। आत्म शांति परम सुख। आत्मा में लीन होना शांति है।

आत्मा और आनंद

आत्मा आनंद स्वरूप है। आत्मा में परमानंद है। सांसारिक सुख क्षणिक, आत्मानंद शाश्वत। आत्मा आनंद का स्रोत। बाहर आनंद खोजना व्यर्थ। आत्मा में ही आनंद है। आत्मानंद परम लक्ष्य। आत्मानंद अनुभव करें।

आत्मा का साक्षीपन

आत्मा सब का साक्षी है। आत्मा देखती है, करती नहीं। आत्मा निष्पक्ष द्रष्टा है। आत्मा अप्रभावित रहती है। साक्षी भाव आत्मा का स्वभाव। साक्षी भाव से विरक्ति आती। साक्षी भाव में रहें। यही आत्म स्थिति है।

आत्मा और समय

आत्मा काल से परे है। आत्मा पर समय का प्रभाव नहीं। आत्मा सदा वर्तमान में है। आत्मा अतीत-भविष्य से मुक्त। आत्मा शाश्वत वर्तमान है। समय आत्मा को छू नहीं सकता। आत्मा कालातीत है।

आत्मा और स्थान

आत्मा स्थान से परे है। आत्मा सर्वत्र विद्यमान है। आत्मा किसी स्थान में बंधी नहीं। आत्मा देश-काल से मुक्त। आत्मा यहां भी, वहां भी। आत्मा सर्वव्यापी है। आत्मा स्थानातीत है।

आत्मा की अमरता

"नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि" - शस्त्र आत्मा को काट नहीं सकते। अग्नि जला नहीं सकती। जल गीला नहीं कर सकता। वायु सुखा नहीं सकती। आत्मा अविनाशी है। आत्मा सदा जीवित है। आत्मा की मृत्यु असंभव।

आत्मा और जन्म

आत्मा का जन्म नहीं होता। आत्मा अजन्मा है। जन्म केवल शरीर का। आत्मा सदा विद्यमान थी। आत्मा सदा रहेगी। जन्म-मृत्यु शरीर के हैं। आत्मा जन्म-मृत्यु से परे। आत्मा अजर-अमर है।

आत्मा और मृत्यु

आत्मा की मृत्यु नहीं होती। मृत्यु केवल शरीर की। आत्मा शरीर छोड़ती है। जैसे वस्त्र बदलना। आत्मा नए शरीर में जाती। आत्मा अमर है। मृत्यु से भय व्यर्थ। आत्मा सदा जीवित रहती।

आत्मा का प्रकाश

आत्मा ज्योतिर्मय है। आत्मा का प्रकाश अनंत। आत्मा सब को प्रकाशित करती। आत्मा अंधकार को दूर करती। आत्मा ज्ञान का दीपक। आत्मा में अज्ञान नहीं। आत्मा परम प्रकाश है। आत्मा को जानना प्रकाश पाना।

आत्मा की पूर्णता

आत्मा पूर्ण है। आत्मा में कोई कमी नहीं। आत्मा को कुछ चाहिए नहीं। आत्मा स्वयं पूर्ण है। पूर्णता आत्मा का स्वभाव। बाहर पूर्णता खोजना व्यर्थ। आत्मा में ही पूर्णता है। आत्मा परिपूर्ण है।

आत्मा और इच्छा

आत्मा निष्काम है। इच्छाएं मन की हैं। आत्मा को कुछ चाहिए नहीं। आत्मा पूर्ण है। इच्छा से बंधन होता। आत्मा इच्छा से परे। निष्काम भाव आत्मा का स्वभाव। इच्छा रहित होना आत्म स्थिति।

आत्मा और भय

आत्मा निर्भय है। भय अज्ञान से आता। आत्मा को कोई खतरा नहीं। आत्मा अविनाशी है। भय मन का विकार। आत्मा भय से परे। आत्म ज्ञान से भय दूर होता। आत्मा में रहना निर्भय होना।

आत्मा और दुःख

आत्मा दुःख रहित है। दुःख मन का है। आत्मा सदा आनंद में। आत्मा दुःख से अप्रभावित। दुःख अज्ञान का परिणाम। आत्मा ज्ञान से दुःख दूर होता। आत्मा में दुःख का स्थान नहीं। आत्मा परम सुख है।

आत्मा और सुख

आत्मा आनंद स्वरूप है। सांसारिक सुख क्षणिक। आत्मा का आनंद शाश्वत। बाहरी सुख आत्मा का प्रतिबिंब। सच्चा सुख आत्मा में है। आत्मा परम सुख का स्रोत। आत्मा में ही सुख खोजें। आत्मसुख परम लक्ष्य।

आत्मा की सर्वव्यापकता

आत्मा सर्वत्र है। आत्मा सब में व्याप्त। आत्मा कण-कण में। आत्मा जड़-चेतन में। आत्मा ब्रह्मांड में। आत्मा अणु में। आत्मा सर्वव्यापी है। सब में एक आत्मा देखें।

आत्मा और संसार

आत्मा संसार से परे है। संसार आत्मा में दिखता। आत्मा संसार से अप्रभावित। संसार माया, आत्मा सत्य। आत्मा संसार का आधार। संसार आत्मा को छू नहीं सकता। आत्मा संसारातीत है। आत्मा परम सत्य है।

आत्मा का अनुभव मार्ग

ध्यान से आत्मा का अनुभव। मौन में आत्मा प्रकट होती। एकांत में आत्मा मिलती। विचार शून्यता में आत्मा दिखती। गुरु कृपा से आत्मा जानी जाती। भक्ति से आत्मा प्राप्त होती। ज्ञान से आत्मा का बोध। आत्मानुभव परम लक्ष्य।

आत्मा और गुरु

गुरु आत्मा का मार्ग दिखाते। गुरु आत्म ज्ञान देते। गुरु आत्मा तक ले जाते। गुरु आत्मा के प्रतीक। गुरु कृपा से आत्मा प्रकट होती। गुरु बिना आत्म ज्ञान कठिन। गुरु आत्मा के द्वार खोलते। गुरु शरणागति आवश्यक है।

आत्मा और भक्ति

भक्ति से आत्मा मिलती। भक्ति आत्मा का मार्ग। भक्ति में आत्मा प्रकट होती। भक्ति आत्मा को शुद्ध करती। भक्ति से अहंकार गलता। भक्ति आत्म समर्पण है। भक्ति में आत्मा और परमात्मा मिलते। भक्ति परम मार्ग है।

आत्मा और ज्ञान

ज्ञान से आत्मा जानी जाती। आत्म ज्ञान परम ज्ञान। ज्ञान अज्ञान को दूर करता। ज्ञान से आत्मा प्रकट होती। ज्ञान आत्मा का प्रकाश। ज्ञान मुक्ति का मार्ग। आत्म ज्ञान जीवन का लक्ष्य। ज्ञान से आत्मा मिलती।

आत्मा और कर्म योग

निष्काम कर्म से आत्मा शुद्ध होती। कर्म योग आत्मा का मार्ग। कर्म में आत्मा भाव रखें। कर्म फल आत्मा को अर्पित करें। कर्म से अहंकार गलता। कर्म योग से आत्मा प्रकट होती। कर्म योग साधना है। कर्म योग से मुक्ति मिलती।

आत्मा और ध्यान योग

ध्यान से आत्मा का साक्षात्कार। ध्यान में आत्मा प्रकट होती। ध्यान आत्मा में लीन होना। ध्यान से मन शांत होता। ध्यान में आत्मा दिखती। ध्यान आत्म अनुभव का मार्ग। ध्यान योग परम साधना। ध्यान से आत्मा मिलती।

आत्मा और राज योग

राज योग आत्मा का विज्ञान। राज योग से आत्मा नियंत्रित होती। राज योग आठ अंगों का मार्ग। राज योग से समाधि लगती। राज योग में आत्मा प्रकट होती। राज योग परम योग। राज योग से मुक्ति मिलती। राज योग आत्म साक्षात्कार का मार्ग।

आत्मा की महिमा

आत्मा परम महान है। आत्मा सर्वोच्च सत्य। आत्मा ब्रह्म स्वरूप। आत्मा दिव्य है। आत्मा पवित्र है। आत्मा शक्तिशाली है। आत्मा अनंत है। आत्मा की महिमा अपार। आत्मा को जानना परम उपलब्धि। आत्मा ही सब कुछ है।

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वैदिक कला

प्राचीन भारतीय कला और शिल्प

मंदिर निर्माण के सिद्धांत

मंदिर वास्तु शास्त्र पर आधारित। मंदिर ब्रह्मांड का प्रतीक। गर्भगृह मंदिर का हृदय। शिखर आकाश की ओर। मंडप सभा स्थल। द्वार दिशाओं के अनुसार। मंदिर ऊर्जा केंद्र होते। मंदिर निर्माण पवित्र कार्य।

नागर शैली मंदिर

नागर शैली उत्तर भारत की। शिखर घुमावदार और ऊंचा। खजुराहो नागर शैली का उदाहरण। कोणार्क सूर्य मंदिर प्रसिद्ध। लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर में। नागर शैली में गर्भगृह महत्वपूर्ण। शिखर स्वर्ग का प्रतीक। नागर शैली अत्यंत भव्य।

द्रविड़ शैली मंदिर

द्रविड़ शैली दक्षिण भारत की। विमान पिरामिड आकार का। गोपुरम विशाल प्रवेश द्वार। मदुरै मीनाक्षी मंदिर प्रसिद्ध। तंजावुर बृहदेश्वर मंदिर भव्य। द्रविड़ मंदिर विशाल परिसर। मूर्तिकला अद्भुत। द्रविड़ शैली अनूठी है।

वेसर शैली मंदिर

वेसर नागर-द्रविड़ का मिश्रण। कर्नाटक में वेसर शैली प्रमुख। होयसलेश्वर मंदिर हलेबिड में। चेन्नकेशव मंदिर बेलूर में। वेसर में तारा आकार मंदिर। मूर्तिकला अत्यंत सूक्ष्म। वेसर शैली अनोखी है। वेसर कला का चमत्कार।

मंदिर की मूर्तिकला

मंदिर मूर्तियां जीवंत लगतीं। प्रत्येक मूर्ति का अर्थ है। देवी-देवताओं की मूर्तियां। नृत्य मुद्राओं में मूर्तियां। पौराणिक कथाओं का चित्रण। मूर्तिकला शिल्प कौशल का नमूना। पत्थर में जीवन फूंका गया। मूर्तिकला दिव्य कला है।

मंदिर के स्तंभ

मंदिर स्तंभ कला के नमूने। स्तंभों पर देवी-देवता उकेरे। संगीत स्तंभ विशेष हैं। स्तंभ बजने पर संगीत निकलता। हम्पी के स्तंभ प्रसिद्ध। स्तंभों में गणित का प्रयोग। स्तंभ मंदिर की शोभा। स्तंभ शिल्प अद्भुत है।

मंदिर की छत कला

मंदिर छतें कलात्मक हैं। छत पर देवताओं के चित्र। ज्यामितीय डिजाइन अद्भुत। रंगीन छतें मनमोहक। दिलवाड़ा मंदिर की छत प्रसिद्ध। संगमरमर की नक्काशी सूक्ष्म। छत कला अनुपम है। छत दर्शक को मंत्रमुग्ध करती।

गुफा मंदिर

गुफा मंदिर पहाड़ों में बने। अजंता-एलोरा विश्व प्रसिद्ध। एलीफेंटा गुफाएं मुंबई में। बादामी गुफाएं कर्नाटक में। गुफाओं में मूर्तियां उकेरी गईं। गुफा मंदिर प्राचीन हैं। गुफा कला अद्वितीय है। गुफा मंदिर आश्चर्यजनक हैं।

रथ मंदिर

रथ मंदिर रथ के आकार के। कोणार्क सूर्य मंदिर रथ रूप में। पत्थर के पहिए बने हैं। घोड़ों की मूर्तियां भव्य। महाबलीपुरम में पांच रथ। रथ मंदिर अनोखे हैं। रथ कला अद्भुत है। रथ मंदिर विश्व धरोहर।

शास्त्रीय संगीत का इतिहास

संगीत सामवेद से उत्पन्न। नारद मुनि संगीत के जनक। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र लिखा। तानसेन अकबर के नवरत्न। त्यागराज कर्नाटक संगीत के संत। संगीत परंपरा हजारों वर्ष पुरानी। संगीत आध्यात्मिक साधना। संगीत भारत की आत्मा।

राग का विज्ञान

राग स्वरों का समूह है। प्रत्येक राग का समय निर्धारित। राग मन को प्रभावित करते। राग भैरव प्रातःकाल का। राग यमन संध्या का। राग दीपक अग्नि प्रज्वलित करता। राग मल्हार वर्षा लाता। राग विज्ञान गहन है।

स्वर और सप्तक

सात स्वर - सा रे ग म प ध नि। तीन सप्तक - मंद्र, मध्य, तार। स्वर शुद्ध और कोमल होते। स्वर संयोजन से राग बनता। स्वर ब्रह्मांड की ध्वनि। स्वर चक्रों को जागृत करते। स्वर साधना शक्तिशाली है। स्वर विज्ञान अद्भुत है।

ताल का विज्ञान

ताल लय का नियम है। तीनताल सबसे प्रचलित। झपताल, रूपक, एकताल प्रमुख। ताल में मात्राएं होती हैं। ताल संगीत की नींव। ताल से लय बनती है। ताल नृत्य में भी महत्वपूर्ण। ताल विज्ञान सूक्ष्म है।

हिंदुस्तानी संगीत

हिंदुस्तानी उत्तर भारत का संगीत। ख्याल, ध्रुपद, ठुमरी प्रमुख। तानसेन, अमीर खुसरो महान संगीतकार। सितार, सरोद, तबला वाद्य। हिंदुस्तानी में आलाप महत्वपूर्ण। घराना परंपरा प्रसिद्ध। हिंदुस्तानी संगीत समृद्ध है।

कर्नाटक संगीत

कर्नाटक दक्षिण भारत का संगीत। त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितार महान। कृति, वर्णम प्रमुख रचनाएं। वीणा, मृदंगम प्रमुख वाद्य। कर्नाटक संगीत भक्ति प्रधान। तान पल्लवी विशेष है। कर्नाटक संगीत शास्त्रीय है। कर्नाटक परंपरा प्राचीन है।

भजन और कीर्तन

भजन भक्ति संगीत है। कीर्तन सामूहिक गायन। मीरा, सूरदास के भजन प्रसिद्ध। कबीर, तुलसीदास के पद। भजन हृदय को छूते हैं। कीर्तन में नाम संकीर्तन। भजन-कीर्तन आध्यात्मिक साधना। भजन आत्मा की पुकार।

वाद्य यंत्र - तंतु वाद्य

सितार सबसे प्रसिद्ध तंतु वाद्य। सरोद, वीणा, सारंगी प्रमुख। तानपुरा श्रुति देता है। संतूर कश्मीर का वाद्य। तंतु वाद्य तारों से बजते। तंतु वाद्य मधुर ध्वनि। तंतु वाद्य संगीत के आधार। तंतु वाद्य अनमोल हैं।

वाद्य यंत्र - सुषिर वाद्य

बांसुरी सबसे प्राचीन वाद्य। शहनाई मंगल वाद्य है। शंख पूजा में बजता। सुषिर वाद्य फूंक से बजते। बांसुरी कृष्ण का वाद्य। शहनाई बिस्मिल्लाह खान प्रसिद्ध। सुषिर वाद्य मधुर हैं। सुषिर वाद्य दिव्य ध्वनि।

वाद्य यंत्र - अवनद्ध वाद्य

तबला सबसे प्रचलित अवनद्ध वाद्य। मृदंगम दक्षिण का वाद्य। पखावज ध्रुपद में प्रयुक्त। ढोलक लोक संगीत में। अवनद्ध वाद्य चमड़े से ढके। ताल इन्हीं से बजती है। अवनद्ध वाद्य लय के स्रोत। अवनद्ध वाद्य संगीत की जान।

वाद्य यंत्र - घन वाद्य

घंटा, मंजीरा घन वाद्य हैं। करताल भजन में प्रयुक्त। झांझ मंदिरों में बजती। घन वाद्य धातु से बने। घन वाद्य टकराने से बजते। घन वाद्य ध्वनि तीव्र। घन वाद्य पूजा में उपयोगी। घन वाद्य शुभ माने जाते।

भरतनाट्यम नृत्य

भरतनाट्यम तमिलनाडु का नृत्य। भरतनाट्यम सबसे प्राचीन। नाट्यशास्त्र पर आधारित। अरैमंडी मूल मुद्रा है। भाव, राग, ताल का समन्वय। भरतनाट्यम मंदिर नृत्य था। भरतनाट्यम अत्यंत अनुशासित। भरतनाट्यम दिव्य नृत्य है।

कथक नृत्य

कथक उत्तर भारत का नृत्य। कथक कथा कहने की कला। चक्कर कथक की विशेषता। घुंघरू पैरों में बंधे। लखनऊ, जयपुर घराने प्रसिद्ध। कथक में तत्कार महत्वपूर्ण। कथक भक्ति और श्रृंगार रस। कथक नृत्य मनमोहक है।

ओडिसी नृत्य

ओडिसी ओडिशा का नृत्य। ओडिसी मंदिर नृत्य था। त्रिभंगी मुद्रा विशेष है। जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा। ओडिसी में भाव प्रधान। मूर्तिकला जैसी मुद्राएं। ओडिसी अत्यंत लास्यपूर्ण। ओडिसी नृत्य सुंदर है।

कुचिपुड़ी नृत्य

कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश का नृत्य। कुचिपुड़ी नाट्य शैली है। थाली पर नृत्य विशेष है। कुचिपुड़ी में अभिनय प्रमुख। कृष्ण लीला का चित्रण। कुचिपुड़ी तीव्र गति का नृत्य। कुचिपुड़ी नाटकीय है। कुचिपुड़ी नृत्य जीवंत है।

कथकली नृत्य

कथकली केरल का नृत्य नाटक। कथकली में विशाल वेशभूषा। चेहरे पर रंगीन मेकअप। कथकली में मुद्राएं विशेष। महाभारत, रामायण की कथाएं। कथकली पुरुष नर्तक करते। कथकली अत्यंत नाटकीय। कथकली नृत्य भव्य है।

मोहिनीअट्टम नृत्य

मोहिनीअट्टम केरल का नृत्य। मोहिनी का अर्थ मोहने वाली। मोहिनीअट्टम लास्य प्रधान। लहराती गति विशेष है। सफेद साड़ी में नृत्य। मोहिनीअट्टम स्त्रियों का नृत्य। मोहिनीअट्टम कोमल है। मोहिनीअट्टम मनमोहक नृत्य।

मणिपुरी नृत्य

मणिपुरी मणिपुर का नृत्य। मणिपुरी में रास लीला प्रसिद्ध। मणिपुरी अत्यंत कोमल नृत्य। पुंग (ढोल) साथ बजता। मणिपुरी में भक्ति भाव। वैष्णव परंपरा से जुड़ा। मणिपुरी नृत्य सुकुमार है। मणिपुरी नृत्य दिव्य है।

सत्त्रिया नृत्य

सत्त्रिया असम का नृत्य। सत्त्रिया सत्र (मठ) में विकसित। शंकरदेव ने परंपरा शुरू की। सत्त्रिया में कृष्ण लीला। सत्त्रिया पुरुष नर्तक करते। सत्त्रिया भक्ति प्रधान। सत्त्रिया नृत्य अनोखा है। सत्त्रिया आठवां शास्त्रीय नृत्य।

नृत्य की मुद्राएं

मुद्राएं हाथों की भाषा हैं। अभिनय मुद्राएं भाव व्यक्त करतीं। हस्त मुद्राएं अनेक हैं। पतक, त्रिपतक, अर्धचंद्र मुद्राएं। मुद्राओं से कथा कही जाती। मुद्राएं नाट्यशास्त्र में वर्णित। मुद्राएं नृत्य की भाषा। मुद्राएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

नृत्य में नवरस

नवरस - नौ भाव हैं। श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र। वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत। शांत रस नौवां रस। नृत्य में सभी रस दिखाए जाते। रस नृत्य की आत्मा हैं। रस दर्शक को प्रभावित करते। रस नृत्य को जीवंत बनाते।

अजंता की चित्रकला

अजंता गुफाओं में भित्ति चित्र। बुद्ध जीवन का चित्रण। अजंता चित्र 2000 वर्ष पुराने। रंग प्राकृतिक खनिजों से बने। अजंता चित्र अत्यंत सुंदर। अजंता विश्व धरोहर है। अजंता चित्रकला अद्वितीय। अजंता भारत का गौरव।

मधुबनी चित्रकला

मधुबनी बिहार की लोक कला। मधुबनी दीवारों पर बनती थी। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग। देवी-देवताओं का चित्रण। मधुबनी में ज्यामितीय डिजाइन। मधुबनी महिलाएं बनाती हैं। मधुबनी अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्ध। मधुबनी कला अनमोल है।

वारली चित्रकला

वारली महाराष्ट्र की जनजाति कला। वारली सफेद रंग से बनती। वारली में सरल आकृतियां। वृत्त, त्रिकोण, रेखाओं से चित्र। वारली दैनिक जीवन दिखाती। वारली प्रकृति से जुड़ी। वारली कला सरल पर सुंदर। वारली विश्व प्रसिद्ध है।

पट्टचित्र कला

पट्टचित्र ओडिशा की कला। पट्टचित्र कपड़े पर बनता। जगन्नाथ, राधा-कृष्ण का चित्रण। पट्टचित्र में बारीक रेखाएं। प्राकृतिक रंगों का प्रयोग। पट्टचित्र परंपरागत कला। पट्टचित्र अत्यंत सुंदर। पट्टचित्र धार्मिक कला है।

तंजौर चित्रकला

तंजौर तमिलनाडु की कला। तंजौर में सोने का प्रयोग। देवी-देवताओं के चित्र। तंजौर चित्र उभरे हुए। रत्नों से सजाए जाते। तंजौर चित्र भव्य होते। तंजौर कला शाही है। तंजौर चित्र अनमोल हैं।

राजस्थानी लघु चित्र

राजस्थानी लघु चित्र प्रसिद्ध। छोटे आकार में विस्तृत चित्रण। राजा-रानी, युद्ध के दृश्य। राधा-कृष्ण की लीलाएं। राजस्थानी चित्रों में रंगों की बहार। मेवाड़, बूंदी, किशनगढ़ शैलियां। लघु चित्र अत्यंत सूक्ष्म। लघु चित्र कला का चमत्कार।

मुगल चित्रकला

मुगल चित्रकला फारसी प्रभाव। अकबर के काल में विकसित। दरबार, शिकार के दृश्य। मुगल चित्रों में यथार्थवाद। सूक्ष्म चित्रण और रंग। मुगल चित्र पांडुलिपियों में। मुगल कला भारत-फारस मिश्रण। मुगल चित्रकला समृद्ध है।

कांगड़ा चित्रकला

कांगड़ा हिमाचल की कला। कांगड़ा में राधा-कृष्ण प्रमुख। कांगड़ा चित्र कोमल रंगों में। प्रकृति का सुंदर चित्रण। कांगड़ा में श्रृंगार रस। कांगड़ा चित्र मनमोहक। कांगड़ा शैली लोकप्रिय। कांगड़ा कला अनुपम है।

कला और आध्यात्मिकता

भारतीय कला आध्यात्मिक है। कला ईश्वर की आराधना। कला में दिव्यता का समावेश। कला साधना का माध्यम। कला से आत्मा की अभिव्यक्ति। कला मोक्ष का मार्ग। कला और धर्म अभिन्न। कला परम सत्य की खोज।

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सार्वभौम सत्य

शाश्वत और सार्वभौमिक सत्य

सर्वे भवन्तु सुखिनः

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः" - सभी सुखी हों, सभी रोगमुक्त हों। यह सार्वभौमिक प्रार्थना है। सबके कल्याण की कामना। यह मानवता का सार है। सनातन धर्म सबका हित चाहता। यह प्रार्थना विश्व शांति की। यह सत्य सार्वभौमिक है।

आत्मा अमर है

आत्मा कभी नहीं मरती। शरीर नश्वर, आत्मा अविनाशी। "न हन्यते हन्यमाने शरीरे" - शरीर मरने पर भी आत्मा नहीं मरती। आत्मा शाश्वत सत्य है। आत्मा परमात्मा का अंश। आत्मा ही जीवन का सार। आत्मा ज्ञान का स्रोत।

कर्म का सिद्धांत

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" - कर्म करो, फल की चिंता मत करो। कर्म ही धर्म है। अच्छे कर्म से अच्छा फल। बुरे कर्म से बुरा फल। कर्म का फल अवश्य मिलता। कर्म से ही मुक्ति। कर्म सार्वभौमिक नियम है।

धर्म की परिभाषा

धर्म का अर्थ कर्तव्य है। धर्म समाज को धारण करता। "धारणात् धर्म इत्याहुः" - जो धारण करे वह धर्म। धर्म सत्य का मार्ग। धर्म अहिंसा है। धर्म प्रेम है। धर्म सेवा है। धर्म जीवन का आधार।

माया का सिद्धांत

संसार माया है। माया भ्रम है। जो दिखता है वह सत्य नहीं। ब्रह्म ही सत्य है। माया से मोह होता। ज्ञान से माया नष्ट होती। माया परमात्मा की शक्ति। माया से मुक्ति ही लक्ष्य।

ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या

ब्रह्म ही एकमात्र सत्य। संसार मिथ्या है। संसार परिवर्तनशील है। ब्रह्म अपरिवर्तनीय है। ब्रह्म शाश्वत है। जगत नाशवान है। ब्रह्म ज्ञान ही मुक्ति। यह अद्वैत का सार।

सब में एक परमात्मा

"ईश्वरः सर्वभूतानां" - ईश्वर सभी प्राणियों में है। सभी में एक ही चेतना। भेद केवल शरीर का। आत्मा सबकी एक। परमात्मा सर्वव्यापी है। सबमें उसी को देखो। यह अद्वैत का सत्य। यह एकता का संदेश।

अनंत ब्रह्मांड

ब्रह्मांड अनंत है। असंख्य लोक हैं। पृथ्वी एक छोटा ग्रह। ब्रह्मांड में अनगिनत जीव। सृष्टि का कोई अंत नहीं। ब्रह्मांड चक्रीय है। सृष्टि और प्रलय चलते रहते। यह शाश्वत सत्य है।

काल चक्र

समय चक्राकार है। युग बदलते रहते हैं। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। कलियुग के बाद फिर सतयुग। समय का कोई आदि-अंत नहीं। समय ब्रह्म का स्वरूप। समय सबसे शक्तिशाली। समय सत्य है।

पुनर्जन्म का सिद्धांत

आत्मा बार-बार जन्म लेती। "वासांसि जीर्णानि" - जैसे पुराने वस्त्र बदलते। आत्मा शरीर बदलती है। कर्मों के अनुसार जन्म। पुनर्जन्म से मुक्ति संभव। मोक्ष अंतिम लक्ष्य। पुनर्जन्म सार्वभौमिक सत्य। यह न्याय का आधार।

मोक्ष - परम लक्ष्य

मोक्ष जन्म-मृत्यु से मुक्ति। मोक्ष परम आनंद है। मोक्ष ब्रह्म में विलीन होना। मोक्ष सभी बंधनों से मुक्ति। ज्ञान से मोक्ष मिलता। भक्ति से मोक्ष मिलता। कर्म से मोक्ष मिलता। मोक्ष जीवन का उद्देश्य।

त्रिगुण सिद्धांत

प्रकृति में तीन गुण हैं। सत्व, रजस, तमस। सत्व शुद्धता है। रजस क्रियाशीलता है। तमस जड़ता है। तीनों गुण सबमें हैं। गुणों का संतुलन आवश्यक। सत्व गुण श्रेष्ठ है। गुणातीत होना लक्ष्य।

पंच महाभूत

पांच तत्व - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। सृष्टि इन्हीं से बनी। शरीर भी पंच तत्व से। मृत्यु पर तत्वों में विलय। पंच तत्व प्रकृति के आधार। तत्वों का संतुलन जरूरी। तत्व ज्ञान महत्वपूर्ण। यह सृष्टि का रहस्य।

ॐ - प्रणव

ॐ सर्वोच्च मंत्र है। ॐ ब्रह्म का प्रतीक। ॐ सृष्टि की ध्वनि। अ-उ-म तीन ध्वनियां। ॐ में सब समाया। ॐ ध्यान का आधार। ॐ शक्तिशाली है। ॐ सार्वभौमिक सत्य।

सत्-चित्-आनंद

ब्रह्म सत्-चित्-आनंद स्वरूप। सत् अर्थात सत्य। चित् अर्थात चेतना। आनंद अर्थात परम सुख। यह ब्रह्म की परिभाषा। यह आत्मा का स्वभाव। यह परम लक्ष्य है। यह शाश्वत सत्य है।

अद्वैत - अभेद

सब एक हैं। द्वैत भ्रम है। आत्मा-परमात्मा एक। "तत्त्वमसि" - तू वही है। अद्वैत परम ज्ञान। अद्वैत से मुक्ति। अद्वैत शंकराचार्य का दर्शन। अद्वैत सत्य का साक्षात्कार।

द्वैत - भेद

जीव और ब्रह्म भिन्न। भक्ति में द्वैत आवश्यक। भक्त और भगवान का संबंध। द्वैत माधवाचार्य का दर्शन। द्वैत में प्रेम संभव। द्वैत भक्ति का आधार। द्वैत भी सत्य है। द्वैत-अद्वैत दोनों मार्ग।

विशिष्टाद्वैत

विशिष्ट अद्वैत रामानुज का दर्शन। जीव ब्रह्म का अंश। भेद और अभेद दोनों। विशिष्टाद्वैत मध्य मार्ग। भक्ति और ज्ञान दोनों। विशिष्टाद्वैत संतुलित दर्शन। यह भी सत्य का मार्ग। यह समन्वय का दर्शन।

ज्ञान मार्ग

ज्ञान से मुक्ति मिलती। आत्म-ज्ञान परम ज्ञान। "ज्ञानेन तु तद् अज्ञानम्" - ज्ञान से अज्ञान नष्ट। वेदांत ज्ञान का स्रोत। ध्यान से ज्ञान मिलता। गुरु ज्ञान देते हैं। ज्ञान मार्ग कठिन है। ज्ञान मुक्ति का मार्ग।

भक्ति मार्ग

भक्ति सरल मार्ग है। प्रेम से भगवान मिलते। "भक्त्या त्वनन्यया शक्यः" - अनन्य भक्ति से ही संभव। भक्ति में समर्पण आवश्यक। भक्ति सबके लिए है। भक्ति आनंद का मार्ग। भक्ति मोक्ष का मार्ग। भक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग।

कर्म मार्ग

निष्काम कर्म मुक्ति का मार्ग। कर्म करो, फल की इच्छा मत करो। कर्म योग गीता का संदेश। कर्म से चित्त शुद्ध होता। कर्म समाज सेवा है। कर्म ईश्वर की पूजा। कर्म मार्ग व्यावहारिक है। कर्म सबका धर्म।

योग - समाधि

योग आत्मा-परमात्मा का मिलन। "योगः चित्तवृत्ति निरोधः" - चित्त की वृत्तियों का निरोध। योग से मन शांत होता। समाधि योग का लक्ष्य। समाधि में ब्रह्म साक्षात्कार। योग आठ अंगों का। योग मुक्ति का मार्ग। योग सार्वभौमिक विज्ञान।

ध्यान की शक्ति

ध्यान आत्म-साक्षात्कार का साधन। ध्यान से मन एकाग्र होता। ध्यान में शांति मिलती। ध्यान से ज्ञान प्राप्त होता। ध्यान योग का अंग। ध्यान से चमत्कार संभव। ध्यान सबके लिए है। ध्यान जीवन बदल देता।

प्राण शक्ति

प्राण जीवन शक्ति है। प्राण से शरीर चलता। प्राणायाम प्राण नियंत्रण। प्राण पांच प्रकार के। प्राण ब्रह्मांडीय ऊर्जा। प्राण से चमत्कार संभव। प्राण योग का आधार। प्राण सार्वभौमिक शक्ति।

कुंडलिनी शक्ति

कुंडलिनी सुप्त शक्ति है। कुंडलिनी मूलाधार में सोई। योग से कुंडलिनी जागती। कुंडलिनी सात चक्रों से गुजरती। सहस्रार में ब्रह्म मिलन। कुंडलिनी जागरण खतरनाक हो सकता। गुरु मार्गदर्शन आवश्यक। कुंडलिनी परम शक्ति।

सात चक्र

शरीर में सात चक्र हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत। विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार चक्र। चक्र ऊर्जा केंद्र हैं। चक्र जागरण से शक्ति मिलती। चक्र योग का विज्ञान। चक्र ध्यान के केंद्र। चक्र रहस्यमय हैं।

मन की शक्ति

मन सबसे शक्तिशाली है। "मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः" - मन ही बंधन और मुक्ति का कारण। मन से सब संभव। मन नियंत्रण आवश्यक। मन शुद्ध होना चाहिए। मन ही ब्रह्म है। मन की शक्ति असीम। मन सृष्टि करता है।

संकल्प शक्ति

संकल्प से सब होता है। दृढ़ संकल्प चमत्कार करता। "यद् भावं तद् भवति" - जैसा भाव वैसा फल। संकल्प मन की शक्ति। संकल्प से भाग्य बदलता। संकल्प ध्यान से बढ़ता। संकल्प सिद्धि संभव। संकल्प शक्ति दिव्य है।

वाणी की शक्ति

वाणी ब्रह्म है। "वाग्देवी" - वाणी देवी है। शब्द सृष्टि करते हैं। मंत्र शब्द शक्ति हैं। वाणी से आशीर्वाद-श्राप। वाणी संयम आवश्यक। सत्य वाणी शक्तिशाली। वाणी सिद्धि संभव है।

तप की महिमा

तप से सब संभव। तप इंद्रियों का संयम। तप मन का नियंत्रण। तप से सिद्धियां मिलतीं। ऋषि-मुनि तप करते थे। तप से ब्रह्म प्राप्ति। तप कठिन साधना। तप परम शक्ति है।

त्याग का महत्व

त्याग मुक्ति का मार्ग। आसक्ति त्यागो। फल की इच्छा त्यागो। अहंकार त्यागो। त्याग से शांति मिलती। त्याग से मन हल्का होता। त्याग परम धर्म। त्याग मोक्ष का द्वार।

समर्पण का सिद्धांत

ईश्वर को समर्पण करो। "शरणागति" परम भक्ति। समर्पण में शक्ति है। समर्पण से भय नष्ट होता। समर्पण से शांति मिलती। समर्पण भक्ति का सार। समर्पण मुक्ति का मार्ग। समर्पण परम आनंद।

प्रेम परम सत्य

प्रेम ईश्वर है। प्रेम सबसे बड़ा धर्म। प्रेम में द्वैत नहीं। प्रेम से सब मिलता। प्रेम आत्मा का स्वभाव। प्रेम मुक्ति का मार्ग। प्रेम सार्वभौमिक है। प्रेम ही सत्य है।

करुणा और दया

करुणा परम धर्म है। दया सबसे बड़ा गुण। करुणा से हृदय शुद्ध होता। दया से पुण्य मिलता। करुणा बुद्ध का संदेश। दया ईश्वर का गुण। करुणा मानवता है। दया धर्म का आधार।

क्षमा की महिमा

क्षमा वीरों का गुण। क्षमा से शांति मिलती। क्षमा से मन हल्का होता। क्षमा प्रेम का प्रमाण। क्षमा बदला से श्रेष्ठ। क्षमा आत्मा को शुद्ध करती। क्षमा परम धर्म। क्षमा मुक्ति का मार्ग।

सेवा परमो धर्मः

सेवा सबसे बड़ा धर्म। सेवा में ईश्वर मिलते। "नर सेवा नारायण सेवा" - मानव सेवा ही ईश्वर सेवा। सेवा निस्वार्थ होनी चाहिए। सेवा से पुण्य मिलता। सेवा मुक्ति का मार्ग। सेवा जीवन का उद्देश्य।

संतोष परम सुख

संतोष सबसे बड़ा धन। संतोष से शांति मिलती। संतोष में आनंद है। असंतोष दुःख का कारण। संतोष योग का अंग। संतोष से मन प्रसन्न। संतोष परम सुख। संतोष मोक्ष का मार्ग।

विवेक और वैराग्य

विवेक सत्-असत् का ज्ञान। वैराग्य आसक्ति से मुक्ति। विवेक-वैराग्य मुक्ति के साधन। विवेक से सही निर्णय। वैराग्य से शांति। विवेक बुद्धि का गुण। वैराग्य त्याग है। विवेक-वैराग्य आवश्यक हैं।

शांति परम लक्ष्य

शांति परम सुख है। शांति मन की स्थिति। शांति से ज्ञान मिलता। शांति ध्यान से आती। शांति त्याग से आती। शांति संतोष से आती। शांति मोक्ष का मार्ग। शांति सार्वभौमिक लक्ष्य।

सत्य ही परमात्मा

सत्य ही ईश्वर है। सत्य शाश्वत है। सत्य अपरिवर्तनीय है। सत्य सर्वव्यापी है। सत्य की खोज ही साधना। सत्य साक्षात्कार मुक्ति। सत्य सबमें है। सत्य ही परम लक्ष्य।

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सर्वधर्म शिक्षा

सभी धर्मों का सार और एकता

इस्लाम का सार

इस्लाम का अर्थ शांति और समर्पण। अल्लाह एक है। पैगंबर मुहम्मद अंतिम दूत। नमाज, रोजा, हज, जकात। कुरान पवित्र ग्रंथ। इस्लाम भाईचारा सिखाता। इस्लाम दया का धर्म। इस्लाम शांति का मार्ग।

ईसाई धर्म का सार

ईसा मसीह प्रेम के अवतार। "प्रेम ही ईश्वर है" - बाइबिल का संदेश। क्षमा और करुणा का धर्म। पड़ोसी से प्रेम करो। शत्रु को भी क्षमा करो। ईसाई धर्म सेवा सिखाता। बाइबिल पवित्र ग्रंथ। ईसाई धर्म प्रेम का मार्ग।

बौद्ध धर्म का सार

बुद्ध ज्ञान के प्रतीक। चार आर्य सत्य बुद्ध का संदेश। अष्टांग मार्ग मुक्ति का मार्ग। दुःख का कारण तृष्णा। अहिंसा परम धर्म। ध्यान से निर्वाण। बौद्ध धर्म करुणा सिखाता। बौद्ध धर्म शांति का मार्ग।

जैन धर्म का सार

महावीर अहिंसा के प्रतीक। "अहिंसा परमो धर्मः" - जैन धर्म का मूल। जीव दया सर्वोपरि। अनेकांतवाद जैन दर्शन। स्याद्वाद सत्य का सिद्धांत। अपरिग्रह त्याग है। जैन धर्म कठोर साधना। जैन धर्म मुक्ति का मार्ग।

सिख धर्म का सार

गुरु नानक एकता के प्रवर्तक। "इक ओंकार" - एक ईश्वर। गुरु ग्रंथ साहिब पवित्र ग्रंथ। सेवा और समर्पण सिख धर्म। लंगर सबके लिए। सिख धर्म समानता सिखाता। सिख धर्म साहस का धर्म। सिख धर्म सेवा का मार्ग।

यहूदी धर्म का सार

यहूदी धर्म प्राचीनतम। एक ईश्वर में विश्वास। तोराह पवित्र ग्रंथ। दस आज्ञाएं धर्म का आधार। यहूदी धर्म न्याय सिखाता। यहूदी धर्म परंपरा प्रिय। यहूदी धर्म विश्वास का धर्म। यहूदी धर्म प्राचीन ज्ञान।

पारसी धर्म का सार

जरथुस्त्र पारसी धर्म के संस्थापक। अग्नि पूजा पारसी परंपरा। "अच्छे विचार, अच्छे शब्द, अच्छे कर्म"। पारसी धर्म सत्य सिखाता। पारसी धर्म शुद्धता प्रिय। पारसी समाज सेवाभावी। पारसी धर्म प्रकाश का धर्म। पारसी धर्म पवित्रता का मार्ग।

ताओ धर्म का सार

लाओ त्से ताओ के संस्थापक। ताओ का अर्थ मार्ग। प्रकृति के साथ सामंजस्य। सरलता और विनम्रता। ताओ धर्म संतुलन सिखाता। यिन-यांग संतुलन का प्रतीक। ताओ धर्म शांति का मार्ग। ताओ धर्म प्रकृति का धर्म।

शिंतो धर्म का सार

शिंतो जापान का धर्म। प्रकृति पूजा शिंतो में। पूर्वजों का सम्मान। शुद्धता और सादगी। शिंतो धर्म परंपरा प्रिय। शिंतो धर्म प्रकृति प्रेम। शिंतो धर्म सरल है। शिंतो धर्म जापानी संस्कृति।

सभी धर्मों में एक ईश्वर

सभी धर्म एक ईश्वर मानते। नाम अलग, सत्य एक। अल्लाह, गॉड, ईश्वर, वाहेगुरु। सब एक ही परमसत्य। ईश्वर सर्वव्यापी है। ईश्वर सबका पिता। ईश्वर प्रेम स्वरूप। ईश्वर एक है।

सभी धर्मों में प्रेम

प्रेम सभी धर्मों का सार। प्रेम ही ईश्वर है। प्रेम से सब मिलता। प्रेम में भेद नहीं। प्रेम सार्वभौमिक है। प्रेम मानवता है। प्रेम परम धर्म। प्रेम ही सत्य है।

सभी धर्मों में अहिंसा

अहिंसा सभी धर्मों में। हिंसा किसी धर्म में नहीं। अहिंसा मानवता है। अहिंसा शांति का मार्ग। अहिंसा से प्रेम बढ़ता। अहिंसा परम धर्म। अहिंसा सार्वभौमिक सत्य। अहिंसा सबका धर्म।

सभी धर्मों में दया

दया सभी धर्मों का गुण। दया से हृदय शुद्ध होता। दया ईश्वर का गुण। दया मानवता है। दया से शांति मिलती। दया परम धर्म। दया सार्वभौमिक है। दया सबका कर्तव्य।

सभी धर्मों में सत्य

सत्य सभी धर्मों का आधार। सत्य बोलना सबका धर्म। सत्य से विश्वास बनता। सत्य शाश्वत है। सत्य ईश्वर है। सत्य की विजय होती। सत्य सार्वभौमिक है। सत्य परम धर्म।

सभी धर्मों में न्याय

न्याय सभी धर्मों में। न्याय ईश्वर का गुण। न्याय से समाज चलता। न्याय सबका अधिकार। न्याय धर्म का आधार। न्याय मानवता है। न्याय सार्वभौमिक है। न्याय परम धर्म।

सभी धर्मों में क्षमा

क्षमा सभी धर्मों में। क्षमा महान गुण है। क्षमा से शांति मिलती। क्षमा प्रेम का प्रमाण। क्षमा ईश्वर का गुण। क्षमा मानवता है। क्षमा सार्वभौमिक है। क्षमा परम धर्म।

सभी धर्मों में सेवा

सेवा सभी धर्मों में। सेवा ईश्वर की पूजा। सेवा से पुण्य मिलता। सेवा मानवता है। सेवा निस्वार्थ होनी चाहिए। सेवा परम धर्म। सेवा सार्वभौमिक है। सेवा सबका कर्तव्य।

सभी धर्मों में प्रार्थना

प्रार्थना सभी धर्मों में। प्रार्थना ईश्वर से बात। प्रार्थना से शांति मिलती। प्रार्थना शक्ति देती। प्रार्थना हृदय से करें। प्रार्थना सार्वभौमिक है। प्रार्थना परम साधना। प्रार्थना सबका अधिकार।

सभी धर्मों में उपवास

उपवास सभी धर्मों में। उपवास आत्म-शुद्धि है। उपवास संयम सिखाता। उपवास से इच्छाशक्ति बढ़ती। उपवास ध्यान में सहायक। उपवास स्वास्थ्य के लिए। उपवास सार्वभौमिक है। उपवास परम साधना।

सभी धर्मों में दान

दान सभी धर्मों में। दान पुण्य का कार्य। दान से समाज सुधरता। दान निस्वार्थ होना चाहिए। दान गरीबों की सेवा। दान परम धर्म। दान सार्वभौमिक है। दान सबका कर्तव्य।

सभी धर्मों में तीर्थयात्रा

तीर्थयात्रा सभी धर्मों में। तीर्थ पवित्र स्थान। तीर्थयात्रा आत्म-शुद्धि। तीर्थयात्रा भक्ति का प्रमाण। तीर्थयात्रा से पुण्य मिलता। तीर्थयात्रा सार्वभौमिक है। तीर्थयात्रा परम साधना। तीर्थयात्रा सबका अधिकार।

सभी धर्मों में पवित्र ग्रंथ

सभी धर्मों में पवित्र ग्रंथ। वेद, कुरान, बाइबिल, गुरु ग्रंथ साहिब। ग्रंथ ज्ञान के स्रोत। ग्रंथ मार्गदर्शक हैं। ग्रंथ ईश्वर का संदेश। ग्रंथों का सम्मान करें। ग्रंथ सार्वभौमिक ज्ञान। ग्रंथ अनमोल हैं।

सभी धर्मों में गुरु

गुरु सभी धर्मों में। गुरु ज्ञान देते हैं। गुरु मार्गदर्शक हैं। गुरु ईश्वर का रूप। गुरु के बिना ज्ञान नहीं। गुरु का सम्मान करें। गुरु सार्वभौमिक हैं। गुरु अनमोल हैं।

सभी धर्मों में ध्यान

ध्यान सभी धर्मों में। ध्यान आत्म-साक्षात्कार। ध्यान से शांति मिलती। ध्यान मन को शुद्ध करता। ध्यान सार्वभौमिक साधना। ध्यान सबके लिए। ध्यान परम साधना। ध्यान जीवन बदलता।

सभी धर्मों में संगीत

संगीत सभी धर्मों में। भजन, कीर्तन, नात, भेंट गीत। संगीत भक्ति का माध्यम। संगीत हृदय को छूता। संगीत ईश्वर की पूजा। संगीत सार्वभौमिक है। संगीत परम साधना। संगीत आत्मा की भाषा।

सभी धर्मों में त्योहार

त्योहार सभी धर्मों में। दिवाली, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व। त्योहार खुशी के अवसर। त्योहार एकता लाते। त्योहार सांस्कृतिक धरोहर। त्योहार सबके हैं। त्योहार मनाएं साथ। त्योहार प्रेम बढ़ाते।

सभी धर्मों में परिवार

परिवार सभी धर्मों में महत्वपूर्ण। परिवार समाज की इकाई। परिवार में प्रेम आवश्यक। माता-पिता का सम्मान सभी धर्मों में। परिवार धर्म का आधार। परिवार सार्वभौमिक है। परिवार पहली पाठशाला। परिवार अनमोल है।

सभी धर्मों में विवाह

विवाह सभी धर्मों में पवित्र। विवाह दो आत्माओं का मिलन। विवाह समाज की नींव। विवाह में प्रेम और विश्वास। विवाह धर्म का संस्कार। विवाह सार्वभौमिक है। विवाह पवित्र बंधन। विवाह जीवन का आधार।

सभी धर्मों में मृत्यु संस्कार

मृत्यु संस्कार सभी धर्मों में। मृत्यु जीवन का अंत नहीं। आत्मा अमर है। मृत्यु संस्कार सम्मान का प्रतीक। मृत्यु के बाद जीवन। मृत्यु संस्कार सार्वभौमिक। मृत्यु प्राकृतिक है। मृत्यु नया जन्म है।

धर्म और विज्ञान

धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं। दोनों सत्य की खोज। विज्ञान बाहरी जगत। धर्म आंतरिक जगत। दोनों पूरक हैं। दोनों मानवता के लिए। धर्म-विज्ञान समन्वय आवश्यक। दोनों से संतुलन।

धर्म और नैतिकता

धर्म नैतिकता सिखाता। नैतिकता समाज का आधार। सत्य, अहिंसा, प्रेम नैतिकता। नैतिकता सभी धर्मों में। नैतिकता मानवता है। नैतिकता सार्वभौमिक है। नैतिकता परम धर्म। नैतिकता जीवन का आधार।

धर्म और शिक्षा

धर्म शिक्षा का अंग। शिक्षा केवल किताबी नहीं। नैतिक शिक्षा आवश्यक। धर्म चरित्र बनाता। शिक्षा में धर्म का स्थान। धर्म-शिक्षा समन्वय जरूरी। शिक्षा संपूर्ण होनी चाहिए। धर्म-शिक्षा जीवन का आधार।

धर्म और समाज

धर्म समाज को बांधता। धर्म समाज का आधार। धर्म नियम बनाता। धर्म से समाज सुधरता। धर्म एकता लाता। धर्म समाज सेवा सिखाता। धर्म सामाजिक है। धर्म समाज का दर्पण।

धर्म और राजनीति

धर्म और राजनीति अलग। धर्म आध्यात्मिक है। राजनीति सांसारिक है। धर्म का राजनीति में दुरुपयोग गलत। धर्म प्रेम सिखाता। राजनीति में नैतिकता आवश्यक। धर्म-राजनीति अलग रखें। धर्म सबका है।

धार्मिक संवाद

धार्मिक संवाद आवश्यक। संवाद से समझ बढ़ती। संवाद से भ्रम दूर होते। संवाद एकता लाता। संवाद शांति का मार्ग। संवाद सम्मान से करें। संवाद सार्वभौमिक है। संवाद सबका अधिकार।

धार्मिक स्वतंत्रता

धार्मिक स्वतंत्रता मौलिक अधिकार। सबको अपना धर्म मानने का अधिकार। धर्म व्यक्तिगत विषय। धर्म पर जबरदस्ती गलत। धार्मिक स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार। धार्मिक स्वतंत्रता सार्वभौमिक। धार्मिक स्वतंत्रता सबका अधिकार। धार्मिक स्वतंत्रता मानवाधिकार।

धर्म परिवर्तन

धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत निर्णय। जबरदस्ती धर्म परिवर्तन गलत। धर्म हृदय से मानें। धर्म परिवर्तन से सत्य नहीं बदलता। सभी धर्म अच्छे हैं। धर्म परिवर्तन पर दबाव गलत। धर्म प्रेम का विषय। धर्म व्यक्तिगत है।

अंतरधार्मिक विवाह

अंतरधार्मिक विवाह प्रेम का प्रमाण। प्रेम धर्म से बड़ा। अंतरधार्मिक विवाह एकता लाता। परिवार का सहयोग आवश्यक। दोनों धर्मों का सम्मान करें। अंतरधार्मिक विवाह चुनौतीपूर्ण। प्रेम और समझ से सब संभव। प्रेम सार्वभौमिक है।

धार्मिक कट्टरता

धार्मिक कट्टरता खतरनाक। कट्टरता धर्म नहीं। कट्टरता से हिंसा होती। कट्टरता अज्ञान है। सच्चा धर्म प्रेम सिखाता। कट्टरता से बचें। उदारता धर्म का गुण। प्रेम और सहिष्णुता सच्चा धर्म।

विश्व शांति और धर्म

धर्म शांति का मार्ग। सभी धर्म शांति चाहते। धर्म युद्ध नहीं सिखाता। धर्म प्रेम सिखाता। विश्व शांति सबका लक्ष्य। धर्म एकता लाए। धर्म से विश्व शांति संभव। धर्म मानवता का आधार।